भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 76

दूसरा प्रकरण कर्मजिज्ञासा किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः

  • गीता ४. १६ भगवद्गीताके आरंभमें, परस्पर-विरुद्ध दो धर्मोंकी उलझनमें फँस जानेके कारण अर्जुन जिस तरह कर्तव्यमूढ हो गया था, और उसपर जो आपत्ति आ पडी थी वह कुछ अपूर्व नहीं है। उन असमर्थ और अपनाही पेट पालनेवाले लोगोंकी बातही भिन्न है, जो संन्यास लेकर और संसारको छोड़कर वनमें चले जाते हैं अथवा जो कमजोरीके कारण जगतके अनेक अन्यायोंको चुपचाप सह लिया करते हैं। परंतु समाजमें रहकरही जिन महान् तथा कार्यकर्ता पुरुषोंको अपने सांसारिक कर्तव्योंका पालन धर्म तथा नीतिपूर्वक करना पडता है, उनपर ऐसी आपत्तियाँ अनेक बार आया करती हैं। युद्धके आरंभहीमें अर्जुनको कर्तव्य-जिज्ञासा और मोह हुआ। ऐसाही मोह युधिष्ठिरको - युद्धमें मरे हुए अपने रिश्तेदारोंका श्राद्ध करते समय - हुआ था। उसके इस मोहको दूर करनेके लिये 'शांतिपर्व' कहा गया है। कर्माकर्मसंशयके ऐसे अनेक प्रसंग ढूँढ़ कर अथवा कल्पित करके उनपर बड़े बड़े कवियोंने सुरस काव्य और उत्तम नाटक लिखे हैं। उदाहरणार्थ, प्रसिद्ध अंग्रेजी नाटककार शेक्सपीयरका हैमलेट नाटक लीजिये। डेन्मार्क देशके प्राचीन राजपुत्र हैमलेटके चाचाने अपने राजकर्ता भाई - हैमलेटके बाप - को मार डाला। हैमलेट- की माताको अपनी पत्नी बना लिया और राजगद्दीभी छीन ली। तब उस राज- कुमारके मनमें यह संघर्ष पैदा हुआ, कि ऐसे पापी चाचाका वध करके पुत्र-धर्मके अनुसार अपने पिताके ऋणसे मुक्त हो जाऊँ; अथवा अपने सगे चाचा, अपनी माताके पति और गद्दीपर बैठे हुए राजापर दया करूँ? इस मोहमें पड जानेके कारण कोमल अंतःकरणके हैमलेटकी कैसी दशा हुई और श्रीकृष्णके समान कोई मार्ग-दर्शक और हितकर्ता न होनेके कारण वह कैसे पागल हो गया और अंतमें 'जियें या मरें' इसी बातकी चिंता करने उसका अंत कैसे हो गया, इत्यादि बातोंका चित्र इस नाटकमें बहुत अच्छी तरहसे दिखाया गया है। 'कोरियोलेनस' नामके दूसरे नाटकमेंभी इसी तरह एक और प्रसंगका वर्णन शेक्सपीयरने किया है।
  • "पंडितोंकोभी इस विषयमें मोह हो जाया करता है, कि कर्म कौन-सा है और अकर्म कौन-सा है।" इस स्थानपर अकर्म शब्दको 'कर्मके अभाव' और 'बुरे कर्म' दोनों अर्थोंमें यथासंभव लेना चाहिये। मूल श्लोकपर हमारी टीका देखो।