श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र नहीं होगा। यह उपदेश सब शास्त्रोंमें किया गया है। विदुरनीति और भगवद्- गीतामेंभी कहा है :- त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत् ॥ “ काम, क्रोध और लोभ ये तीनों नरकके द्वार हैं। इनसे हमारा नाश होता है। इस लिये इनका त्याग करना चाहिये ” ( गीता १६. २१. मभा. उ. ३२. ७० ) । परंतु गीताहीमें भगवान् श्रीकृष्णने अपने स्वरूपका यह वर्णन किया है, “ धर्माऽविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ” - हे अर्जुन ! प्राणिमात्रमें धर्मके अनुकूल जो 'काम' है, वहीमैं हूँ ( गीता ७. ११ ) । इससे यह बात सिद्ध होती है, कि जो 'काम'- धर्मके विरुद्ध है वही नरकका द्वार है। इसके अतिरिक्त जो दूसरे प्रकारका 'काम' है, अर्थात् जो धर्मके अनुकूल है, वह ईश्वरको मान्य है। मनुनेभी यही कहा है - “ परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ ” - जो अर्थ और काम धर्मके विरुद्ध हो उनका त्याग कर देना चाहिये ( मनु. ४. १७६ ) । यदि सब प्राणी कलसे 'काम' का त्याग कर दें और मृत्युपर्यंत ब्रह्मचर्यव्रतसे रहनेका निश्चय कर लें, तो सौ-पचास वर्षोहीमें सारी सजीव सृष्टिका लय हो जाएगा; और जिस सृष्टिकी रक्षाके लिये भगवान् बार बार अवतार धारण करते हैं, उसका अल्पकालहीमें उच्छेद हो जाएगा। यह बात सच है कि, काम और क्रोध मनुष्यके शत्रु हैं; परंतु कब ? जब वे अपने वशमें न रहें तब। यह बात मनु आदि शास्त्रकारोंको संमत है, कि सृष्टिका क्रम जारी रखनेके लिये - उचित मर्यादाके भीतर - काम और क्रोधकी अत्यंत आवश्यकता है ( मनु. ५. ५६ ) । इन प्रबल मनोवृत्तियों का उचित रीतिसे निग्रह करना ही सब सुधारोंका प्रधान उद्देश्य है, उनका नाश करना कोई सुधार नहीं कहा जा सकता; क्योंकि भागवत ( भाग. ११. ५. ११ ) में कहा है :- लोके व्यवायामिषमद्यसेवा नित्यास्ति जन्तोर्नहि तत्र चोदना । व्यवस्थितिस्तेषु विवाहयज्ञसुराग्रहैरासु निवृत्तिरिष्टा ॥ “ इस दुनियामें किसीसे यह कहना नहीं पड़ता, कि तुम मैथुन, मांस और मदिराका सेवन करो। ये तीनों मनुष्यको स्वभावहीसे पसंद हैं। इन तीनोंकी कुछ व्यवस्था कर देनेके लिये - अर्थात् इनके उपयोगको कुछ मर्यादित करके व्यवस्थित कर देनेके लिये - ( शास्त्रकारोंने ) अनुक्रमसे विवाह, सोमयाग और सौत्रामणी यज्ञकी योजना की है; परंतु तिस परभी निवृत्ति अर्थात् निष्काम आचरण इष्ट है । ” यहाँ यह बात ध्यानमें रखने योग्य है, कि जब 'निवृत्ति' शब्दका संबंध पंचम्यंत पदके साथ होता है, तब उसका अर्थ “ अमुक वस्तुसे निवृत्ति अर्थात् अमुक कर्मका सर्वथा त्याग ” हुआ करता है; तोभी कर्मयोगमें 'निवृत्ति' विशेषण कर्महीके लिये प्रयुक्त हुआ है। इसलिये 'निवृत्तिकर्म'का अर्थ “ निष्काम बुद्धिसे किया जानेवाला कर्म ” होता है। यही अर्थ मनुस्मृति और भागवतपुराणमें स्पष्ट रीतिसे पाया जाता