भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पांडवोंने मिलकर अकेली द्रौपदीके साथ विवाह कैसे किया ? द्रौपदीके वस्त्रहरणके समय भीष्म-द्रोण आदि सत्पुरुष शून्य-हृदय होकर चुपचाप क्यों बैठे रहे ? दुष्ट दुर्योधनकी ओरसे युद्ध करते समय भीष्म और द्रोणाचार्यने अपने पक्षका समर्थन करनेके लिये जो यह सिद्धान्त बतलाया, कि " अर्थस्य पुरुषो दासः दासस्त्वर्थो न कस्यचित् " - पुरुष अर्थ (संपत्ति) का दास है, अर्थ किसी का दास नहीं हो सकता

  • (मभा. भी. ४३. ३५) यह तब सच है या झूठ ? यदि सेवाधर्म कुत्तेकी वृत्तिके समान निंदनीय माना है - जैसे " सेवा श्ववृत्तिराख्याता " ( मनु. ४. ६ ), तो अर्थके दास हो जानेके बदले भीष्म आदिओने दुर्योधनकी सेवाहीका त्याग क्यों नहीं कर दिया ? इन अनेकों प्रश्नका निर्णय करना बहुत कठिन है; क्योंकि प्रसंगोंके अनुसार भिन्न भिन्न मनुष्योंके भिन्न भिन्न अनुमान या निर्णय हुआ करते हैं। यही नहीं समझना चाहिये, कि धर्मके तत्त्व सिर्फ़ सूक्ष्मही हैं - " सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य " - (मभा. अनु. १०. ७०); किंतु महाभारत ( बन. २०८. २ ) में यहभी कहा है, कि " बहुशाखा ह्यनंतिका " - अर्थात् उसकी शाखाएँभी अनेक हैं, और उससे निकलनेवाले अनुमानभी भिन्न भिन्न हैं। तुलाधार और जाजलिके संवादमें धर्मका विवेचन करते समय तुलाधारभी यही कहता है, कि " सूक्ष्मत्वान्न स विज्ञातु शक्यते बहुनिह्नवः " अर्थात् धर्म बहुत सूक्ष्म और पेचीदा होता है । इसलिये वह समझमें नहीं आता (मभा. शां. २६१. ३७)। महाभारतकार व्यासजी इन सूक्ष्म प्रसंगोंको अच्छी तरह जानते थे; इसलिये उन्होंने यह समझा देनेके उद्देश्यहीसे अपने ग्रंथमें अनेक भिन्न भिन्न कथाओंका संग्रह किया है, कि प्राचीन समयके सत्पुरुषोंने ऐसे कठिन प्रसंगोंपर कैसा बर्ताव किया था । परंतु शास्त्र-पद्धतिसे सब विषयोंका विवेचन करके उसका सामान्य रहस्य महाभारत सरीखे धर्मग्रंथमें कहीं बतला देना आवश्यक था । इस रहस्य या मर्मका प्रतिपादन - अर्जुनकी कर्तव्य-मूढ़ताको दूर करनेके लिये भगवान् श्रीकृष्णने पहले जो उपदेश दिया था, उसीके आधारपर - व्यासजीने भगवद्गीतामें किया है। इससे 'गीता' महाभारतका रहस्योपनिषद् और शिरोभूषण हो गयी है । और महाभारत गीतामें प्रतिपादित मूलभूत कर्मत-त्त्वोंका उदाहरणसहित विस्तृत व्याख्यान हो गया है । इस बातकी ओर उन लोगोंको अवश्य ध्यान देना चाहिये; जो यह कहा करते हैं, कि महाभारत ग्रंथमें 'गीता' बादमें घुसेड़ दी गई है । हम तो यही समझते हैं, कि यदि गीताकी कोई अपूर्वता या विशेषता है, तो वह यही है, कि जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है । कारण यह है, कि यद्यपि केवल मोक्षशास्त्र अर्थात् वेदान्तका प्रतिपादन करनेवाले उपनिषद् आदि, तथा अहिंसा आदि सदाचारके सिर्फ़ नियम बनानेवाले स्मृति आदि अनेक ग्रंथ हैं; तथापि वेदान्तके गहन तत्त्वज्ञानके आधारपर 'कार्याकार्यव्यवस्थिति' करनेवाला, गीताके समान कोई दूसरा प्राचीन ग्रंथ संस्कृत साहित्यमें दीख नहीं पड़ता । गीताभक्तोंको यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं, कि 'कार्याकार्यव्यवस्थिति' शब्द गीताही (गीता १६. २४) में