भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 956 में से

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पृष्ठ 87

४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पिबन्त्येवोदकं गावो मंडूकेषु रुवत्स्वपि । न तेऽधिकारो धर्मेऽस्ति मा भूरात्मप्रशंसकः ॥ “ अरे ! यद्यपि मेंढ़क टर्र टर्र किया करते हैं, तोभी गौएँ पानी पीना बंद नहीं करतीं; चुप रह ! मुझे धर्मज्ञान बतानेका तेरा अधिकार नहीं है । व्यर्थ अपनी प्रशंसा मत कर ।” उस समय विश्वामित्रने यह भी कहा है, कि “जीवितं मरणाच्छ्रेयो जीवन्धर्ममवाप्नुयात् ” – अर्थात् यदि जिंदा रहेंगे तो धर्मका आचरण कर सकेंगे । इसलिये धर्मकी दृष्टिसेभी मरनेकी अपेक्षा जीवित रहना अधिक श्रेयस्कर है । मनुजीने अजीगर्त, वामदेव आदि अन्यान्य ऋषियोंके उदाहरण दिये हैं, जिन्होंने ऐसे संकट समय इसी प्रकार आचरण किया है ( मनु. १०. १०५-१०८) । हाब्स नामक अंग्रेज ग्रंथकार लिखता है, “ किसी कठिन अकालके समय जब अनाज मोल न मिले, या दानभी न मिले, तब यदि पेट भरनेके लिये कोई चोरी या साहस कर्म करे, तो उसका यह अपराध माफ समझा जाता है ।”* और मिलने तो यहाँ तक लिखा है, कि ऐसे समय चोरी करके अपने प्राण बचाने यही मनुष्यका कर्तव्य है । “ मरनेसे जिंदा रहना श्रेयस्कर है ” - क्या विश्वामित्रका यह तत्त्व सर्वथा अपवादरहित कहा जा सकता है ? । इस जगत्में सिर्फ़ जिंदा रहनाही पुरुषार्थ नहीं है। कौएभी काकबलि खाकर कई वर्षोंतक जीते रहते हैं । इसलिये वीरपत्नी विदुला अपने पुत्रसे कहती है, कि बिछौनेपर पड़े पड़े सड़ जाने या घरमें सौ वर्षकी आयुको व्यर्थ व्यतीतकर देनेकी अपेक्षा, यदि तू एक क्षणभी अपने पराक्रमकी ज्योति प्रकट करके मर जाएगा तो अच्छा होगा – “मुहूर्तं ज्वलितं श्रेयो न धूमायितं चिरम् ” ( मभा. उ. १३२. १५) । यदि यह बात सच है, कि आज नहीं तो कल, अंतमें सौ वर्षके बाद तो मरना जरूरी है ( मभा. १०. १, ३८; गीता २. २७ ), तो फिर उसके लिये रोने या डरनेसे क्या लाभ है ? अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिसे तो आत्मा नित्य और कि इस विषयमें विकल्प है। इस विकल्पको छोड़ देनेपर शेष पाँचही जानवर रहते हैं; और उन्हींका मांस भक्ष्य समझा गया है । “ पंच पंचनखा भक्ष्याः ” का यही अर्थ है । तथापि मीमांसकोंके मतानुसार इस व्यवस्थाका भावार्थ यही है, कि जिन लोगोंको मांस खानेकी संमति दी गई है, वे उक्त पंचनखी पाँच जानवरोंके सिवा और किसी पंचनखी जानवरका मांस न खाये । इसका भावार्थ यह नहीं है, कि इन जानवरोंका मांस खानाही चाहिये । इस पारिभाषिक अर्थको वे लोग ‘परिसंख्या’ कहते हैं। “ पंच पंचनखा भक्ष्याः ” इसी परिसंख्याका मुख्य उदाहरण है । जबकि मांस खानाही निषिद्ध माना गया है तब इन पाँच जानवरोंका मांस खानाभी निषिद्धही समझा जाना चाहिये ।

  • Hobbes, Leviathan. Part II. Chap. XXVII. p. 139 (Morley's Universal Library Edition ). Mill's Utilitarianism. Chap. V. p. 95. ( 15th Ed. ) Thus, to save a life, it may not only be allowable but a duty to steal etc.”
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