भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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४८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र देश, काल और पात्रता का विचार करके जो दान किया जाता है, वही सात्त्विक कहलाता है (गीता १७. २०)। कालकी मर्यादा सिर्फ़ वर्तमान कालहीके लिये नहीं होती। ज्यों ज्यों समय बदलता जाता है, त्यों त्यों व्यावहारिक धर्ममेंभी परिवर्तन होता जाता है। इसलिये जब प्राचीन समयकी किसी बातकी योग्यता या अयोग्यताका निर्णय करना हो, तब उस समयके धर्म-अधर्मसंबंधी विश्वासकाभी अवश्य विचार करना पड़ता है (मनु. १. ८५)। और व्यास (महा. शां. २५९. ८) कहते हैं :- अन्ये कृतयुगे धर्मास्त्रेतायां द्वापरेऽपरे । अन्ये कलियुगे नॄणां युगह्रासानुरूपतः ॥ “युगमानके अनुसार कृत, त्रेता, द्वापर और कलिके धर्मभी भिन्न भिन्न होते हैं।” महाभारत (महा. आ. १२२; और ७६) में यह कथा है, कि प्राचीन कालमें स्त्रियोंके लिये विवाहकी मर्यादा नहीं थी; वे इस विषयमें स्वतंत्र और अनावृत थीं; परंतु जब इस आचरणका बुरा परिणाम दीख पड़ा तब श्वेतकेतुने विवाहकी मर्यादा स्थापित कर दी; और मदिरापानका निषेधभी पहले पहल शुक्राचार्यहीने किया। तात्पर्य यह है, कि जिस समय ये नियम जारी नहीं थे, उस समयके धर्म-अधर्मका और उसके बादके धर्म-अधर्मका विवेचनभी भिन्न भिन्न रीतिसे किया जाना चाहिये। इसी तरह यदि वर्तमान समयका प्रचलित धर्म आगे चलकर बदल जाय तो उसके साथ भविष्य कालके धर्म अधर्मका विवेचनभी भिन्न रीतिसे किया जाएगा। कालमानके अनुसार देशाचार, कुलाचार और जातिधर्मकाभी विचार करना पड़ता है। क्योंकि आचारही सब धर्मोंकी जड़ है। तथापि आचारोंमेंभी बहुत भिन्नता हुआ करती है। पितामह भीष्म कहते हैं - न हि सर्वहितः कश्चिदाचारः संप्रवर्तते । तेनैवान्यः प्रभवति सोऽपरं बाधते पुनः ॥ “ऐसा आचार नहीं मिलता, जो हमेशा सब लोगोंको समान हितकारक हो। यदि किसी एक आचारका स्वीकार किया जाय, तो दूसरा उससे बढ़कर मिलता है; यदि इस दूसरे आचारका स्वीकार किया जाय, तो वह किसी तीसरे आचारका विरोध करता है” (महा. शां. २५९. १७. १८)। जब आचारोंमें ऐसी भिन्नता हो, तब भीष्म पितामहके कथनके अनुसार तारतम्य अथवा सार-असार-दृष्टिसे विचार करना चाहिये। कर्म-अकर्म या धर्म-अधर्मके विषयमें सब संदेहोंका यदि निर्णय करने लगें तो दूसरा महाभारतही लिखना पड़ेगा। उक्त विवेचनसे पाठकोंके ध्यानमें यह बात आ जाएगी, कि गीताके आरंभमें क्षात्र धर्म और बंधुप्रेमके बीच झगड़ा उत्पन्न हो जानेमें अर्जुनपर जो गुजरी वह कुछ लोक-विलक्षण नहीं है; इस संसारमें ऐसी कठिनाइयाँ कार्यकर्ताओं और बड़े आदमियोंपर अनेक बार आयाही करती हैं;