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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः । यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः ॥ “ सिरके बाल सफ़ेद हो जानेसेही कोई मनुष्य वृद्ध नही कहा जा सकता; देवगण उसी को वृद्ध कहते हैं, जो तरुण होनेपरभी ज्ञानवान् हो ” ( मनु. २. १५६ और मभा. वन. १३३. ११; शल्य. ५१. ४७. ) । यह तत्त्व मनुजी और व्यासजीहीको नहीं, किंतु बुद्धकोभी मान्य था। क्योंकि, मनुस्मृतिके उक्त श्लोकका पहला चरण ‘धम्मपद’* नामके पाली भाषाके प्रसिद्ध नीतिविषयक बौद्ध ग्रंथमें अक्षरशः आया है ( धम्मपद २६० ) । और उसके आगे यहभी कहा है, कि जो सिर्फ़ अवस्थाहीमे वृद्ध हो गया है, उसका जीना व्यर्थ है; यथार्थमें धर्मिष्ठ और वृद्ध होनेके लिये सत्य, अहिंसा आदि सद्गुणोंकी आवश्यकता है। 'चुल्लवग्ग' नामक दूसरे ग्रंथ ( चुल्लवग्ग ६. १३. १ ) में स्वयं बुद्धकी यह आज्ञा है, कि यद्यपि धर्मका निरूपण करनेवाला भिक्षु नया हो, तथापि वह ऊँचे आसनपर बैठे और उन वयोवृद्ध भिक्षुओकोभी उपदेश करे, जिन्होंने उसके पहले दीक्षा पाई हो। यह कथा सब लोग जानते हैं, कि प्रल्हादने अपने पिता हिरण्यकशिपुकी अवज्ञा करके भगवत्प्राप्ति कैसे कर ली थी। इससे यह जान पड़ता है कि छोटेबड़ेकाही नहीं तो जब कभी पिता-पुत्रके सर्वमान्य नातेसेभी कोई दूसरा अधिक बड़ा संबंध उपस्थित होता है, तब उतने समयके लिये निरुपाय होकर पिता-पुत्रका नाता भूल जाना पड़ता है। परंतु ऐसे अवसरके न होते हुएभी, यदि कोई मुँहज़ोर लड़का उक्त नीतिका अवलंब करके अपने पिताको गालियाँ देने लगे, तो वह केवल पशुके समान समझा जाएगा। पितामह भीष्मने युधिष्ठिरसे कहा है, ‘ गुरुर्गरीयान् पितृतो मातृतश्चेति मे मतिः ’ ( मभा. शां. १०८. १७ ) - अर्थात् गुरु, माता-पितामेभी श्रेष्ठ है; परंतु महाभारतमें यहभी लिखा है, कि एक समय मरुत्त राजाके गुरुने लोभवश होकर स्वार्थके लिये उसका त्याग किया, तब मरुत्तने कहा :- गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथप्रतिपन्नस्य न्याय्यं भवति शासनम् । “ यदि कोई गुरु इस बातका विचार न करे, कि क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये; और यदि वह अपनेही घमंडमें रहकर टेढ़े रास्तेमे चले, तो उसको

  • ‘धम्मपद’ ग्रंथका अंग्रेजी अनुवाद ‘प्राच्यधर्म-पुस्तकमाला’ ( Sacred Books of the East, Vol. X ) में किया गया है; और चुल्लवग्गका अनुवादभी उसी मालाके Vol. XVII और XX में प्रकाशित हुआ है। धम्मपदका पाली श्लोक यह है :- न तेन थेरो होति येनस्स पलितं सिरो । परिपक्को वयो तस्स मोघजिण्णो ति वुच्चति ॥ ‘थेर’ शब्द बुद्ध भिक्षुओंके लिये प्रयुक्त हुआ है। यह संस्कृत 'स्थविर'का अपभ्रंश है।

कर्मजिज्ञासा ४५ शासन करना उचित है।” उक्त श्लोक महाभारतमें चार स्थानोंमें पाया जाता है (मभा. आ. १४२. ५२, ५३; उ. १७९, २४; शां. ५७. ७; १४०. ४८)। इनमेंसे पहले स्थानमें वही पाठ है, जो ऊपर दिया गया है। अन्य स्थानोंमें चौथे चरणके स्थानमें “दण्डो भवति शाश्वतः” “अथवा परित्यागो विधीयते” यह पाठांतरभी है। परंतु वाल्मीकिरामायण (रामा. २. २१. १३) में जहाँ यह श्लोक है, वहाँ ऐसाही पाठ है, जैसा ऊपर दिया गया है। इसलिये हमने इस ग्रंथमें उसीको स्वीकार किया है। इस श्लोकमें जिस तत्त्वका वर्णन किया गया है, उसीके आधारपर भीष्म पितामहने परशुरामसे और अर्जुनने द्रोणाचार्यसे युद्ध किया; और जब प्रल्हादने देखा, कि अपने गुरु, जिन्हें हिरण्यकशिपुने नियत किया है, भगवत्प्राप्तिके विरुद्ध उपदेशकर रहे हैं, तब उसने इसी तत्त्वके अनुसार उनका निषेध किया है। शांतिपर्वमें भीष्म पितामह श्रीकृष्णसे कहते हैं, कि यद्यपि गुरु पूजनीय हैं, तथापि उसकोभी नीतिकी मर्यादाका पालन करना चाहिये; नहीं तो- समयत्यागिनो लुब्धान् गुरून्नपि च केशव । निहन्ति समरे पापान् क्षत्रियः स हि धर्मवित् ॥ “हे केशव ! जो गुरु मर्यादा, नीति अथवा शिष्टाचारका भंग करते हैं और जो लोभी या पापी हैं, उन्हें लड़ाईमें मारनेवाला क्षत्रियही धर्मज्ञ कहलाता है” (मभा. शां. ५५. १६)। इसी तरह तैत्तिरीयोपनिषदमेंभी प्रथम ‘आचार्य देवो भव’ कहकर उसीके आगे कहा है, कि हमारे जो कर्म अच्छे हों उन्हींका अनुकरण करो; औरोंका नहीं- ‘यान्यस्माकं सुचरितानि। तानि त्वयोपास्यानि, नो इतराणि’ (तै. १. ११. २)। इससे उपनिषदोंका वह सिद्धान्त प्रकट होता है, कि यद्यपि पिता और आचार्यको देवताके समान मानना चाहिये; तथापि यदि वे शराब पीते हों, तो पुत्र और छात्रको अपने पिता या आचार्यका अनुकरण नहीं करना चाहिये क्योंकि नीतिकी मर्यादा और धर्मका अधिकार माँ-बाप या गुरुसे अधिक बलवान् होता है। मनुजीकी निम्न आज्ञाकाभी यही रहस्य है- “धर्मका पालन करो; यदि कोई धर्मका नाश करेगा; अर्थात् धर्मकी आज्ञाके अनुसार आचरण नहीं करेगा; तो धर्म उस मनुष्यका नाश किये बिना नहीं रहेगा।” (मनु. ८. १४-१६) राजा तो गुरुसेभी अधिक श्रेष्ठ एक देवता है (मनु. ७. ८ और मभा. शां. ६८. ४०); परंतु वहभी इस धर्मसे मुक्त नहीं हो सकता। यदि वह इस धर्मका त्याग कर देगा, तो उसका नाश हो जाएगा- यह बात मनुस्मृतिमें कही गई है; और महाभारतमें वही भाव, वेन तथा खनीनेत्र राजाओंकी कथामें, व्यक्त किया गया है (मनु. ७. ४१ और ८. १२८; मभा. शां. ५९. ९२, १०० तथा अश्व. ४)। अहिंसा, सत्य और अस्तेयके साथ इंद्रिय-निग्रहकीभी गणना सामान्य धर्ममें की जाती है (मनु. १०. ६३)। काम, क्रोध, लोभ आदि मनुष्यके शत्रु हैं। इस- लिये जबतक मनुष्य इनको जीत नहीं लेगा, तबतक उसका या समाजका कल्याण

४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र नहीं होगा। यह उपदेश सब शास्त्रोंमें किया गया है। विदुरनीति और भगवद्- गीतामेंभी कहा है :- त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत् ॥ “ काम, क्रोध और लोभ ये तीनों नरकके द्वार हैं। इनसे हमारा नाश होता है। इस लिये इनका त्याग करना चाहिये ” ( गीता १६. २१. मभा. उ. ३२. ७० ) । परंतु गीताहीमें भगवान् श्रीकृष्णने अपने स्वरूपका यह वर्णन किया है, “ धर्माऽविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ” - हे अर्जुन ! प्राणिमात्रमें धर्मके अनुकूल जो 'काम' है, वहीमैं हूँ ( गीता ७. ११ ) । इससे यह बात सिद्ध होती है, कि जो 'काम'- धर्मके विरुद्ध है वही नरकका द्वार है। इसके अतिरिक्त जो दूसरे प्रकारका 'काम' है, अर्थात् जो धर्मके अनुकूल है, वह ईश्वरको मान्य है। मनुनेभी यही कहा है - “ परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ ” - जो अर्थ और काम धर्मके विरुद्ध हो उनका त्याग कर देना चाहिये ( मनु. ४. १७६ ) । यदि सब प्राणी कलसे 'काम' का त्याग कर दें और मृत्युपर्यंत ब्रह्मचर्यव्रतसे रहनेका निश्चय कर लें, तो सौ-पचास वर्षोहीमें सारी सजीव सृष्टिका लय हो जाएगा; और जिस सृष्टिकी रक्षाके लिये भगवान् बार बार अवतार धारण करते हैं, उसका अल्पकालहीमें उच्छेद हो जाएगा। यह बात सच है कि, काम और क्रोध मनुष्यके शत्रु हैं; परंतु कब ? जब वे अपने वशमें न रहें तब। यह बात मनु आदि शास्त्रकारोंको संमत है, कि सृष्टिका क्रम जारी रखनेके लिये - उचित मर्यादाके भीतर - काम और क्रोधकी अत्यंत आवश्यकता है ( मनु. ५. ५६ ) । इन प्रबल मनोवृत्तियों का उचित रीतिसे निग्रह करना ही सब सुधारोंका प्रधान उद्देश्य है, उनका नाश करना कोई सुधार नहीं कहा जा सकता; क्योंकि भागवत ( भाग. ११. ५. ११ ) में कहा है :- लोके व्यवायामिषमद्यसेवा नित्यास्ति जन्तोर्नहि तत्र चोदना । व्यवस्थितिस्तेषु विवाहयज्ञसुराग्रहैरासु निवृत्तिरिष्टा ॥ “ इस दुनियामें किसीसे यह कहना नहीं पड़ता, कि तुम मैथुन, मांस और मदिराका सेवन करो। ये तीनों मनुष्यको स्वभावहीसे पसंद हैं। इन तीनोंकी कुछ व्यवस्था कर देनेके लिये - अर्थात् इनके उपयोगको कुछ मर्यादित करके व्यवस्थित कर देनेके लिये - ( शास्त्रकारोंने ) अनुक्रमसे विवाह, सोमयाग और सौत्रामणी यज्ञकी योजना की है; परंतु तिस परभी निवृत्ति अर्थात् निष्काम आचरण इष्ट है । ” यहाँ यह बात ध्यानमें रखने योग्य है, कि जब 'निवृत्ति' शब्दका संबंध पंचम्यंत पदके साथ होता है, तब उसका अर्थ “ अमुक वस्तुसे निवृत्ति अर्थात् अमुक कर्मका सर्वथा त्याग ” हुआ करता है; तोभी कर्मयोगमें 'निवृत्ति' विशेषण कर्महीके लिये प्रयुक्त हुआ है। इसलिये 'निवृत्तिकर्म'का अर्थ “ निष्काम बुद्धिसे किया जानेवाला कर्म ” होता है। यही अर्थ मनुस्मृति और भागवतपुराणमें स्पष्ट रीतिसे पाया जाता

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है ( मनु. १२. ८९; भाग. ११. १०. १ और ७. १७. ४७ ) क्रोधके विषयमें किरात- काव्यमें ( १. ३३) भारविका कथन है :- अमर्षशून्येन जनस्य जन्तुना न जातहार्देन न विद्विषादरः । “ जिस मनुष्यको अपमानित होनेपरभी क्रोध नहीं आता, उसकी मित्रता और द्वेष दोनों बराबर हैं ।” क्षात्रधर्मके अनुसार देखा जाय तो विदुलाने यही कहा है :- एतावानेव पुरुषो यदमर्षी यदक्षमौ । क्षमावान्निरमर्षश्च नैव स्त्री न पुनः पुमान् ॥ “ जिस मनुष्यको ( अन्यायपर ) क्रोध आता है, जो (अपमान को) सह नहीं सकता, वही पुरुष कहलाता है । जिस मनुष्यमें क्रोध या चिढ़ नहीं है, वह नपुंसकहीके समान है ” ( मभा. उ. १३२. ३३ ) । इस बातका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है, कि इस जगतके व्यवहारके लिये न तो सदा तेज या क्रोधही उपयोगी है, और न क्षमा । यही बात लोभके विषयमें कही जा सकती है; क्योंकि संन्यासीकोभी मोक्षकी इच्छा होती है । व्यासजीने महाभारतमें अनेक स्थानोपर भिन्न भिन्न कथाओके द्वारा यह प्रतिपादन किया है, कि शूरता, धैर्य, दया, शील, मित्रता, समता आदि सब सद्गुण अपने अपने विरुद्ध गुणोके अतिरिक्त देश-काल आदिसे मर्यादित हैं। यह नहीं समझना चाहिये, कि कोई एकही सद्गुण सभी समय शोभा देता है । भर्तृहरिका कथन है :- विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः । “ संकटके समय धैर्य, अभ्युदयके समय ( अर्थात् जब शासन करनेकी सामर्थ्य हो तब ) क्षमा, सभामें वक्तृता और युद्धमें शूरता शोभा देती है ” ( नीति. ६३ ) । शांतिके समय ‘उत्तर’के समान बकबक करनेवाले पुरुष कुछ कम नहीं हैं । घर बैठे बैठे अपनी स्त्रीकी नथनीमेंसे तीर चलानेवाले कर्मवीर बहुतेरे होंगे; पर उनमेंसे रणभूमिपर धनुर्धर कहलानेवाला एक-आधही दीख पड़ता है । धैर्य आदि सद्गुण ऊपर लिखे समयपरही शोभा देते हैं, इतनाही नहीं, किंतु ऐसे प्रसंगके बिना उनकी सच्ची परीक्षाभी नहीं होती । सुखके साथी तो बहुतेरे हुआ करते हैं; परंतु “ निकष- ग्रावा तु तेषां विपत् ” – विपत्तिही उनकी परीक्षाकी सच्ची कसौटी है। ‘प्रसंग’ शब्दहीमें देश-कालके अतिरिक्त पात्रापात्र आदि बातोंकाभी समावेश हो जाता है । समतासे बढ़कर कोईभी गुण श्रेष्ठ नहीं है । भगवद्गीतामें स्पष्ट रीतिसे लिखा है, “ समः सर्वेषु भूतेषु ” यही सिद्ध पुरुषोंका लक्षण है । परंतु समता कहते किसे हैं ? यदि कोई मनुष्य योग्यता-अयोग्यताका विचार न करके सब लोगोंको समान रूपसे दान करने लगे, तो क्या हम उसे अच्छा कहेंगे ? इस प्रश्नका निर्णय भगवद्- गीताहीमें इस प्रकार किया है – “ देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं विदुः ” –

४८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र देश, काल और पात्रता का विचार करके जो दान किया जाता है, वही सात्त्विक कहलाता है (गीता १७. २०)। कालकी मर्यादा सिर्फ़ वर्तमान कालहीके लिये नहीं होती। ज्यों ज्यों समय बदलता जाता है, त्यों त्यों व्यावहारिक धर्ममेंभी परिवर्तन होता जाता है। इसलिये जब प्राचीन समयकी किसी बातकी योग्यता या अयोग्यताका निर्णय करना हो, तब उस समयके धर्म-अधर्मसंबंधी विश्वासकाभी अवश्य विचार करना पड़ता है (मनु. १. ८५)। और व्यास (महा. शां. २५९. ८) कहते हैं :- अन्ये कृतयुगे धर्मास्त्रेतायां द्वापरेऽपरे । अन्ये कलियुगे नॄणां युगह्रासानुरूपतः ॥ “युगमानके अनुसार कृत, त्रेता, द्वापर और कलिके धर्मभी भिन्न भिन्न होते हैं।” महाभारत (महा. आ. १२२; और ७६) में यह कथा है, कि प्राचीन कालमें स्त्रियोंके लिये विवाहकी मर्यादा नहीं थी; वे इस विषयमें स्वतंत्र और अनावृत थीं; परंतु जब इस आचरणका बुरा परिणाम दीख पड़ा तब श्वेतकेतुने विवाहकी मर्यादा स्थापित कर दी; और मदिरापानका निषेधभी पहले पहल शुक्राचार्यहीने किया। तात्पर्य यह है, कि जिस समय ये नियम जारी नहीं थे, उस समयके धर्म-अधर्मका और उसके बादके धर्म-अधर्मका विवेचनभी भिन्न भिन्न रीतिसे किया जाना चाहिये। इसी तरह यदि वर्तमान समयका प्रचलित धर्म आगे चलकर बदल जाय तो उसके साथ भविष्य कालके धर्म अधर्मका विवेचनभी भिन्न रीतिसे किया जाएगा। कालमानके अनुसार देशाचार, कुलाचार और जातिधर्मकाभी विचार करना पड़ता है। क्योंकि आचारही सब धर्मोंकी जड़ है। तथापि आचारोंमेंभी बहुत भिन्नता हुआ करती है। पितामह भीष्म कहते हैं - न हि सर्वहितः कश्चिदाचारः संप्रवर्तते । तेनैवान्यः प्रभवति सोऽपरं बाधते पुनः ॥ “ऐसा आचार नहीं मिलता, जो हमेशा सब लोगोंको समान हितकारक हो। यदि किसी एक आचारका स्वीकार किया जाय, तो दूसरा उससे बढ़कर मिलता है; यदि इस दूसरे आचारका स्वीकार किया जाय, तो वह किसी तीसरे आचारका विरोध करता है” (महा. शां. २५९. १७. १८)। जब आचारोंमें ऐसी भिन्नता हो, तब भीष्म पितामहके कथनके अनुसार तारतम्य अथवा सार-असार-दृष्टिसे विचार करना चाहिये। कर्म-अकर्म या धर्म-अधर्मके विषयमें सब संदेहोंका यदि निर्णय करने लगें तो दूसरा महाभारतही लिखना पड़ेगा। उक्त विवेचनसे पाठकोंके ध्यानमें यह बात आ जाएगी, कि गीताके आरंभमें क्षात्र धर्म और बंधुप्रेमके बीच झगड़ा उत्पन्न हो जानेमें अर्जुनपर जो गुजरी वह कुछ लोक-विलक्षण नहीं है; इस संसारमें ऐसी कठिनाइयाँ कार्यकर्ताओं और बड़े आदमियोंपर अनेक बार आयाही करती हैं;

कर्मजिज्ञासा ४९ और जब ऐसी कठिनाइयाँ आती हैं, तब कभी अहिंसा और आत्मरक्षाके बीच; कभी सत्य और सर्वभूतहितमें, कभी शरीररक्षा और कीर्तिमें, और कभी भिन्न भिन्न नातोंसे उपस्थित होनेवाले कर्तव्योंमें झगड़ा होने लगता है। तब शास्त्रोक्त, सामान्य तथा सर्वमान्य नीति-नियमोंसे काम नहीं चलता; और उनके लिये अनेक अपवाद उत्पन्न हो जाते हैं। ऐसे विकट समयपर साधारण मनुष्योंसे लेकर बड़े पंडितोंकोभी यह जाननेकी स्वाभाविक इच्छा होती है, कि कार्य-अकार्यकी व्यवस्था - अर्थात् कर्तव्य-अकर्तव्य धर्मका निर्णय - करनेके लिये कोई चिरस्थायी नीति अथवा युक्ति है या नहीं। यह बात सच है, कि शास्त्रोंमें दुर्भिक्ष जैसे संकटके समय 'आपद्धर्म' कहकर कुछ सुविधाएं दी गई हैं। उदाहरणार्थ, स्मृतिकारोंने कहा है, कि यदि आपत्कालमें ब्राह्मण कहींभी अन्न ग्रहणकर ले, तो वह दोषी नहीं होता; और उषस्ति चाक्रायणके इसी तरह बर्ताव करनेकी कथाभी छांदोग्योपनिषद (याज्ञ. ३. ४१; छां. १. १०) में है; परंतु उसमें और उक्त कठिनाइयोंमें बहुत भेद हैं। दुर्भिक्ष जैसे आपत्कालमें शास्त्रधर्म और भूख, प्यास आदि इंद्रियवृत्तियोंके बीचमेंही झगड़ा हुआ करता है। उस समय हमको इंद्रियाँ एक ओर खींचा करती हैं और शास्त्रधर्म दूसरी ओर खींचा करता है। परंतु जिन कठिनाइयोंका वर्णन ऊपर किया गया है, उनमेंसे बहुतेरी ऐसी हैं, कि उस समय इंद्रियवृत्तियोंका और शास्त्रका कुछभी विरोध नहीं होता; किंतु ऐसे दो धर्मोंमें परस्पर-विरोध उत्पन्न हो जाता है, जो शास्त्रोंहीसे विहित हैं। और फिर उस समय सूक्ष्म विचार करना पड़ता है, कि किस बातका स्वीकार किया जाए । यद्यपि कोई मनुष्य अपनी बुद्धिके अनुसार इनमेंसे कुछ बातोंका निर्णय प्राचीन सत्पुरुषोंके ऐसेही समयपर किये हुए बर्तावसे कर सकता है, तथापि अनेक प्रसंग ऐसे होते हैं, कि उनमें बड़े बड़े बुद्धिमानोंकाभी मन चक्करमें पड़ जाता है। कारण यह है, कि जितना अधिक विचार किया जाता है, उतनीही अधिक उपपत्तियाँ और तर्क उत्पन्न होते हैं; और अंतिम निर्णय असंभव-सा हो जाता है। जब उचित निर्णय होने नहीं पाता तब अधर्म या अपराध हो जानेकीभी संभावना होती है। इस दृष्टिमे विचार करनेपर मालूम होता है, कि धर्म-अधर्मका या कर्म-अकर्मका विवेचन एक स्वतंत्र शास्त्रही है, जो न्याय तथा व्याकरणसेभी अधिक गहन है। प्राचीन संस्कृत ग्रंथोंमें 'नीतिशास्त्र' शब्दका उपयोग प्रायः राज- नीतिशास्त्र विषयके लियेही किया गया है; और कर्तव्य-अकर्तव्यके विवेचनको 'धर्मशास्त्र' कहते हैं। परंतु आज-कल 'नीति' शब्दहीमें कर्तव्य अथवा सदा- चरणकाभी समावेश किया जाता है; इसलिये हमने वर्तमान पद्धतिके अनुसार, इस ग्रंथमें धर्म-अधर्म या कर्म-अकर्मके विवेचनहीको 'नीतिशास्त्र' कहा है। नीति, कर्म-अकर्म या धर्म-अधर्मके विवेचनका यह शास्त्र बड़ा गहन है; यह भाव प्रकट करनेहीके लिये "सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य " - अर्थात् धर्म या व्यावहारिक नीतिधर्मका स्वरूप सूक्ष्म है - यह वचन महाभारतमें कई जगह उपयुक्त हुआ है। पाँच गी. र. ४

५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पांडवोंने मिलकर अकेली द्रौपदीके साथ विवाह कैसे किया ? द्रौपदीके वस्त्रहरणके समय भीष्म-द्रोण आदि सत्पुरुष शून्य-हृदय होकर चुपचाप क्यों बैठे रहे ? दुष्ट दुर्योधनकी ओरसे युद्ध करते समय भीष्म और द्रोणाचार्यने अपने पक्षका समर्थन करनेके लिये जो यह सिद्धान्त बतलाया, कि " अर्थस्य पुरुषो दासः दासस्त्वर्थो न कस्यचित् " - पुरुष अर्थ (संपत्ति) का दास है, अर्थ किसी का दास नहीं हो सकता

  • (मभा. भी. ४३. ३५) यह तब सच है या झूठ ? यदि सेवाधर्म कुत्तेकी वृत्तिके समान निंदनीय माना है - जैसे " सेवा श्ववृत्तिराख्याता " ( मनु. ४. ६ ), तो अर्थके दास हो जानेके बदले भीष्म आदिओने दुर्योधनकी सेवाहीका त्याग क्यों नहीं कर दिया ? इन अनेकों प्रश्नका निर्णय करना बहुत कठिन है; क्योंकि प्रसंगोंके अनुसार भिन्न भिन्न मनुष्योंके भिन्न भिन्न अनुमान या निर्णय हुआ करते हैं। यही नहीं समझना चाहिये, कि धर्मके तत्त्व सिर्फ़ सूक्ष्मही हैं - " सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य " - (मभा. अनु. १०. ७०); किंतु महाभारत ( बन. २०८. २ ) में यहभी कहा है, कि " बहुशाखा ह्यनंतिका " - अर्थात् उसकी शाखाएँभी अनेक हैं, और उससे निकलनेवाले अनुमानभी भिन्न भिन्न हैं। तुलाधार और जाजलिके संवादमें धर्मका विवेचन करते समय तुलाधारभी यही कहता है, कि " सूक्ष्मत्वान्न स विज्ञातु शक्यते बहुनिह्नवः " अर्थात् धर्म बहुत सूक्ष्म और पेचीदा होता है । इसलिये वह समझमें नहीं आता (मभा. शां. २६१. ३७)। महाभारतकार व्यासजी इन सूक्ष्म प्रसंगोंको अच्छी तरह जानते थे; इसलिये उन्होंने यह समझा देनेके उद्देश्यहीसे अपने ग्रंथमें अनेक भिन्न भिन्न कथाओंका संग्रह किया है, कि प्राचीन समयके सत्पुरुषोंने ऐसे कठिन प्रसंगोंपर कैसा बर्ताव किया था । परंतु शास्त्र-पद्धतिसे सब विषयोंका विवेचन करके उसका सामान्य रहस्य महाभारत सरीखे धर्मग्रंथमें कहीं बतला देना आवश्यक था । इस रहस्य या मर्मका प्रतिपादन - अर्जुनकी कर्तव्य-मूढ़ताको दूर करनेके लिये भगवान् श्रीकृष्णने पहले जो उपदेश दिया था, उसीके आधारपर - व्यासजीने भगवद्गीतामें किया है। इससे 'गीता' महाभारतका रहस्योपनिषद् और शिरोभूषण हो गयी है । और महाभारत गीतामें प्रतिपादित मूलभूत कर्मत-त्त्वोंका उदाहरणसहित विस्तृत व्याख्यान हो गया है । इस बातकी ओर उन लोगोंको अवश्य ध्यान देना चाहिये; जो यह कहा करते हैं, कि महाभारत ग्रंथमें 'गीता' बादमें घुसेड़ दी गई है । हम तो यही समझते हैं, कि यदि गीताकी कोई अपूर्वता या विशेषता है, तो वह यही है, कि जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है । कारण यह है, कि यद्यपि केवल मोक्षशास्त्र अर्थात् वेदान्तका प्रतिपादन करनेवाले उपनिषद् आदि, तथा अहिंसा आदि सदाचारके सिर्फ़ नियम बनानेवाले स्मृति आदि अनेक ग्रंथ हैं; तथापि वेदान्तके गहन तत्त्वज्ञानके आधारपर 'कार्याकार्यव्यवस्थिति' करनेवाला, गीताके समान कोई दूसरा प्राचीन ग्रंथ संस्कृत साहित्यमें दीख नहीं पड़ता । गीताभक्तोंको यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं, कि 'कार्याकार्यव्यवस्थिति' शब्द गीताही (गीता १६. २४) में

कर्मजिज्ञासा ५१ प्रयुक्त हुआ है। यह शब्द हमारा मनगढ़ंत नहीं है। भगवद्गीताहीके समान योग- वासिष्ठमेंभी वसिष्ठ मुनिने श्रीरामचंद्रजीको ज्ञान-मूलक प्रवृत्तिमार्गहीका उपदेश किया है। परंतु यह ग्रंथ गीताके बादका है; और उसमें गीताहीका अनुकरण किया है। अतएव ऐसे ग्रंथोंसे गीताकी उस अपूर्वता या विशेषतामें-जो ऊपर कही गई है-कोई बाधा नहीं आती।

तीसरा प्रकरण कर्मयोगशास्त्र तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् । * — गीता २. ५० यदि किसी मनुष्यको किसी शास्त्रके जाननेकी इच्छा पहलेहीसे न हो, तो वह उस शास्त्रके ज्ञानको पानेका अधिकारी नहीं हो सकता । ऐसे अधिकार- रहित मनुष्यको उस शास्त्रकी शिक्षा देना मानों चलनीमें दूध दुहनाही है । शिष्यको तो इस शिक्षासे कुछ लाभ होता नहीं; परंतु गुरुकोभी निरर्थक श्रम करके समय नष्ट करना पड़ता है । जैमिनी और बादरायणके सूत्रोंके आरंभमें इसी कारणसे “ अथातो धर्मजिज्ञासा ” और “ अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ” कहा हुआ है। जैसे ब्रह्मो- पदेश मुमुक्षुओंको और धर्मोपदेश धर्मेच्छुओंको देना चाहिये; वैसेही कर्मशास्त्रोपदेश उसी मनुष्यको देना चाहिये, जिसे यह जाननेकी इच्छा या जिज्ञासा हो, कि संसारमें कर्म कैसे करना चाहिये । इसीलिये हमने पहले प्रकरणमें, 'अथातो' कहकर, दूसरे प्रकरणमें 'कर्मजिज्ञासा' का स्वरूप और कर्मयोगशास्त्रका महत्त्व बतलाया है । जबतक पहलेहीसे इस बातका अनुभव न कर लिया जाय, कि अमुक काममें अमुक रुकावट है, तबतक उस रुकावटसे छुटकारा पानेकी शिक्षा देनेवाले शास्त्रका महत्त्व ध्यानमें नहीं आता; और महत्त्वको न जाननेसे केवल रटा हुआ शास्त्र समयपर ध्यानमें रहताभी नहीं है। यही कारण है, कि जो सद्गुरु हैं, वे पहले यह देखते हैं, कि शिष्यके मनमें जिज्ञासा है या नहीं; और यदि जिज्ञासा न हो, तो वे पहले उसीको जागृत करनेका प्रयत्न किया करते हैं । गीतामें कर्मयोगशास्त्रका विवेचन इसी पद्धतिसे किया गया है । जब अर्जुनके मनमें यह शंका आई, कि जिस लड़ाईमें मेरे हाथसे पितृवध और गुरुवध होगा, तथा जिसमें सभी राजाओं और अपने सब बंधुओंका नाश हो जाएगा, उसमें शामिल होना उचित है या अनुचित; और जब वह युद्धसे पराङ्मुख होकर संन्यास लेनेको तैयार हुआ; और जब भगवानके इस सामान्य युक्तिवादसेभी उसके मनका समाधान नहीं हुआ, कि “समयपर किये जानेवाले

  • “इसलिये तू योगका आश्रय ले । कर्म करनेकी जो रीति, चतुराई या कुशलता है उसे योग कहते हैं” यह 'योग' शब्दकी व्याख्या अर्थात लक्षण है। इसके संबंधमे अधिक विचार इसी प्रकरणमे आगे चलकर किया है।

कर्मयोगशास्त्र ५३ कमका त्याग करना मूर्खता और दुर्बलताका सूचक है; इससे तुझे स्वर्ग तो मिलेगाही नहीं, उलटे दुष्कीर्ति अवश्य होगी।" तब श्रीभगवानने पहले "अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे" अर्थात् जिस बातका शोक नहीं करना चाहिये, उसीका तो तू शोक कर रहा है; और साथ साथ ब्रह्मज्ञानकीभी बड़ी बड़ी बातें छाँट रहा है - कहकर अर्जुनका कुछ थोड़ा-सा उपहास किया; और फिर उसको कर्मके ज्ञानका उपदेश दिया। अर्जुनकी शंका निराधार नहीं थी। गत प्रकरणमें हमने यह दिखलाया है, कि अच्छे अच्छे पंडितोंकीभी कभी कभी "क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये?" यह प्रश्न चक्करमें डाल देता है। परंतु कर्म-अकर्मकी चिंतामें अनेक अड़चनें आती हैं, इसलिये कर्म छोड़ देना उचित नहीं है। विचारवान् पुरुषोंको ऐसी युक्ति अर्थात् 'योग'का स्वीकार करना चाहिये, जिससे सांसारिक कर्मोंका लोप तो होने न पावे, और कर्माचरण करनेवाला किसी पाप या बंधनमेंभी न फँसे; - यह कहकर श्रीकृष्णने अर्जुनको पहले यही उपदेश दिया है, "तस्माद्योगाय युज्यस्व" - अर्थात् तृभी इसी युक्तिका स्वीकार कर। यही 'योग' कर्मयोगशास्त्र है। और जब कि यह बात प्रगट है, कि अर्जुनपर आया हुआ संकट कुछ लोक-विलक्षण या अनोखा नहीं था - ऐसे अनेक छोटे-बड़े संकट संसारमें सभी लोगोंपर आया करते हैं - तब तो यह बात आव- श्यक है, कि इस कर्मयोगशास्त्रका जो विवेचन भगवद्गीतामें किया है, उसे हर- एक मनुष्य सीखे। किसीभी शास्त्रके प्रतिपादनमें कुछ मुख्य और गूढ़ अर्थको प्रकट करनेवाले शब्दोंका प्रयोग किया जाता है। अतएव उनके सरल अर्थको पहले जान लेना चाहिये; और यहभी देख लेना चाहिये, कि उस शास्त्रके प्रतिपादनकी मूल शैली कैसी है। नहीं तो फिर उसके समझनेमें कई प्रकारकी आपत्तियाँ और बाधाएँ उत्पन्न होती हैं। इसलिये कर्मयोगशास्त्रके कुछ मुख्य मुख्य शब्दोंके अर्थकी परीक्षा यहाँपर की जाती है। सबसे पहला शब्द 'कर्म' है। 'कर्म' शब्द 'कृ' धातुसे बना है। उसका अर्थ 'करना, व्यापार, हलचल' होता है; और इसी सामान्य अर्थमें गीतामें उसका उप- योग हुआ है - अर्थात् यही अर्थ गीतामें विवक्षित है। ऐसा कहनेका कारण यही है, कि मीमांसाशास्त्रमें और अन्य स्थानोंपरभी इस शब्दके जो संकुचित अर्थ दिये गये हैं, उनके कारण पाठकोंके मनमें कुछ भ्रम उत्पन्न न होने पावे। किसीभी धर्मको लीजिये; उसमें ईश्वर प्राप्तिके लिये कुछ-न-कुछ कर्म करनेके लिये कहा है। प्राचीन वैदिक धर्मके अनुसार देखा जाय, तो यज्ञयागही वह कर्म है; जिससे ईश्वरकी प्राप्ति होती है। वैदिक ग्रंथोंमें यज्ञ-यागकी विधि बताई गयी हैं; परंतु इसके विषयमें कहीं कहीं परस्पर-विरोधी वचनभी पाये जाते हैं। अतएव उनकी एकता और मेल दिखलानेकेही लिये जैमिनीके पूर्वमीमांसाशास्त्रका प्रचार हुआ है। जैमिनीके मतानुसार वैदिक या श्रौत यज्ञ-याग करनाही प्रधान और प्राचीन धर्म

५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र है। मनुष्य जो कुछ करता है, वह सब यज्ञके लिये करता है। यदि उसे धन कमाना है, तो यज्ञके लिये और धान्य-संग्रह करना है, तो यज्ञहीके लिये (महा. शां. २६. २५)। जबकि यज्ञ करनेकी आज्ञा वेदोंहीने दी है, तब यज्ञके लिये मनुष्य कुछभी कर्म करे; वह उसको बंधक नहीं होगा। वह कर्म यज्ञका एक साधन है - वह स्वतंत्र रीतिसे साध्य वस्तु नहीं है। इसलिगे यज्ञसे जो फल मिलनेवाला हे, उसीमें उस कर्मके फलकाभी समावेश हो जाता है - उस कर्मका कोई अलग फल नहीं होता। परंतु यज्ञके लिये किये गये ये कर्म यद्यपि स्वतंत्र फल देनेवाले नहीं हैं, तथापि स्वयं यज्ञसे स्वर्गप्राप्ति (अर्थात् मीमांसकोंके मतानुसार एक प्रकारकी सुखप्राप्ति) होती है; और इस स्वर्गप्राप्तिके लियेही यज्ञकर्ता मनुष्य बड़े चावसे यज्ञ करता है। इसीसे स्वयं यज्ञकर्म 'पुरुषार्थ' कहलाता है; क्योंकि जिस वस्तुसे किसी मनुष्यकी प्रीति होती है और जिसे पानेकी उसके मनमें इच्छा होती है; उसे 'पुरुषार्थ' कहते हैं (जै. सू. ४. १. १. और २)। यज्ञका पर्यायवाची 'ऋतु' शब्द है। इसलिये 'यज्ञार्थ' के बदले 'ऋत्वर्थ' भी कहा करते हैं। इस प्रकार सब कर्मोंके दो वर्ग हो गये : एक 'यज्ञार्थ' (ऋत्वर्थ) कर्म, अर्थात् जो स्वतंत्र रीतिसे फल नहीं देते, अतएव अबंधक हैं; और दूसरे 'पुरुषार्थ' कर्म, अर्थात् जो पुरुषको लाभकारी होनेके कारण बंधक है। संहिता और ब्राह्मण ग्रंथोंमें सारा वर्णन यज्ञ-यागादिकोंकाही है। ऋग्वेद संहितामें इंद्र आदि देवताओंकी स्तुति-संबंधी सूक्त हैं, तथापि मीमांसकगण कहते हैं, कि सब श्रुतिग्रंथ यज्ञ आदि कर्मोंहीके प्रतिपादक हैं, क्योंकि उनका विनियोग यज्ञके समयमेंही किया जाता है। इन कर्मठ, याज्ञिक या केवल कर्मवादियोंका कहना है, कि वेदोक्त यज्ञ-याग आदि कर्म करनेसेही स्वर्गप्राप्ति होती है, अन्यथा नहीं होती। चाहे ये यज्ञ-याग अज्ञानसे किये जायें या ब्रह्मज्ञान से। यद्यपि उपनिषदोंमें ये यज्ञ ग्राह्य माने गये हैं, तथापि इनकी योग्यता ब्रह्मज्ञानसे कम ठहराई गयी है। इसलिये निश्चय किया गया है, कि यज्ञ-यागसे स्वर्गप्राप्ति भलेही हो जाय; परंतु इनके द्वारा सच्चा मोक्ष नहीं मिल सकता। मोक्षप्राप्तिके लिये ब्रह्मज्ञानहीकी नितान्त आवश्यकता है। भगवद्गीताके दूसरे अध्यायमें जिन यज्ञ-याग आदि काम्य कर्मोंका वर्णन किया है - "वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः" (गीता २. ४२)

  • वे ब्रह्मज्ञानके बिना किये जानेवाले उपर्युक्त यज्ञ-याग आदि कर्मही हैं। इसी तरह यहभी मीमांसकोंहीके मतका अनुवाद है, कि "यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः" (गीता ३. ९) अर्थात् यज्ञार्थ किये गये कर्म बंधक नहीं हैं; शेष सब कर्म बंधक हैं। इन यज्ञ-याग आदि वैदिक कर्मोंके अतिरिक्त, अर्थात् श्रौत कर्मोंके अति- रिक्त औरभी चातुर्वर्ण्यके भेदानुसार दूसरे आवश्यक धार्मिक कर्म मनुस्मृति आदि धर्मग्रंथोंमें वर्णित हैं; जैसे क्षत्रियके लिये युद्ध और वैश्यके लिये वाणिज्य। पहले पहल इन वर्णाश्रम-कर्मोंका प्रतिपादन स्मृति-ग्रंथोंमें किया गया था। इसलिये इन्हें 'स्मार्त कर्म' या 'स्मार्त यज्ञ' भी कहते हैं। इन श्रौत-स्मार्त कर्मोंके सिवा औरभी

कर्मयोगशास्त्र ५५ धार्मिक कर्म हैं; जैसे व्रत, उपवास आदि । इनका विस्तृत प्रतिपादन पहलेपहल सिर्फ़ पुराणोंमें किया गया है, इसलिये इन्हें 'पौराणिक कर्म' कह सकेंगे । इन सब कर्मोंके औरभी तीन - नित्य, नैमित्तिक और काम्य - भेद किये गये हैं। स्नान, संध्या आदि जो हमेशा किये जानेवाले कर्म हैं, उन्हें नित्यकर्म कहते हैं । इनके करनेसे कुछ विशेष फल अथवा अर्थकी सिद्धि नहीं होती; परंतु न करनेसे दोष अवश्य लगता है । नैमित्तिक कर्म उन्हें कहते हैं, जिन्हें किसी कारणके उपस्थित हो जानेसे करना पड़ता है; जैसे अनिष्ट ग्रहोंकी शांति, प्रायश्चित्त आदि, जिसकेलिये हम शांति या प्रायश्चित्त करते हैं, वह निमित्त यदि पहले न हो गया हो, तो हमें नैमित्तिक कर्म करनेकी कोई आवश्यकता नहीं। जब हम कुछ विशेष इच्छा रखकर उसकी सफलताके लिये शास्त्रानुसार कोई कर्म करते हैं, तब उसे काम्य कर्म कहते हैं; जैसे वर्षा होनेके लिये या पुत्रप्राप्तिके लिये यज्ञ करना । नित्य, नैमित्तिक और काम्य कर्मोंके सिवा कुछ और कर्म हैं; जैसे मदिरापान इत्यादि, जिन्हें शास्त्रोंने त्याज्य कहा है। इसलिये ये कर्म निषिद्ध कहलाते हैं। नित्य कर्म कौन कौन हैं, नैमित्तिक कौन कौन हैं और काम्य तथा निषिद्ध कर्म कौन कौन हैं - ये सब बातें धर्मशास्त्रोंमें निश्चित कर दी गयी हैं। यदि कोई किसी धर्मशास्त्रीसे पूछे कि अमुक पुरुषका कर्म पुण्यप्रद है या पापकारक, तो वह सबसे पहले इस बातका विचार करेगा, कि शास्त्रोंकी आज्ञाके अनुसार वह कर्म यज्ञार्थ है या पुरुषार्थ; नित्य है या नैमित्तिक; अथवा काम्य है या निषिद्ध; और इन बातोंका विचार करके फिर वह अपना निर्णय करेगा। परंतु भगवद्गीताकी दृष्टि उससेभी व्यापक और विस्तीर्ण है। मान लीजिये, कि अमुक एक कर्म शास्त्रोंमें निषिद्ध नहीं माना गया है; अथवा उसे विहित कर्मही कहा गया है - जैसे युद्धके समय क्षात्रधर्मही अर्जुनके लिये विहित कर्म था । पर इतनेहीसे यह सिद्ध नहीं होता, कि हमें वह कर्म हमेशा करतेही रहना चाहिये; अथवा उस कर्मका करना हमेशा श्रेयस्करही होगा। यह बात पिछले प्रकरणमें कही गयी है, कि कहीं कहीं तो शास्त्रकी आज्ञाएँभी परस्पर-विरुद्ध होती हैं। ऐसे समयमें मनुष्यको किम मार्ग स्वीकार करना चाहिये, इस बातका निर्णय करनेके लियें कोई युक्ति है या नहीं ? यदि है तो वह कौन-सी ? बस, यही गीताका प्रतिपाद्य विषय है। इस विषयमें कर्मके उपर्युक्त अनेक भेदोंपर ध्यान देनेकी कोई आवश्यकता नहीं। यज्ञ-याग आदि वैदिक कर्मों तथा चातुर्वर्ण्यके कर्मोंके विषयमें मीमांसकोंने जो सिद्धान्त किये हैं, वे गीतामें प्रतिपादित कर्मयोगसे कहाँतक मिलते हैं, यह दिखानेके लिये प्रसंगानुसार गीतामें मीमांसकोंके कथनकाभी कुछ विचार किया गया है; और अंतिम अध्याय (गीता १८. ६) में इसपरभी विचार किया है, कि ज्ञानी पुरुषको यज्ञयाग आदि कर्म करना चाहिये या नहीं। परंतु गीताके मुख्य प्रतिपाद्य विषयका क्षेत्र इससे व्यापक है । इसलिये गीताके प्रतिपादनमें 'कर्म' शब्दका "केवल श्रौत अथवा स्मार्त कर्म" इतनाही संकुचित अर्थ नहीं लिया जाना

५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र चाहिये; किंतु उससे अधिक व्यापक रूप लेना चाहिये । सारांश, मनुष्य जो कुछ करता है – जैसे खाना, पीना, खेलना, रहना, उठना, बैठना, श्वोसोच्छ्वास करना, हँसना, रोना, सूंघना, देखना, बोलना, सुनना, चलना, देना, लेना, सोना, जागना, मारना, लड़ना, मनन और ध्यान करना, आज्ञा या निषेध करना, दान देना, यज्ञ-याग करना, खेती या व्यापारधंधा करना, इच्छा करना, निश्चय करना, चुप रहना इत्यादि इत्यादि – ये सब भगवद्गीताके अनुसार 'कर्म' ही हैं; चाहे वे कर्म कायिक हों, वाचिक हों अथवा मानसिक हों (गीता ५. ८, ९)। और तो क्या, जीना-मरनाभी कर्मही हैं । प्रसंग आनेपर यहभी विचार करना पड़ता ह कि 'जीना या मरना' इन दो कर्मोंमेंसे किसका स्वीकार किया जाये ? इस विचारके उपस्थित होनेपर कर्म शब्दका अर्थ 'कर्तव्य कर्म' अथवा 'विहित कर्म' हो जाता है । (गीता ४. १६) । मनुष्यके कर्मके विषयमें यहाँतक विचार हो गया । अब इससे आगे बढ़कर सब चर-अचर सृष्टिके – अचेतन वस्तुकेभी – व्यापारमें 'कर्म' शब्दहीका उपयोग होता है । इस विषयका विचार आगे कर्मविपाक-प्रक्रियामें किया जाएगा । कर्म शब्दसेभी अधिक भ्रमकारक शब्द 'योग' है । आजकल इस शब्दका रूढ़ार्थ "प्राणायामादिक साधनोंसे चित्तवृत्तियों या इंद्रियोंका निरोध करना" अथवा "पातंजल सूत्रोक्त समाधि या ध्यानयोग" हैं । उपनिषदोंमेंभी इसी अर्थमें इस शब्दका प्रयोग हुआ है (कठ. ६. ११)। परंतु ध्यानमें रखना चाहिये, कि ये संकुचित अर्थ भगवद्गीतामें विवक्षित नहीं है । 'योग' शब्द 'युज्' धातुसे बना है; जिसका अर्थ "जोड़, मेल, मिलाप, एकता, एकत्र अवस्थिति" इत्यादि होता है । और ऐसी स्थितिकी प्राप्तिके "उपाय, साधन, युक्ति या कर्म" कोभी योग कहते हैं । यही सब अर्थ अमरकोश (अ. ३. ३. २२) में इस तरहसे दिये हुए हैं – "योगः संहननोपायध्यानसंगतियुक्तिषु ।" फलित ज्योतिषमें कोई ग्रह यदि इष्ट अथवा अनिष्ट हों, तो उन ग्रहोंका 'योग' इष्ट या अनिष्ट कहलाता है; और 'योगक्षेम' पदमें 'योग' शब्दका अर्थ "अप्राप्त वस्तुको प्राप्त करना" लिया गया है (गीता ९. २२) । भारतीय युद्धके समय द्रोणाचार्यको अजेय देखकर श्रीकृष्णने कहा है, कि "एको हि योगोऽस्य भवेद्वधाय" (मभा. द्रो. १८१. ३१) अर्थात् द्रोणाचार्य को जीतनेका एकही 'योग' (साधना या युक्ति) है; और आगे चलकर उन्होंने यहभी कहाना है कि हमने पूर्वकालमें धर्मकी रक्षाके लिये जरासंध आदि राजाओंको 'योग' हीसे मारा था । उद्योगपर्व (अ. १७२) में कहा गया है, कि जब भीष्मने अंबा, अंबिका और अंबालिकाको हरण किया, तब अन्य राजा लोग 'योग, योग' कहकर उनका पीछा करने लगे थे । महाभारतमें 'योग' शब्दका प्रयोग इसी अर्थमें अनेक स्थानोंपर हुआ है । गीतामें 'योग', 'योगी' अथवा योग शब्दसे बने हुए सामासिक शब्द लगभग अस्सी बार आये हैं; परंतु चार-पाँच स्थानोंको छोड़ (गीता ६. १२ और २३) योग शब्दसे 'पातंजल योग' अर्थ कहींभी अभिप्रेत नहीं

कर्मयोगशास्त्र ५७ है। सिर्फ 'युक्ति, साधन, कुशलता, उपाय, जोड़, मेल' ये ही अर्थ कुछ हेरफेरसे सारी गीतामें पाये जाते हैं। अतएव कह सकते हैं, कि गीताशास्त्रके व्यापक शब्दोंमेंसे 'योग'भी एक शब्द है; परंतु योग शब्दके उक्त सामान्य अर्थोंसेही - जैसे साधन, कुशलता, युक्ति आदिसेही - काम नहीं चल सकता। क्योंकि वक्ता इच्छाके अनुसार यह साधन संन्यासकाभी हो सकता है; कर्म और चित्तनिरोधका हो सकता है; मोक्षका अथवा औरभी किसीका हो सकता है। उदाहरणार्थ, गीतामें कहीं कहीं अनेक प्रकारकी व्यक्त सृष्टि निर्माण करनेकी भगवानकी ईश्वरी कुशलता और अद्भुत सामर्थ्यको 'योग' कहा गया है (गीता ७. २५; ९. ५; १०. ७; ११. ८) और इसी अर्थमें भगवानको 'योगेश्वर' कहा है (गीता १८. ७५)। परंतु यह गीताके 'योग' शब्दका मुख्य अर्थ नहीं है। इसलिये, वह बात स्पष्ट रीतिसे प्रकटकर देनेके लिये 'योग' शब्दसे किस विशेष प्रकारकी कुशलता, साधन, युक्ति अथवा उपायको गीतामें विवक्षित समझना चाहिये, उस ग्रंथमें योग शब्दकी व्याख्या- यों की गयी है - "योगः कर्मसु कौशलम्" (गीता २. ५०) अर्थात् कर्म करनेकी किसी विशेष प्रकारकी कुशलता, युक्ति, चतुराई अथवा शैलीको योग कहते हैं। शांकरभाष्यमेंभी 'कर्मसु कौशलम्' का यही अर्थ लिया गया है- "कर्ममें स्वभावसिद्ध रहनेवाले बंधकत्वको तोड़नेकी युक्ति"। यदि सामान्यतः देखा जाय, तो एकही कर्मको करनेके लिये अनेक 'योग' या 'उपाय' होते हैं। परंतु उनमेंसे जो उपाय या साधन उत्तम हो उसीको 'योग' कहते हैं। जैसे द्रव्य उपार्जन करना एक कर्म है। इसके अनेक उपाय या साधन हैं- जैसे : चोरी करना, जालसाजी करना, भीख मांगना, सेवा करना, ऋण लेना, मेहनत करना आदि। यद्यपि धातुके अर्थानुसार इनमेंसे हरएकको 'योग' कह सकते हैं, तथापि यथार्थ 'द्रव्यप्राप्ति-योग' उसी उपाय कहते हैं, जिससे हम अपनी "स्वतंत्रता कायम रखकर मेहनत करते हुए धन प्राप्त कर सके।" जब स्वयं भगवानने गीतामें 'योग' शब्दकी निश्चित और स्वतंत्र व्याख्या कर दी है (योगः कर्मसु कौशलम् - अर्थात् कर्म करनेकी एक प्रकारकी विशेष युक्तिको योग कहते हैं), तब सच पूछो, तो इस शब्दके मुख्य अर्थके विषयमें कुछभी शंका नहीं रहनी चाहिये; परंतु स्वयं भगवानकी बतलाई हुई इस व्याख्यापर ध्यान न दे कर टीकाकारोंने गीताका मथितार्थभी मनमाना निकाला है। अतएव इस भ्रमको दूर करनेके लिये 'योग' शब्दका कुछ अधिक स्पष्टीकरण होना चाहिये। यह शब्द पहलेपहल गीताके दूसरे अध्यायमें आया है; और वहीं इसका स्पष्ट अर्थभी बतला दिया है। भगवानने अर्जुनको पहले सांख्यशास्त्रके अनुसार यह समझा दिया, कि युद्ध क्यों करना चाहिये; इसके बाद उन्होंने कहा, कि "अब हम तुझे योगके अनुसार उपपत्ति बतलाते हैं" (गीता २. ३९)। और फिर इसका वर्णन किया है, कि जो लोग हमेशा यज्ञ-यागादि काम्य कर्मोंमें निमग्न रहते हैं और उनकी

५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बुद्धि फलाशासे कैसे व्यग्र हो जाती है (गीता २.४१-४६)। इसके पश्चात् उन्होंने यह उपदेश दिया है, कि बुद्धिको अव्यग्र, स्थिर या शांत रखकर, “आसक्तिको छोड़ दे; परंतु कर्मोंको छोड़ देनेके आग्रहमें न पड़” और “योगस्थ होकर कर्मोंका आचरण कर” (गीता २.४८)। यहींपर पहले पहल 'योग' शब्दका अर्थभी स्पष्ट कर दिया है, कि “सिद्धि और असिद्धि दोनोंमें समत्वबुद्धि रखनेको योग कहते हैं।” इसके बाद यह कहकर, कि “फलकी आशासे काम करनेकी अपेक्षा समत्वबुद्धिका यह योगही श्रेष्ठ है” (गीता २.४९) और बुद्धिकी समता हो जानेपर कर्म करनेवालेको कर्मसंबंधी पाप-पुण्यकी बाधा नहीं होती। इसलिये तू इस 'योग'को प्राप्त कर।' तुरंतही योगका यह लक्षण फिरभी बतलाया है कि “योगः कर्मसु कौशलम्” (गीता २.५०)। इससे सिद्ध होता है, कि पाप-पुण्यसे अलिप्त रहकर कर्म करनेकी जो समत्वबुद्धिरूप विशेष युक्ति पहले बतलाई गई है, वही 'कौशल' है; और इसी कुशलता अर्थात् युक्तिसे कर्म करनेको गीतामें 'योग' कहा है। इसी अर्थको अर्जुनने आगे चलकर “योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन” (गीता ६.३३) – समताका अर्थात् समत्व-बुद्धिका यह योग जो आपने बतलाया – इस श्लोकमें स्पष्ट कर दिया है। इसके संबंधमें, कि ज्ञानी मनुष्यको इस संसारमें कैसे बर्ताव करना चाहिये, श्रीशंकराचार्यके पूर्वही प्रचलित हुए वैदिक धर्मके अनुसार दो मार्ग हैं : एक मार्ग यह है, कि ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपर सब कर्मोंका संन्यास अर्थात् त्यागकर दें; और दूसरा यह, कि ज्ञानकी प्राप्ति हो जाने परभी कर्मोंको न छोड़ें – उनको जन्मभर ऐसी युक्ति के साथ करते रहें, कि उनके पाप-पुण्यकी बाधा न होने पावे। इन्हीं दो मार्गोंको गीतामें संन्यास और कर्म-योग कहा है (गीता ५.२)। संन्यास कहते हैं त्यागको, और योग कहते हैं मेल को। अर्थात् कर्मके त्याग और कर्मके मेलहीके उक्त दो भिन्न मार्ग हैं। इन्हीं दो भिन्न मार्गोंको लक्ष्य करके आगे (गीता ५.४) (सांख्य और योग) 'सांख्ययोगी' ये संक्षिप्त नामभी दिये गये हैं। बुद्धिको स्थिर करनेके लिये पातंजलयोग-शास्त्रके आसनोंका वर्णन छठे अध्यायमें है सही; परंतु वह किसके लिये है? तपस्वीके लिये नहीं; किंतु वह कर्मयोगी - अर्थात् युक्तिपूर्वक कर्म करनेवाले मनुष्यको 'समता' की युक्ति सिद्ध करनेके लिये बतलाया गया है। नहीं तो फिर “तपस्विभ्योऽधिको योगी” इस वाक्यका कुछ अर्थ ही नहीं हो सकता। इसी तरह इस अध्यायके अंत (६.४६) में अर्जुनको जो उपदेश दिया गया है, कि 'तस्माद्योगी भवार्जुन' उसका अर्थ ऐसा नहीं हो सकता, कि “हे अर्जुन ! तू पातंजल-योगका अभ्यास करनेवाला बन जा।” इसलिये उक्त उपदेशका अर्थ “योगस्थः कुरु कर्माणि” (२.४८), “तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्” (गीता २.५०), 'योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत' (४.४२) इत्यादि वचनोंके अर्थके समानही होना चाहिये। अर्थात् उसका यही अर्थ लेना उचित है कि, “हे अर्जुन ! तू युक्तिसे कर्म करनेवाला योगी अर्थात्

[Header] कर्मयोगशास्त्र ५९

कर्मयोगी बन जा।" क्योंकि यह कहनाही संभव नहीं कि, "तू पातंजल योगका आश्रय लेकर युद्धके लिये तैयार रह।" इसके पहलेही साफ़ साफ़ कहा गया है, कि "कर्मयोगेण योगिनाम्" (गीता ३. ३) अर्थात् योगी पुरुष कर्म करनेवाले होते हैं। महाभारतके (मभा. शां. ३४८. ५६) नारायणीय अथवा भागवत धर्मके विवेचनमेंभी कहा गया है, कि इस धर्मके लोग अपने कर्मोंका त्याग किये बिनाही युक्तिपूर्वक कर्म करके (सुप्रयुक्तेन कर्मणा) परमेश्वरकी प्राप्ति कर लेते हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है, कि 'योगी' और 'कर्मयोगी' दोनों शब्द गीतामें समानार्थक हैं; और इनका अर्थ "युक्तिसे कर्म करनेवाला" होता है; तथा 'कर्मयोग' शब्दका प्रयोग करनेके बदले, गीता और महाभारतमें छोटेसे 'योग' शब्दकाही अधिक उपयोग किया गया है। "मैंने तुझे जो यह योग बतलाया है, इसीको पूर्वकालमें विवस्वानसे कहा था (गीता ४. १); और विवस्वानने मनुको बतलाया था; परंतु उस योगके बादमें नष्टसा हो जानेपर फिर वही योग तुझसे कहना पड़ा" - इस अवतरणमें भगवानने जो 'योग' शब्दका तीन बार उच्चारण किया है, उसमें पातंजल-योगका विवक्षित होना नहीं पाया जाता; किंतु "कर्म करनेकी किसी प्रकारकी विशेष युक्ति, साधन या मार्ग" अर्थ ही लिया जा सकता है। इसी तरह जब संजय गीताके कृष्ण-अर्जुन संवादको 'योग' कहता है। (गीता १८.७५) तबभी यही अर्थ पाया जाता है। श्रीशंकराचार्य स्वयं संन्यासमार्गवाले थे। तोभी उन्होंने अपने गीता- भाष्यके आरंभमेंही वैदिकधर्मके दो भेद - प्रवृत्ति और निवृत्ति - बतलाये हैं; और 'योग' शब्दका अर्थ श्रीभगवानकी की हुई व्याख्याके अनुसार कभी 'सम्यक्- दर्शनोपायकर्मानुष्ठानम्' (गीता ४४. २) और कभी "योगः युक्तिः" (गीता १०.७) किया है। इसी तरह महाभारतमेंभी 'योग' और 'ज्ञान' दोनों शब्दोंके विषयमें स्पष्ट लिखा है, कि "प्रवृत्तिलक्षणो योगः ज्ञानं संन्यासलक्षणम्" (मभा. अश्व. ४३.२५)। अर्थात् योगका अर्थ प्रवृत्तिमार्ग और ज्ञानका अर्थ संन्यास या निवृत्ति- मार्ग है। शांतिपर्वके अंतमें, नारायणीयोपाख्यानमें 'सांख्य' और 'योग' शब्द तो इसी अर्थमें अनेक बार आये हैं; और इसकाभी वर्णन किया गया है, कि ये दोनों मार्ग सृष्टिके आरंभमें भगवानने क्यों और कैसे निर्माण किये। (मभा. शां. २४० और ३४८)। पहले प्रकरणमें महाभारतसे जो वचन उद्धृत किये गये हैं, उनसे यह स्पष्टतया मालूम हो गया है, कि यही नारायणीय अथवा भागवतधर्म भगवद्गीताका प्रतिपाद्य तथा प्रधान विषय है। इसलिये कहना पड़ता है, कि 'सांख्य' और 'योग' शब्दोंका जो प्राचीन और पारिभाषिक अर्थ (सांख्य = निवृत्ति; योग = प्रवृत्ति) नारायणीय धर्ममें दिया गया है, वही अर्थ गीतामेंभी विवक्षित है। यदि इसमें किसीको शंका हो, तो गीतामें दी हुई इस व्याख्यासे - "समत्वं योग उच्यते" या "योगः कर्मसु कौशलम्" - तथा उपर्युक्त "कर्मयोगेन योगिनाम्" इत्यादि गीताके वचनोंसे उसे शंकाका समाधान हो सकता है। इसलिये अब यह निर्विवाद सिद्ध है, कि

६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गीतामें 'योग' शब्द प्रवृत्तिमार्ग अर्थात् 'कर्मयोग'के अर्थहीमें प्रयुक्त हुआ है। वैदिक धर्म-ग्रंथोंकी कौन कहे, यह 'योग' शब्द, पाली और संस्कृत भाषाओंके बौद्ध- धर्म-ग्रंथोंमेंभी, इसी अर्थमें प्रयुक्त है। उदाहरणार्थ, संवत् ३३५ के लगभग लिखे 'मिलिंदप्रश्न' नामक पालीग्रंथमें 'पुब्बयोगो' (पूर्वयोग) शब्द आया है; और वहाँ उसका अर्थ 'पुब्बकम्म' ( पूर्वकर्म ) किया गया है (मि. प्र. १. ४)। इसी तरह अश्वघोष कविकृत-जो शालिवाहन शकके आरंभमें हो गया है-'बुद्धचरित' नामक संस्कृत काव्यके पहले सर्गके पचासवें श्लोकमें यह वर्णन है - आचार्यकं योगविधौ द्विजानामप्राप्तमन्यैर्जनको जगाम । अर्थात् “ब्राह्मणोंको योगविधिकी शिक्षा देने राजा जनक आचार्य ( उपदेष्टा ) हो गये। इनके पहले यह आचार्यत्व किसीकोभी प्राप्त नहीं हुआ था”। यहाँपर 'योग-विधि'का अर्थ निष्काम-कर्मयोगकी विधिही समझना चाहिये। क्योंकि गीता आदि अनेक ग्रंथ मुक्त कंठसे कह रहे हैं कि जनकजीके बर्तावका यही रहस्य है; और अश्वघोषने अपने 'बुद्धचरित' (मु. च. ९.१९ और २०) में यह दिखलानेके लिये, कि “गृहस्थाश्रममें रहकरभी मोक्षकी प्राप्ति कैसे की जा सकती है" जनक- हीका उदाहरण दिया है। जनकके दिखलाये हुए मार्गका नाम 'योग' था; और यह बात बौद्ध-धर्म-ग्रंथोंसेभी सिद्ध होती है। इसलिये गीताके 'योग' शब्दकाभी यही अर्थ लगाना पड़ता है। क्योंकि गीताहीके कथनानुसार ( गीता ३.२० ) जनककाही मार्ग उसमें प्रतिपादित किया गया है। सांख्य और योग इन दो मार्गोंके विषयमें अधिक विचार आगे किया जाएगा। प्रस्तुत प्रश्न यही है, कि गीतामें 'योग' शब्दका उपयोग किस अर्थमें किया गया है। जब एक बार यह सिद्ध हो गया कि गीतामें 'योग'का प्रधान अर्थ कर्मयोग और 'योगी'का प्रधान अर्थ कर्मयोगी है, तो फिर यह कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि भगवद्गीताका प्रतिपाद्य विषय क्या है। स्वयं भगवान् अपने उपदेशको 'योग' कहते हैं ( गीता ४.१-३ ); बल्कि छठे ( गीता ६. ३३ ) अध्यायमें अर्जुनने और गीताके अंतिम उपसंहार (गीता १८.७५) में संजयनेभी गीताके उपदेशको 'योग'ही कहा है। इसी तरह गीताके प्रत्येक अध्यायके अंतमें, जो अध्याय-समाप्ति- दर्शक संकल्प है, उसमेंभी साफ़ साफ़ कह दिया है, कि गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषय 'योगशास्त्र'ही है। परंतु जान पड़ता है, कि उक्त संकल्पके शब्दोंके अर्थपर टीकाकारोंने ध्यान नहीं दिया। आरंभके दो पदों - “ श्रीमद्भगवद्गीतासु उप- निषत्सु 'के बाद इस संकल्पमें दो शब्द “ ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे " औरभी जोड़े गये हैं। पहले दो शब्दोंका अथ है- “भगवानसे गाये गये उपनिषदमें”; और पिछले दो शब्दोंका अर्थ “ब्रह्मविद्याका योगशास्त्र अर्थात् कर्मयोग-शास्त्र" है, जो कि इस गीताका विषय है। ब्रह्मविद्या और ब्रह्मज्ञान एकही बात है; और इसके प्राप्त हो जानेपर ज्ञानी पुरुषके लिये दो निष्ठाएं या मार्ग खुले होते हैं (गीता ३.३)। एक

कर्मयोगशास्त्र ६१ सांख्य अथवा संन्यास मार्ग – अर्थात् वह मार्ग जिसका ज्ञान होनेपर कर्म करना छोड़ कर विरक्त होकर रहना पड़ता है; और दूसरा योग अथवा कर्ममार्ग – अर्थात् वह मार्ग, जिसमें कर्मोंका त्याग न करके ऐसी युक्तिसे नित्य कर्म करते रहना चाहिये जिससे मोक्ष-प्राप्तिमें कुछभी बाधा न हो। पहले मार्गका दूसरा नाम ‘ज्ञाननिष्ठा'भी है, जिसका विवेचन उपनिषदोंमें अनेक ऋषियोंने और ग्रंथकारोंनेभी किया है। परंतु ब्रह्मविद्याके अंतर्गत कर्मयोगका या योगशास्त्रका तात्त्विक विवेचन भगवद्गीताके सिवा अन्य ग्रंथोंमें नहीं है। इस बातका उल्लेख पहले किया जा चुका है, कि अध्याय-समाप्ति-दर्शक संकल्प गीताकी सब प्रतियोंमें पाया जाता है; और इससे प्रकट होता है, कि गीताकी सभी टीकाओंके रचे जानेके पहलेही उसकी रचना हुई होगी। इस संकल्पके रचयिताने इस संकल्पमें “ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे” इन दो पदोंको व्यर्थही नहीं जोड़ दिया है; किंतु उसने गीताशास्त्रके प्रतिपाद्य विषयकी अपूर्वता दिखानेहीके लिये उक्त पदोंको उस संकल्पमें माधार और हेतुसहित स्थान दिया है। अतः इस बातकाभी सहज निर्णय हो सकता है, कि गीतापर अनेक सांप्रदायिक टीकाओंके होनेके पहले गीताका तात्पर्य कैसे और क्या समझा जाता था। यह हमारे सौभाग्यकी बात है, कि इस कर्मयोगका प्रतिपादन स्वयं भगवान् श्रीकृष्णहीने किया है, जो इस योगमार्गके प्रवर्तक और सब योगोंके साक्षात् ईश्वर (योगेश्वर = योग × ईश्वर) हैं; और लोकहितके लिये उन्होंने अर्जुनको उसका रहस्य बतलाया है। गीताके 'योग' और 'योगशास्त्र' शब्दोंसे हमारे ‘कर्मयोग' और 'कर्मयोगशास्त्र' शब्द कुछ बड़े हैं सही; परंतु अब हमने कर्मयोगशास्त्र सरीखा बड़ा नामही इस ग्रंथ और प्रकरणको देना इसलिये पसंद किया है, कि जिससे गीताके प्रतिपाद्य विषयके संबंधमें कुछभी संदेह न रह जावे। एकही कर्म करनेके जो अनेक योग, साधन या मार्ग हैं, उनमेंसे सर्वोत्तम और शुद्ध मार्ग कौन है; उसके अनुसार नित्य आचरण किया जा सकता है या नहीं; नहीं किया जा सकता, तो कौन कौन अपवाद उत्पन्न होते हैं, और वे क्यों उत्पन्न होते हैं; जिस मार्गको हमने उत्तम मान लिया है, वह उत्तम क्यों हैं; जिस मार्गको हम बुरा समझते हैं, वह बुरा क्यों है; यह अच्छापन या बुरापन किसके द्वारा या किस आधारपर निश्चित किया जा सकता है; अथवा इस अच्छेपन या बुरेपनका रहस्य क्या है – इत्यादि बातें जिस शास्त्रके आधारसे निश्चित की जाती हैं, उसको ‘कर्मयोगशास्त्र' या गीताके संक्षिप्त रूपानुसार 'योगशास्त्र' कहते हैं। 'अच्छा' और 'बुरा' दोनों साधारण शब्द हैं। इन्हींके समान अर्थमें कभी कभी शुभ-अशुभ, हितकर-अहितकर, श्रेयस्कर-अश्रेयस्कर, पाप-पुण्य, धर्म्य-अधर्म्य इत्यादि शब्दोंका उपयोग हुआ करता है। कार्य-अकार्य, कर्तव्य-अकर्तव्य, न्याय्य- अन्याय्य इत्यादि शब्दोंकाभी अर्थ वैसेही होता है। तथापि इन शब्दोंका उपयोग करनेवालोंके सृष्टिरचनाविषयक मत भिन्न भिन्न होनेके कारण 'कर्मयोग'शास्त्रके

निरूपणके पंथभी भिन्न भिन्न हो गये हैं। किसीभी शास्त्रको लीजिये; उसके विषयोंकी चर्चा साधारणतः तीन प्रकारसे की जाती है। (१) इस जड़ सृष्टिके पदार्थ ठीक वैसेही हैं, जैसे कि वे हमारी इंद्रियोंको गोचर होते हैं। इसके परे उनमें और कुछ नहीं है - इस दृष्टिसे उनके विषयमें विचार करनेकी एक पद्धति है, जिसे आधिभौतिक विवेचन कहते हैं। उदाहरणार्थ, सूर्यको देवता न मानकर केवल पांचभौतिक जड़ पदार्थोंका एक गोला माने; और उष्णता, प्रकाश, वजन दूरी, और आकर्षण इत्यादि उसके केवल गुणधर्मोहीकी परीक्षा करें; तो उसे सूर्यका आधिभौतिक विवेचन कहेंगे। दूसरा उदाहरण पेड़का लीजिये। इसका विचार न करके, कि पेड़के पत्ते निकलना, फूलना, फलना आदि क्रियाएँ किस अंतर्गत शक्तिके द्वारा होती हैं, जब केवल बाहरी दृष्टिसे विचार किया जाता है, कि जमीनमें बीज बोनेसे अंकुर फूटते हैं, फिर वे बढ़ते हैं; और उसीसे पत्ते, शाखा, फूल इत्यादि दृश्य विकार प्रकट होते हैं, तब उसे पेड़का आधिभौतिक विवेचन कहते हैं। रसायनशास्त्र, पदार्थविज्ञानशास्त्र, विद्युच्छास्त्र इत्यादि आधुनिक शास्त्रोंका विवेचन इसी ढंगका होता है। ओर तो क्या, आधिभौतिक पंडितभीको यह मानते हैं, कि उक्त रीतिसे किसी वस्तुके दृश्य गुणोंका विचार कर लेनेपर उनका काम पूरा हो जाता है - सृष्टिके पदार्थोंका इससे अधिक विचार करना निष्फल है। (२) जब उक्त दृष्टिको छोड़कर इस बातका विचार किया जाता है, कि जड़ सृष्टिके पदार्थोंके मूलमें क्या है; क्या, इन पदार्थोंका व्यवहार केवल उनके गुण-धर्मोहीसे होता है, या उसके लिये किसी तत्त्वका आधारभी है; तो केवल आधिभौतिक विवेचनसेही काम नहीं चलता, हमको कुछ आगे बढ़ना पड़ता है। उदाहरणार्थ, जब हम यह मानते हैं, कि पांचभौतिक सूर्यके जड़ या अचेतन गोलेमें सूर्य नामक एक देवताका अधिष्ठान है; और इसीके द्वारा इस अचेतन गोले (सूर्य) के सब व्यापार या व्यवहार होते रहते हैं, तब उसको उस विषयका आधिदैविक विवेचन कहते हैं। इस मतके अनुसार यह माना जाता है, कि पेड़में, पानीमें, हवामें अर्थात् सब पदार्थोंमें, अनेक देवता हैं; जो उन जड तथा अचेतन पदार्थोंसे भिन्न तो हैं, किंतु उनके व्यवहारोंको वे ही चलाते हैं। (३) परंतु जब यह माना जाता है, कि सृष्टिके हजारों जड़ पदार्थोंमें हजारों स्वतंत्र देवता नहीं हैं; किंतु बाहरी सृष्टिके सब व्यवहारोंको चलानेवाली, मनुष्यके शरीरमें आत्मस्वरूपसे रहनेवाली, और मनुष्यको सारी सृष्टिका ज्ञान प्राप्त करा देनेवाली एकही चित्-शक्ति है,. जो कि इंद्रियातीत है ओर जिसके द्वाराही इस जगतका सारा व्यवहार चल रहा है; तब उस विचार-पद्धतिको आध्यात्मिक विवेचन कहते हैं। उदाहरणार्थ, अध्यात्मवादियोंका मत है, कि सूर्य- चंद्र आदिका व्यवहार, यहाँतक कि वृक्षोंके पत्तोंका हिलनाभी, इसी अचित्य शक्तिकी प्रेरणासे हुआ करता है। सूर्य-चंद्र आदिमें या अन्य स्थानोंमें भिन्न भिन्न तथा स्वतंत्र देवता नहीं हैं। प्राचीन कालसे किसीभी विषयका विवेचन करनेके

कर्मयोगशास्त्र ६३ लिये ये तीन मार्ग प्रचलित हैं; और इनका उपयोग उपनिषद्-ग्रंथोंमेंभी किया गया है। उदाहरणार्थ, ज्ञानेंद्रियाँ श्रेष्ठ हैं या प्राण श्रेष्ठ हैं, इस बातका विचार करते समय बृहदारण्यक आदि उपनिषदोंमें एक बार उक्त इंद्रियोंके अग्नि आदि देवता- ओंको और दूसरी बार उनके सूक्ष्म रूपों (अध्यात्म) को ले कर उनके बलाबल का विचार किया गया है (बृ. १. ५. २१ और २२; छां. १. २ और ३; कौषी. २. ८); और, गीताके सातवें अध्यायके अंतमें तथा आठवेंके आरंभमें ईश्वरके स्वरूपका जो विचार बतलाया गया है, वहभी इसी दृष्टिसे किया गया है। “अध्यात्मविद्या विद्यानाम्” (गीता १०. ३२) इस वाक्यके अनुसार हमारे शास्त्रकारोंने उक्त तीन मार्गोंमेंसे, आध्यात्मिक विवरणकोही अधिक महत्त्व दिया है। परंतु आजकल उप- र्युक्त तीन शब्दों (आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक) के अर्थको थोड़ा-सा बदलकर प्रसिद्ध आधिभौतिक फ्रेंच पंडित कोंटने* आधिभौतिक विवेचनकोही अधिक महत्त्व दिया है। उसका कहना है, कि सृष्टिके मूल-तत्त्वको खोजते रहनेसे कुछ लाभ नहीं; यह तत्त्व अगम्य है। अर्थात् इसको समझ लेना कभीभी संभव नहीं। इसलिये इसकी कल्पित नींवपर किसी शास्त्रकी इमारतको खड़ा कर देना न तो संभव है और न उचित। असभ्य और जंगली मनुष्योंने पहले पहल जब पेड़, बादल और ज्वालामुखी पर्वत आदि हिलते-चलते पदार्थोंको देखा, तब उन लोगों ने अपने भोलेपनसे इन सब पदार्थोंको देवताही मान लिया। यह कोंटके मतानुसार, 'आधिदैविक' विचार हुआ; परंतु मनुष्योंने उक्त कल्पनाको शीघ्रही त्याग दिया और वे समझने-लगें कि इन सब पदार्थोंमें कुछ-न-कुछ आत्मतत्त्व अवश्य भरा हुआ है। कोंटके मतानुसार मानवी ज्ञानकी उन्नतिकी यह दूसरी सीढ़ी है। इसे वह 'आध्यात्मिक' कहता है; परंतु जब इस रीतिसे सृष्टिका विचार करने परभी प्रत्यक्ष उपयोगी शास्त्रीय ज्ञानकी कुछ वृद्धि नहीं हो सकी, तब अंतमें मनुष्य सृष्टिके पदार्थोंके दृश्य गुण-धर्मोंहीका और अधिक विचार करने लगा; जिससे

  • फ्रान्स देशमें ऑगस्ट कोंट (Auguste Comte) नामक एक बड़ा पंडित गतशताब्दीमें हो चुका है। इसने समाजशास्त्रपर एक बहुत बड़ा ग्रंथ लिखकर बतलाया है, कि समाजरचनाका शास्त्रीय रीतिसे किस प्रकार विवेचन करना चाहिये। अनेक शास्त्रोंकी आलोचना करके इसने यह निश्चित किया है, कि किसीभी शास्त्रको लो, उसका विवेचन पहले पहल Theological पद्धतिसे किया जाता है; फिर Meta- physical पद्धतिसे होता है; और अंतमें उसको Positive स्वरूप मिलता है। उन्हीं तीन पद्धतियोंको हमने इस ग्रंथमें आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक ये तीन प्राचीन नाम दिये हैं। ये पद्धतियाँ कुछ कोंटकी निकाली हुई नहीं हैं; ये सब पुरानीही हैं तथापि उसने उनका ऐतिहासिक क्रम नई रीतिसे बाँधा है; और उनमें आधिभौतिक (Positive) पद्धतिकोही श्रेष्ठ बतलाया है; बस इतनाही कोंटका नया शोध है। कोंटके अनेक ग्रंथोंका अंग्रेजीमें अनुवाद हो गया है।