श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्मजिज्ञासा ४१
अमर है। इस लिये मृत्युका विचार करते समय प्रारब्ध कर्मानुसार प्राप्त सिर्फ़ इस शरीरकाही विचार बाकी रह जाता है। अच्छा यह तो सब जानते हैं, कि यह शरीर नाशवान् है; परंतु आत्माके कल्याणके लिये, इस जगतमें जो कुछ करना है, उसका एकमात्र साधन यही नाशवान् मनुष्यदेह है। इसीलिये मनुने कहा है, "आत्मानं सततं रक्षेत् दारैरपि धनैरपि" - अर्थात् स्त्री और संपत्तिकी अपेक्षा हमको पहले स्वयं अपनीही रक्षा करनी चाहिये ( मनु. ७. २१३ )। यद्यपि मनुष्य-देह दुर्लभ और नाश- वानभी है, तथापि जब उसका नाश करके उससेभी अधिक किसी शाश्वत वस्तुकी प्राप्ति कर लेनी होती है, (जैसे देश, धर्म और सत्यके लिये, अपनी प्रतिज्ञा, व्रत और बिरदकी रक्षाके लिये; एवं इज्जत, कीर्ति और सर्वभूतहितके लिये) तब ऐसे समयपर अनेक महात्माओंने इस तीव्र कर्तव्याग्निमें अपने प्राणोंकीभी आनंदसे आहुति दे दी है। रघुवंशमें कहा है कि जब राजा दिलीप अपने गुरु वसिष्ठकी गायकी सिंहसे रक्षा करनेके लिये उसको अपने शरीरका बलिदान देनेको तैयार हो गया, तब वह सिंहसे बोला, कि हमारे समान पुरुषोंकी "इस पंचभौतिक शरीरके विषयमें अनास्था रहती है। अतएव तू मेरे इस जड़ शरीरके बदले मेरे यशःस्वरूपी शरीरकी ओर ध्यान दे।" ( रघु. २. ५७ )। कथासरित्सागर और नागानंद नाटकमें यह वर्णन है, कि सर्पोंकी रक्षा करनेके लिये जीमूतवाहनने गरुडको स्वयं अपना शरीर अर्पण कर दिया। मृच्छकटिक नाटक (१०. २७) में चारुदत्त कहता है :- न भीतो मरणादस्मि केवलं दूषितं यशः । विशुद्धस्य हि मे मृत्युः पुत्रजन्मसमः किल ॥ "मैं मृत्युसे नहीं डरता; मुझे यही दुःख है, कि मेरी कीर्ति कलंकित हो गई। यदि कीर्ति शुद्ध रहे, और मृत्यु आ जाय, तो मैं उसको पुत्रके जन्मके उत्सवके समान मानूँगा।" इसी तत्त्वके आधारपर महाभारतके वनपर्व और शांतिपर्व (मभा. वन. १०० तथा १३१; शां. ३४२) में राजा शिबि और दधीचि ऋषिकी कथाओंका वर्णन किया है। जब धर्म-( यम) राज श्येन पक्षीका रूप धारण करके कपोतके पीछे उड़े और जब वह कपोत अपनी रक्षाके लिये राजा शिबिकी शरणमें गया, तब राजाने स्वयं अपने शरीरका मांस काटकर उस श्येन पक्षीको दिया; और शरणागत कपोतकी रक्षा की। वृत्रासुर नामका देवताओंका एक शत्रु था। उसको मारनेके लिये दधीचि ऋषिकी हड्डियोंके वज्रकी आवश्यकता हुई। तब सब देवता मिलकर उक्त ऋषिके पास गये और बोले, "शरीरत्यागं लोकहितार्थं भवान् कर्तुमर्हति" - हे महाराज ! सब लोगोंके कल्याणके लिये आप देहत्याग कीजिये। यह बिनती सुनकर दधीचि ऋषिने बड़े आनंदसे अपना शरीर त्याग दिया और अपनी हड्डियाँ देवताओंको दे दीं। एक समयकी बात है, कि इंद्र ब्राह्मणका रूप धारण करके, दानशूर कर्णके पास कवच और कुंडल मांगने आया। कर्ण इन कवच-कुंडलोंको पहने हुएही