श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 89, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंजन्मा था। जब सूर्यने जाना, कि इंद्र कवच-कुंडल मांगने जा रहा है, तब उसने पहलेहीसे कर्णको सूचना दे दी थी, कि तुम अपने कवच-कुंडल किसीको दान मत दो। यह सूचना देते समय सूर्यने कर्णसे कहा, “इसमें संदेह नहीं, कि तू बड़ा दानी है; परंतु यदि तू अपने कवच-कुंडल दानमें देगा, तो तेरे जीवनहीकी हानि हो जाएगी। इसलिये तू इन्हें किसीको न दो। क्योंकि मर जानेपर कीर्तिका क्या उपयोग?” “मृतस्य कीर्त्या किं कार्यम्।” यह सुनकर कर्णने स्पष्ट उत्तर दिया, कि “जीवितेनापि मे रक्ष्या कीर्तिस्तद्विद्धि मे व्रतम्”-अर्थात् जान भलेही चली जाय तोभी कुछ परवाह नहीं; परंतु अपनी कीर्तिकी रक्षा करनाही मेरा व्रत है (मभा. वन. २९९. ३८) सारांश यह है, कि “यदि मर जाएगा, तो स्वर्गकी प्राप्ति होगी; और जीत जाएगा तो पृथ्वीका राज्य मिलेगा” इत्यादि क्षात्रधर्म (गीता २. ३७) और ‘स्वधर्मे निधनं श्रेय:’ (गीता ३. ३५) यह सिद्धान्त उक्त तत्त्वपरही अवलंबित है। इसी तत्त्वके अनुसार श्रीसमर्थ रामदास स्वामी कहते हैं, ‘कीर्तिकी ओर देखनेसे सुख नहीं है; और सुखकी ओर देखने से कीर्ति नहीं मिलती (दासबोध १२. १०. १९; १९. १०. २५); और वे उपदेशभी करते हैं, कि “हे सज्जन मन ! ऐसा काम कर, जिससे मरनेपर कीर्ति बची रहे।” यहाँ प्रश्न हो सकता है, कि यद्यपि परोपकारसे कीर्ति प्राप्त होती है, तथापि मृत्युके बाद कीर्तिका क्या उपयोग है ? अथवा किसी सभ्य मनुष्यको अपकीर्ति की अपेक्षा मर जाना (गीता.२. ३४), या जिंदा रहनेसे परोपकार करना अधिक प्रिय क्यों मालूम होता है ? इस प्रश्नका उचित उत्तर देनेके लिये आत्म-अनात्म विचारमें प्रवेश करना होगा। और इसीके साथ कर्म-अकर्मशास्त्रकाभी विचार करके यह जान लेना होगा, कि किस समयपर जान देनेके लिये तैयार होना उचित या अनुचित है। यदि इस बातका विचार नहीं किया जाएगा, तो जान देनेसे यशकी प्राप्ति तो दूरही रही, मूर्खतासे आत्महत्या करनेका पाप माथे चढ़ जाएगा। माता, पिता, गुरु आदि वंदनीय और पूजनीय पुरुषोंकी पूजा तथा शुश्रूषा करनाभी सर्वमान्य धर्मोंमेंसे एक प्रधान धर्म समझा जाता है। यदि ऐसा न हो तो कुटुंब, गुरुकुल और सारे समाजकी व्यवस्था ठीक ठीक कभी रह न सकेगी। यही कारण है, कि सिर्फ स्मृति-ग्रंथोंहीमें नहीं, किंतु उपनिषदोंमेंभी, “सत्यं वद, धर्मं चर” कहा गया है। और जब शिष्यका अध्ययन पूरा हो जाता, और वह अपने घर जाने लगता, तब प्रत्येक गुरुका उसे यही उपदेश होता था, कि “मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव।” (तै. १. ११. १ और ६) महाभारतके ब्राह्मण-व्याध आख्यानका तात्पर्यभी यही है (वन. अ. २१३)। परंतु इसमेंभी कभी कभी अकल्पित बाधाएँ खड़ीं हो जातीं हैं। देखिये, मनुजी कहते हैं (२. १४५) उपाध्यायान् दशाचार्यः आचार्याणां शतं पिता । सहस्रं तु पितॄन्माता गौरवेणातिरिच्यते ॥