श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र रोम नगरमें कोरियोलेनस नामका एक शूर सरदार था । नगरवासियोंने उसको शहरसे निकाल दिया । तब वह रोमन लोगोंके शत्रुओंमें जा मिला और उसने प्रतिज्ञा की, कि “ मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोडूंगा । ” कुछ समयके बाद इन शत्रुओंकी सहायतासे उसने रोमन लोगोंपर हमला किया और वह अपनी सेना लेकर रोम शहरके दरवाजेके पास आ पहुँचा । उस समय रोम शहरकी स्त्रियोंने कोरियोलेनसकी पत्नी और माताको सामने करके, मातृभूमिके संबंधके कर्तव्यका उसको उपदेश किया । अंतमें उसको रोमके शत्रुओंको दिये हुए वचनका भंग करना पडा । कर्तव्य- अकर्तव्यके मोहमें फँस जानेके ऐसे औरभी कई उदाहरण दुनियाके प्राचीन और आधुनिक इतिहासमें पाये जाते हैं। परंतु हम लोगोंको इतना दूर जानेकी कोई आवश्यकता नहीं। हमारा महाभारत-ग्रंथ ऐसे उदाहरणोंकी एक बड़ी भारी खानही है। ग्रंथके आरंभ ( आ. २) में भारतका वर्णन करते हुए स्वयं व्यासजीने उसको 'सूक्ष्मार्थन्याययुक्तं', 'अनेकसामयान्वितं' आदि विशेषण दिये हैं। उसमें धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और मोक्षशास्त्र, सब कुछ आ गया है। इतनाही नहीं, किंतु उसकी महिमा इस प्रकार गाई गयी, कि “ यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् ” - अर्थात् जो कुछ इसमें है वही और स्थानोंमें है, जो इसमें नहीं है वह और किसीभी स्थानमें नहीं है (आ. ६२. ५३) । सारांश यह है, कि इस संसारमें अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं; ऐसे समय बड़े बड़े प्राचीन पुरुषोंने कैसा बर्ताव किया, इसका सुलभ आख्यानों- के द्वारा साधारण जनोंको बोध करा देनेहीके लिये 'भारत'का 'महाभारत' हो गया है। नहीं तो सिर्फ भारतीय युद्ध अथवा 'जय'नामक इतिहासका वर्णन करनेके लिये अठारह पर्वोंकी कुछ आवश्यकता नहीं थी । अब यह प्रश्न किया जा सकता है, कि श्रीकृष्ण और अर्जुनकी बातें छोड़ दीजिये; हमारे-तुम्हारे लिये इतने गहरे पानीमें पैठनेकी क्या आवश्यकता है ? क्या मनु आदि स्मृतिकारोंने अपने ग्रंथोंमें इस बातके स्पष्ट नियम नहीं बना दिये हैं, कि मनुष्य संसारमें किस तरह बर्ताव करे ? किसीकी हिंसा मत करो, नीति- पर चलो, सच बोलो, गुरु और बड़ोंका सम्मान करो, चोरी और व्यभिचार मत करो; इत्यादि सब धर्मोंमें पाई जानेवाली साधारण आज्ञाओंका यदि पालन किया जाय, तो ऊपर लिखे कर्तव्य-अकर्तव्यके झगड़ेमें पड़नेकी क्या आवश्यकता है ? परंतु इसके विरुद्ध यहभी प्रश्न किया जा सकता है कि जबतक इस संसारके सब लोग उक्त आज्ञाओंके अनुसार बर्ताव नहीं करते हैं, तबतक सज्जनोंको क्या करना चाहिये ? क्या ये लोग अपने सदाचारके कारण दुष्ट जनोंके फंदेमें अपनेको फँसा लें ? या अपनी रक्षाके लिये 'जैसे को तैसा' इस न्यायसे उन लोगोंका प्रतिकार करें ? इसके सिवा एक बात और है । यद्यपि उक्त साधारण नियमों- को नित्य और प्रमाणभूत मान लें, तथापि कार्यकर्ताओंको अनेक बार ऐसी आपत्तियोंका सामना करना पडता है कि उस समय उक्त साधारण नियमोंसे दो