भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 91

४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः । यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः ॥ “ सिरके बाल सफ़ेद हो जानेसेही कोई मनुष्य वृद्ध नही कहा जा सकता; देवगण उसी को वृद्ध कहते हैं, जो तरुण होनेपरभी ज्ञानवान् हो ” ( मनु. २. १५६ और मभा. वन. १३३. ११; शल्य. ५१. ४७. ) । यह तत्त्व मनुजी और व्यासजीहीको नहीं, किंतु बुद्धकोभी मान्य था। क्योंकि, मनुस्मृतिके उक्त श्लोकका पहला चरण ‘धम्मपद’* नामके पाली भाषाके प्रसिद्ध नीतिविषयक बौद्ध ग्रंथमें अक्षरशः आया है ( धम्मपद २६० ) । और उसके आगे यहभी कहा है, कि जो सिर्फ़ अवस्थाहीमे वृद्ध हो गया है, उसका जीना व्यर्थ है; यथार्थमें धर्मिष्ठ और वृद्ध होनेके लिये सत्य, अहिंसा आदि सद्गुणोंकी आवश्यकता है। 'चुल्लवग्ग' नामक दूसरे ग्रंथ ( चुल्लवग्ग ६. १३. १ ) में स्वयं बुद्धकी यह आज्ञा है, कि यद्यपि धर्मका निरूपण करनेवाला भिक्षु नया हो, तथापि वह ऊँचे आसनपर बैठे और उन वयोवृद्ध भिक्षुओकोभी उपदेश करे, जिन्होंने उसके पहले दीक्षा पाई हो। यह कथा सब लोग जानते हैं, कि प्रल्हादने अपने पिता हिरण्यकशिपुकी अवज्ञा करके भगवत्प्राप्ति कैसे कर ली थी। इससे यह जान पड़ता है कि छोटेबड़ेकाही नहीं तो जब कभी पिता-पुत्रके सर्वमान्य नातेसेभी कोई दूसरा अधिक बड़ा संबंध उपस्थित होता है, तब उतने समयके लिये निरुपाय होकर पिता-पुत्रका नाता भूल जाना पड़ता है। परंतु ऐसे अवसरके न होते हुएभी, यदि कोई मुँहज़ोर लड़का उक्त नीतिका अवलंब करके अपने पिताको गालियाँ देने लगे, तो वह केवल पशुके समान समझा जाएगा। पितामह भीष्मने युधिष्ठिरसे कहा है, ‘ गुरुर्गरीयान् पितृतो मातृतश्चेति मे मतिः ’ ( मभा. शां. १०८. १७ ) - अर्थात् गुरु, माता-पितामेभी श्रेष्ठ है; परंतु महाभारतमें यहभी लिखा है, कि एक समय मरुत्त राजाके गुरुने लोभवश होकर स्वार्थके लिये उसका त्याग किया, तब मरुत्तने कहा :- गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथप्रतिपन्नस्य न्याय्यं भवति शासनम् । “ यदि कोई गुरु इस बातका विचार न करे, कि क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये; और यदि वह अपनेही घमंडमें रहकर टेढ़े रास्तेमे चले, तो उसको

  • ‘धम्मपद’ ग्रंथका अंग्रेजी अनुवाद ‘प्राच्यधर्म-पुस्तकमाला’ ( Sacred Books of the East, Vol. X ) में किया गया है; और चुल्लवग्गका अनुवादभी उसी मालाके Vol. XVII और XX में प्रकाशित हुआ है। धम्मपदका पाली श्लोक यह है :- न तेन थेरो होति येनस्स पलितं सिरो । परिपक्को वयो तस्स मोघजिण्णो ति वुच्चति ॥ ‘थेर’ शब्द बुद्ध भिक्षुओंके लिये प्रयुक्त हुआ है। यह संस्कृत 'स्थविर'का अपभ्रंश है।