भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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कर्मजिज्ञासा ४३

“दस उपाध्यायोंसे आचार्य और सौ आचार्योंसे पिता, एवं हज़ार पिताओंसे माताका गौरव अधिक है।” इतना होनेपरभी यह कथा प्रसिद्ध है, ( मभा वन. ११६. १४ ) कि परशुरामकी माताने कुछ अपराध किया था, इसलिये उसने अपने पिताकी आज्ञासे अपनी माताको मार डाला । शांतिपर्व (मभा. शां. २६५) के चिरकारिकोप- आख्यानमें अनेक साधक-बाधक प्रमाणोंसहित इस बातका एक स्वतंत्र अध्याय में विस्तृत विवेचन किया गया है, कि पिताकी आज्ञासे माताका वध करना श्रेयस्कर है या पिताकी आज्ञाका भंग करना श्रेयस्कर है। इससे स्पष्ट जाना जाता है, कि महा- भारतके समय ऐसे सूक्ष्म प्रसंगोंकी नीतिशास्त्रकी दृष्टिसे चर्चा करनेकी पद्धति जारी थी। यह बात छोटेसे लेकर बड़ोंतक सब लोगोंको मालूम है, कि पिताकी प्रतिज्ञाको सत्य करनेके लिये उनकी आज्ञासे रामचंद्रने चौदह वर्ष वनवास किया। परंतु माताके संबंधमें जो न्याय ऊपर कहा गया है, वही पिताके संबंधमेंभी उपयुक्त होनेका समय कभी कभी आ सकता है। जैसे; मान लीजिये, कोई लड़का अपने पराक्रमसे राजा हो गया; और उसका पिता एक अपराधीके नाते इन्साफ़के लिये उसके सामने लाया गया; इस अवस्थामें वह लड़का क्या करे ? – राजाके नाते अपने अपराधी पिताको दंड दे या उसको अपना पिता समझ कर छोड़ दे ? मनुजी कहते हैं :- पिताचार्यः सुहृन्माता भार्या पुत्रः पुरोहितः । नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मे न तिष्ठति ॥ “पिता, आचार्य, मित्र, माता, स्त्री, पुत्र या पुरोहित – इनमेंसे कोईभी यदि अपने धर्मके अनुसार न चले, तो वह राजाके लिये दंड्य नहीं हो सकता; अर्थात् राजा उसको उचित दंड दे” (मनु. ८. ३३५; मभा. शां. १२१. ६०)। क्योंकि इस जगह पुत्रधर्मकी योग्यतासे राजधर्मकी योग्यता अधिक है। इस न्यायका उदाहरण (मभा. वन. १०७; रामा. १. ३८ में) भारत और रामायण – दोनोंमें है, कि सूर्यवंशके महापराक्रमी सगर राजाने अपने लड़केको देशसे निकाल दिया था; क्योंकि वह 'नासमझ और दुराचारी' था, और प्रजाको दुःख दिया करता था। मनुस्मृतिमेंभी यह कथा है, कि आंगिरस नामक एक ऋषिको छोटी अवस्थामेंही बहुत ज्ञान हो गया था। इसलिये उसके काका-मामा आदि बड़े बूढ़े रिश्तेदार उसके पास अध्ययन करने लगे। एक दिन पाठ पढ़ाते पढ़ाते आंगिरसने कहा, “पुत्रका इति होवा च ज्ञानेन परिगृह्य तान्।” बस, यह सुनकर सब वृद्धजन क्रोधसे लाल- पीले हो गये; और कहने लगे, कि यह लडका मस्त हो गया है। उसको उचित दंड दिलानेके लिये उन लोगोंने देवताओंसे शिकायत की। देवताओंने दोनों पक्षोंका कहना सुन लिया और यह निर्णय किया, कि “आंगिरसने जो कुछ तुम्हें कहा वही न्याय्य है।” इसका कारण यह है :-