भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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कर्मजिज्ञासा ४९ और जब ऐसी कठिनाइयाँ आती हैं, तब कभी अहिंसा और आत्मरक्षाके बीच; कभी सत्य और सर्वभूतहितमें, कभी शरीररक्षा और कीर्तिमें, और कभी भिन्न भिन्न नातोंसे उपस्थित होनेवाले कर्तव्योंमें झगड़ा होने लगता है। तब शास्त्रोक्त, सामान्य तथा सर्वमान्य नीति-नियमोंसे काम नहीं चलता; और उनके लिये अनेक अपवाद उत्पन्न हो जाते हैं। ऐसे विकट समयपर साधारण मनुष्योंसे लेकर बड़े पंडितोंकोभी यह जाननेकी स्वाभाविक इच्छा होती है, कि कार्य-अकार्यकी व्यवस्था - अर्थात् कर्तव्य-अकर्तव्य धर्मका निर्णय - करनेके लिये कोई चिरस्थायी नीति अथवा युक्ति है या नहीं। यह बात सच है, कि शास्त्रोंमें दुर्भिक्ष जैसे संकटके समय 'आपद्धर्म' कहकर कुछ सुविधाएं दी गई हैं। उदाहरणार्थ, स्मृतिकारोंने कहा है, कि यदि आपत्कालमें ब्राह्मण कहींभी अन्न ग्रहणकर ले, तो वह दोषी नहीं होता; और उषस्ति चाक्रायणके इसी तरह बर्ताव करनेकी कथाभी छांदोग्योपनिषद (याज्ञ. ३. ४१; छां. १. १०) में है; परंतु उसमें और उक्त कठिनाइयोंमें बहुत भेद हैं। दुर्भिक्ष जैसे आपत्कालमें शास्त्रधर्म और भूख, प्यास आदि इंद्रियवृत्तियोंके बीचमेंही झगड़ा हुआ करता है। उस समय हमको इंद्रियाँ एक ओर खींचा करती हैं और शास्त्रधर्म दूसरी ओर खींचा करता है। परंतु जिन कठिनाइयोंका वर्णन ऊपर किया गया है, उनमेंसे बहुतेरी ऐसी हैं, कि उस समय इंद्रियवृत्तियोंका और शास्त्रका कुछभी विरोध नहीं होता; किंतु ऐसे दो धर्मोंमें परस्पर-विरोध उत्पन्न हो जाता है, जो शास्त्रोंहीसे विहित हैं। और फिर उस समय सूक्ष्म विचार करना पड़ता है, कि किस बातका स्वीकार किया जाए । यद्यपि कोई मनुष्य अपनी बुद्धिके अनुसार इनमेंसे कुछ बातोंका निर्णय प्राचीन सत्पुरुषोंके ऐसेही समयपर किये हुए बर्तावसे कर सकता है, तथापि अनेक प्रसंग ऐसे होते हैं, कि उनमें बड़े बड़े बुद्धिमानोंकाभी मन चक्करमें पड़ जाता है। कारण यह है, कि जितना अधिक विचार किया जाता है, उतनीही अधिक उपपत्तियाँ और तर्क उत्पन्न होते हैं; और अंतिम निर्णय असंभव-सा हो जाता है। जब उचित निर्णय होने नहीं पाता तब अधर्म या अपराध हो जानेकीभी संभावना होती है। इस दृष्टिमे विचार करनेपर मालूम होता है, कि धर्म-अधर्मका या कर्म-अकर्मका विवेचन एक स्वतंत्र शास्त्रही है, जो न्याय तथा व्याकरणसेभी अधिक गहन है। प्राचीन संस्कृत ग्रंथोंमें 'नीतिशास्त्र' शब्दका उपयोग प्रायः राज- नीतिशास्त्र विषयके लियेही किया गया है; और कर्तव्य-अकर्तव्यके विवेचनको 'धर्मशास्त्र' कहते हैं। परंतु आज-कल 'नीति' शब्दहीमें कर्तव्य अथवा सदा- चरणकाभी समावेश किया जाता है; इसलिये हमने वर्तमान पद्धतिके अनुसार, इस ग्रंथमें धर्म-अधर्म या कर्म-अकर्मके विवेचनहीको 'नीतिशास्त्र' कहा है। नीति, कर्म-अकर्म या धर्म-अधर्मके विवेचनका यह शास्त्र बड़ा गहन है; यह भाव प्रकट करनेहीके लिये "सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य " - अर्थात् धर्म या व्यावहारिक नीतिधर्मका स्वरूप सूक्ष्म है - यह वचन महाभारतमें कई जगह उपयुक्त हुआ है। पाँच गी. र. ४