श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्मजिज्ञासा ४५ शासन करना उचित है।” उक्त श्लोक महाभारतमें चार स्थानोंमें पाया जाता है (मभा. आ. १४२. ५२, ५३; उ. १७९, २४; शां. ५७. ७; १४०. ४८)। इनमेंसे पहले स्थानमें वही पाठ है, जो ऊपर दिया गया है। अन्य स्थानोंमें चौथे चरणके स्थानमें “दण्डो भवति शाश्वतः” “अथवा परित्यागो विधीयते” यह पाठांतरभी है। परंतु वाल्मीकिरामायण (रामा. २. २१. १३) में जहाँ यह श्लोक है, वहाँ ऐसाही पाठ है, जैसा ऊपर दिया गया है। इसलिये हमने इस ग्रंथमें उसीको स्वीकार किया है। इस श्लोकमें जिस तत्त्वका वर्णन किया गया है, उसीके आधारपर भीष्म पितामहने परशुरामसे और अर्जुनने द्रोणाचार्यसे युद्ध किया; और जब प्रल्हादने देखा, कि अपने गुरु, जिन्हें हिरण्यकशिपुने नियत किया है, भगवत्प्राप्तिके विरुद्ध उपदेशकर रहे हैं, तब उसने इसी तत्त्वके अनुसार उनका निषेध किया है। शांतिपर्वमें भीष्म पितामह श्रीकृष्णसे कहते हैं, कि यद्यपि गुरु पूजनीय हैं, तथापि उसकोभी नीतिकी मर्यादाका पालन करना चाहिये; नहीं तो- समयत्यागिनो लुब्धान् गुरून्नपि च केशव । निहन्ति समरे पापान् क्षत्रियः स हि धर्मवित् ॥ “हे केशव ! जो गुरु मर्यादा, नीति अथवा शिष्टाचारका भंग करते हैं और जो लोभी या पापी हैं, उन्हें लड़ाईमें मारनेवाला क्षत्रियही धर्मज्ञ कहलाता है” (मभा. शां. ५५. १६)। इसी तरह तैत्तिरीयोपनिषदमेंभी प्रथम ‘आचार्य देवो भव’ कहकर उसीके आगे कहा है, कि हमारे जो कर्म अच्छे हों उन्हींका अनुकरण करो; औरोंका नहीं- ‘यान्यस्माकं सुचरितानि। तानि त्वयोपास्यानि, नो इतराणि’ (तै. १. ११. २)। इससे उपनिषदोंका वह सिद्धान्त प्रकट होता है, कि यद्यपि पिता और आचार्यको देवताके समान मानना चाहिये; तथापि यदि वे शराब पीते हों, तो पुत्र और छात्रको अपने पिता या आचार्यका अनुकरण नहीं करना चाहिये क्योंकि नीतिकी मर्यादा और धर्मका अधिकार माँ-बाप या गुरुसे अधिक बलवान् होता है। मनुजीकी निम्न आज्ञाकाभी यही रहस्य है- “धर्मका पालन करो; यदि कोई धर्मका नाश करेगा; अर्थात् धर्मकी आज्ञाके अनुसार आचरण नहीं करेगा; तो धर्म उस मनुष्यका नाश किये बिना नहीं रहेगा।” (मनु. ८. १४-१६) राजा तो गुरुसेभी अधिक श्रेष्ठ एक देवता है (मनु. ७. ८ और मभा. शां. ६८. ४०); परंतु वहभी इस धर्मसे मुक्त नहीं हो सकता। यदि वह इस धर्मका त्याग कर देगा, तो उसका नाश हो जाएगा- यह बात मनुस्मृतिमें कही गई है; और महाभारतमें वही भाव, वेन तथा खनीनेत्र राजाओंकी कथामें, व्यक्त किया गया है (मनु. ७. ४१ और ८. १२८; मभा. शां. ५९. ९२, १०० तथा अश्व. ४)। अहिंसा, सत्य और अस्तेयके साथ इंद्रिय-निग्रहकीभी गणना सामान्य धर्ममें की जाती है (मनु. १०. ६३)। काम, क्रोध, लोभ आदि मनुष्यके शत्रु हैं। इस- लिये जबतक मनुष्य इनको जीत नहीं लेगा, तबतक उसका या समाजका कल्याण