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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गीतासंबंधी सर्वोत्तम ग्रंथ 'ज्ञानेश्वरी' है। इसमें कहा है कि गीताके अठारह अध्या- योंमेंसे प्रथम चार अध्यायोंमें कर्म, बीचके सात अध्यायोंमें भक्ति और अंतिम सात अध्यायोंमें ज्ञानका प्रतिपादन किया गया है; और स्वयं ज्ञानेश्वरमहाराजने अपने ग्रंथके अंतमें कहा है, कि मैंने गीताकी यह टीका शंकराचार्यके भाष्यानुसार की है। परंतु ज्ञानेश्वरीको इस कारणसे बिलकुल स्वतंत्र ग्रंथही मानना चाहिये, कि इसमें गीताका मूल अर्थ बहुत बढ़ाकर अनेक सरस दृष्टान्तोंसे समझाया गया है; और इसमें विशेष करके भक्तिमार्गका तथा कुछ अंगमें निष्काम-कर्मका श्री शंकराचार्यसेभी उत्तम विवेचन किया गया है। ज्ञानेश्वरमहाराज स्वयं योगी थे, इसलिये गीताके छठवें अध्यायके जिस श्लोकमें पातंजल योगाभ्यासका विषय आया है, उसकी उन्होंने विस्तृत टीका की है। उनका कहना है, कि श्रीकृष्ण भगवानने इस अध्यायके अंत (गीता ६. ४६) में अर्जुनको यह उपदेश करके कि "तस्माद्योगी भवार्जुन" - इसलिये हे अर्जुन ! तू योगी हो अर्थात् योगाभ्यासमें प्रवीण हो - अपना यह अभिप्राय प्रकट किया है, कि सब मोक्षपंथोंमें पातंजल योग- ही सर्वोत्तम है; और इसलिये आपने उसे 'पंथराज' कहा है। सारांश यह है, कि भिन्न भिन्न सांप्रदायिक भाष्यकारोंने तथा टीकाकारोंने गीताका अर्थ अपने मतोंके अनुकूलही निश्चितकर लिया है। प्रत्येक संप्रदायका यही कथन है, कि गीताका प्रवृत्तिविषयक कर्ममार्ग अप्रधान (गौण) है अर्थात् केवल ज्ञानका साधन है। गीता- में वही तत्त्वज्ञान पाया जाता है, जो उनके संप्रदायमें स्वीकृत हुआ है। उनके संप्रदायमें मोक्षकी दृष्टिसे जो आचार अंतिम कर्तव्य माने गये हैं, उन्हींका वर्णन गीतामें किया गया है - अर्थात् मायावादात्मक अद्वैत और कर्मसंन्यास, मायासत्यत्व- प्रतिपादक विशिष्टाद्वैत और वासुदेव-भक्ति, द्वैत आणि विष्णुभक्ति, शुद्धाद्वैत और भक्ति, शांकराद्वैत और भक्ति, पातंजल योग आणि भक्ति, केवल भक्ति, केवल योग या केवल ब्रह्मज्ञान (अनेक प्रकारके निवृत्तिविषयक मोक्षमार्ग) ही गीताके प्रधान तथा प्रतिपाद्य विषय है। * भगवद्गीतामें कर्मयोग प्रधान माना गया है, इस प्रकार कोईभी नहीं कहता। हमाराही नहीं किंतु प्रसिद्ध महाराष्ट्र-कवि वामन पंडितकाभी मत ऐसाही है। गीतापर आपने 'यथार्थदीपिका' नामक विस्तृत मराठी टीका लिखी है। उसके उपोद्घातमें वे पहले लिखते हैं :- " हे भगवन् ! इस कलियुगमें जिसके मतमें जैसा जँचता है, उसी प्रकार हरएक आदमी गीताका अर्थ लिख देता है" और फिर शिकायतके तौरपर लिखते हैं :-

  • भिन्न भिन्न सांप्रदायिक आचार्योंके गीताके भाष्य और मुख्य मुख्य पंद्रह टीकाग्रंथ बंबईके गुजराती प्रिंटिंग प्रेसके मालिकने, हालहीमें एकत्र प्रकाशित किये हैं। भिन्न भिन्न टीकाकारोंके अभिप्रायको एकस्थ जाननेके लिये यह ग्रंथ बहुत उपयोगी है।

विषयप्रवेश १९ " हे परमात्मन् ! सब लोगोंने किसी-न-किसी बहानेसे गीताका मनमाना अर्थ किया है, परंतु इन लोगोंका मनमाना अर्थ मुझे पसंद नहीं। भगवन् ! मैं क्या करूं ?" अनेक सांप्रदायिक टीकाकारोंके मतोंकी इस भिन्नताको देखकर कुछ लोग कहते हैं, कि जब कि ये सब मोक्ष-संप्रदाय परस्परविरोधी हैं; और जब कि इस बातका निश्चय नहीं किया जा सकता, कि इनमेंसे कोई एकही संप्रदाय गीतामें प्रतिपादित किया गया है, तब तो यही मानना उचित है, कि इन सब मोक्ष- साधनोंका - विशेषतः कर्म, भक्ति और ज्ञानका-वर्णन स्वतंत्र रीतिसे संक्षेपमें और पृथक् पृथक् करके भगवान्ने गीतामें अर्जुनका समाधान किया है। कुछ लोग कहते हैं, कि मोक्षके अनेक उपायोंका यह सब वर्णन पृथक् पृथक् नहीं है; किंतु इन सबकी एकताही गीतामें सिद्ध की गयी है। और, अंतमें, कुछ लोग तो यहभी कहते हैं, कि गीतामें प्रतिपादित ब्रह्मविद्या ऊपर ऊपरपर देखनेसे यद्यपि सुलभ मालूम होती है, तथापि उसका वास्तविक मर्म अत्यंत गूढ है, जो बिना गुरुके किसीकीभी समझ- में नहीं आ सकता (गीता ४. ३४) गीतापर भलेही अनेक टीकाएँ हो जायें, परंतु उसका गूढार्थ जाननेके लिये गुरुदीक्षाके सिवा और कोई उपाय नहीं है। अब यह बात स्पष्ट है, कि गीताके अनेक प्रकारके तात्पर्य कहे गये हैं। पहले तो स्वयं महाभारतकारने भागवत-धर्मानुसार अर्थात् प्रवृत्तिविषयक तात्पर्य बतलाया है। इसके बाद अनेक पंडित, आचार्य, कवि, योगी और भक्तजनोंने अपने अपने संप्रदायोंके अनुसार शुद्ध निवृत्तिविषयक तात्पर्य बतलाया है। इन भिन्न भिन्न तात्पयोंको देखकर कोईभी मनुष्य घबड़ाकर सहजही यह प्रश्न कर सकता है ! - क्या, ऐसे परस्पर-विरोधी अनेक तात्पर्य एकही गीताग्रंथसे निकल सकते हैं ? और, यदि निकल सकते हैं, तो इस भिन्नताका हेतु क्या है ? इसमें संदेह नहीं, कि भिन्न भिन्न भाष्योंके आचार्य बड़े विद्वान्, धार्मिक और सुशील थे। यदि कहा जाय, कि शंकराचार्यके समान महातत्त्वज्ञानी आजतक संसारमें कोईभी नहीं हुआ है, तोभी अतिशयोक्ति न होगी। तब फिर इनमें और इनके बादके आचार्योंमें इतना मतभेद क्यों हुआ ? गीता कोई इंद्रजाल नहीं है, कि जिससे मनमाना अर्थ निकाल लिया जावे । उपर्युक्त संप्रदायके जन्मके पहलेही गीता बन चुकी थी और भगवान्ने अर्जुनको गीताका उपदेश इसलिये दिया था कि उसका भ्रम दूर हो; कुछ इसलिये नहीं कि उसका भ्रम औरभी बढ़ जाय । गीतामें एक- ही विशेष और निश्चित अर्थका उपदेश किया गया है (गीता ५. १, २) और अर्जुनपर उस उपदेशका अपेक्षित परिणामभी हुआ है। इतना सब कुछ होनेपरभी गीताके तात्पर्यार्थके विषयमें इतनी गड़बड़ क्यों हो रही है ? यह प्रश्न कठिन है सही; परंतु इसका उत्तर उतना कठिन नहीं है, जितना पहले पहल मालूम पड़ता है। उदाहरणार्थ, एक मीठे और सुरस पक्वान्न (मिठाई) को देखकर अपनी अपनी रुचिके अनुसार किसीने उसे गेहूँका, किसीने घीका और किसीने शक्करका

२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बना हुआ बतलाया, तो हम उनमेंसे किसको झूठ समझें ? अपने अपने मता- नुसार तीनोंका कहना ठीक है। इतना होनेपरभी इस प्रश्नका निर्णय नहीं हुआ कि वह पक्वान्न ( मिठाई ) बना किस चीजसे है। गेहूँ, घी और शक्करसे अनेक प्रकारके पक्वान्न ( मिठाई ) बन सकते हैं। परंतु प्रस्तुत पक्वान्नका निश्चय केवल इतना कहनेसेही नहीं हो सकता कि वह गोधूमप्रधान, घृतप्रधान, या शर्कराप्रधान है। समुद्र-मंथनके समय किसीको अमृत, किसीको विष, किसीको लक्ष्मी, ऐरावत, कौस्तुभ, पारिजात आदि भिन्न भिन्न पदार्थ मिले; परंतु इतनेहीसे समुद्रके यथार्थ स्वरूपका कुछ निर्णय नहीं हो गया । ठीक इसी तरह सांप्रदायिक रीतिसे गीतासागरको मथने- वाले टीकाकारोंकी अवस्था हो गई है। दूसरा उदाहरण लीजिये । कंसवधके समय भगवान् श्रीकृष्ण जब रंग-मंडपमें आये तब वे प्रेक्षकोंको भिन्न भिन्न स्वरूपके - जैसे योद्धाको वज्र-सदृश, स्त्रियोंको कामदेव-सदृश, माता-पिताको पुत्र-सदृश - दिखने लगे थे । (भाग. १०, पू. ४३. १७) । इसी तरह गीताके एक होनेपरभी वह भिन्न भिन्न संप्रदायवालोंको भिन्न भिन्न स्वरूपोंमें दिखने लगे है। आप किसीभी संप्रदायको लें; यह बात स्पष्ट मालूम हो जायगी, कि उसको सामान्यतः प्रमाणभूत धर्मग्रंथोंका अनुसरणही करना पड़ता है; क्योंकि ऐसा न करनेसे वह संप्रदाय सब लोगोंकी दृष्टिमें सर्वथा अप्रमाणित एवम् अमान्य हो जायगा ! इसलिये वैदिक धर्ममें अनेक संप्रदायोंके होनेपरभी कुछ विशेष बातोंको छोड़कर - जैसे ईश्वर, जीव और जगतका परस्पर संबंध - शेष सब बातें सब संप्रदायोंमें प्रायः एकही-सी होती हैं। इसका परिणाम यह देख पड़ता है, कि हमारे धर्मके प्रमाणभूत ग्रंथोंपर जो सांप्र- दायिक भाष्य या टीकाएँ हैं, उनमें मूलग्रंथोंके फी - सदी नब्बेसेभी अधिक वचनों या श्लोकोंका भावार्थ, एकही-सा है। जो कुछ भेद है, वह शेष वचनों या श्लोकोंके विषयहीमें है। यदि इन वचनोंका सरल अर्थ लिया जाय तो वह सभी संप्रदायोंके लिये समान अनुकूल नहीं हो सकता । इसलिये भिन्न भिन्न सांप्रदायिक टीकाकार इन वचनोंमेंसे जो अपने संप्रदायके लिये अनुकूल हों, उन्हींको प्रधान मानकर और अन्य सब वचनोंको गौण समझकर, अथवा प्रतिकूल वचनोंके अर्थको किसी युक्तिसे बदलकर, या सुबोध तथा सरल वचनोंमेंसे अपने अनुकूल श्लेषार्थ या अनुमान निकालकर, यह प्रतिपादन किया करते हैं, कि हमाराही संप्रदाय उक्त प्रमाणोंसे सिद्ध होता है। उदाहरणार्थ, गीता २. १२ और १६; ३. १९; ६. ३; और १८. २ श्लोकोंपर हमारी टीका देखो। परंतु यह बात सहजही किसीकीभी समझमें आ सकती है, कि उक्त सांप्रदायिक रीतिसे ग्रंथका तात्पर्य निश्चित करना; और इस बातका अभिमान न करके, कि गीतामें अपनाही संप्रदाय प्रतिपादित हुआ है; अथवा अन्य किसीभी प्रकारका अभिमान न करके समग्र ग्रंथकी स्वतंत्र रीतिसे परीक्षा करना; और उस परीक्षाहीके आधारपर ग्रंथका मथितार्थ निश्चित करना, ये दोनों बातें स्वभावतः अत्यंत भिन्न हैं।

विषयप्रवेश २१ ग्रंथके तात्पर्य-निर्णयकी सांप्रदायिक दृष्टि सदोष है, इसलिये उसे यदि छोड़ दें, तो अब यह बतलाना चाहिये, कि गीताका तात्पर्य जाननेके लिये दूसरा साधन कौनसा है। ग्रंथ, प्रकरण और वाक्योंके अर्थका निर्णय करनेमें मीमांसक लोग अत्यंत कुशल होते हैं। इस विषयमें उन लोगोंका एक प्राचीन और सर्वमान्य श्लोक है :- उपक्रमोपसंहारो अभ्यासोऽपूर्वता फलम् । अर्थवादोपपत्ती च लिंगं तात्पर्यनिर्णये ॥ जिसमें वे कहते हैं - किसीभी लेख, प्रकरण अथवा ग्रंथके तात्पर्यका निर्णय करनेमें, उक्त श्लोकमें कही हुई सात बातें साधन-(लिंग) स्वरूप हैं; इसलिये इन सब बातोंका अवश्य विचार करना चाहिये। इनमें सबसे पहली बात 'उपक्रमोपसंहारौ' अर्थात् ग्रंथका आरंभ और अंत है। कोईभी मनुष्य अपने मनमें कुछ विशेष हेतु रखकरही ग्रंथ लिखना आरंभ करता है; और उस हेतुके सिद्ध होनेपर ग्रंथको समाप्त करता है। अतएव ग्रंथके तात्पर्यनिर्णयके लिये उपक्रम और उपसंहारहीका सबसे पहले विचार किया जाना चाहिये। सीधी रेखाकी व्याख्या करते समय भूमितिशास्त्रमें ऐसा कहा गया है, कि आरंभके बिंदुसे जो रेखा दाहिने-बाएँ या ऊपर-नीचे किसी तरफ नहीं झुकती और अंतिम बिंदुतक सीधी चली जाती है, उसे सरल रेखा कहते हैं। ग्रंथके तात्पर्य-निर्णयमेंभी यही सिद्धान्त उपयुक्त है। जो तात्पर्य ग्रंथके आरंभ और अंतमें साफ साफ़ झलकता है वही ग्रंथका सरल तात्पर्य है। आरंभसे अंततक जानेके लिये यदि अन्य मार्ग होंभी, तो उन्हें टेढ़े समझना चाहिये। आद्यंत देखकर ग्रंथका तात्पर्य पहले निश्चित करलेना चाहिये; और तब यह देखना चाहिये, कि उस ग्रंथमें 'अभ्यास' अर्थात् पुनरुक्ति- स्वरूपमें बार बार क्या कहा गया है। क्योंकि ग्रंथकारके मनमें जिस बातको सिद्ध करनेकी इच्छा होती है, उसके समर्थनके लिये वह अनेक बार कई कारणोंका उल्लेख करके वार बार एकही निश्चित सिद्धान्तको प्रकट किया करता है और हर बार कहा करता है, कि " इसलिये यह बात सिद्ध हो गयी; " या " अतएव ऐसा करना चाहिये " इत्यादि। ग्रंथके तात्पर्यका निर्णय करनेके लिये जो चौथा साधन है उसकी 'अपूर्वता' और पाँचवें साधनको 'फल' कहते हैं। 'अपूर्वता' कहते हैं 'नवीनता'को। कोईभी ग्रंथकार जब ग्रंथ लिखना शुरू करता है, तब वह कुछ नई बात बतलाना चाहता है; बिना नवीनता या विशेष वक्तव्यके वह ग्रंथ लिखने प्रवृत्त नहीं होता। विशेष करके यह बात उस जमानेमें पाई जाती थी जब की छापा- खाने नहीं थे। इसलिये किसी ग्रंथके तात्पर्यका निर्णय करनेसे पहले यहभी देखना चाहिये, कि उसमें अपूर्वता, विशेषता या नवीनता क्या है। इसी तरह लेख अथवा ग्रंथके फलपरभी - अर्थात् उस लेख या ग्रंथसे जो परिणाम हुआ हो उसपरभी - ध्यान देना चाहिये। क्योंकि अमुक फल हो, इसी हेतुसे ग्रंथ लिखा जाता है। इसलिये

२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यदि घटित परिणाम पर ध्यान दिया जाय तो उससे ग्रंथकर्ताका आशय बहुत ठीक ठीक व्यक्त हो जाता है। छठा और सातवाँ साधन 'अर्थवाद' और 'उपपत्ति' हैं। 'अर्थवाद' मीमांसकोंका पारिभाषिक शब्द है (जै. सू. १. २. १. १८)। इस बातके निश्चित हो जानेपरभी, कि हमें मुख्यतः किस बातको बतलाकर जमा देना है अथवा किस बातको सिद्ध करना है, कभी कभी ग्रंथकार दूसरी अनेक बातोंका प्रसंगानुसार वर्णन किया करता है; जैसे प्रतिपादनके प्रवाहमें दृष्टान्त देनेके लिये, तुलना करके एकवाक्यता करनेके लिये, समानता और भेद दिखलानेके लिये, प्रतिपक्षियोंके दोष बतलाकर स्वपक्षका मंडन करनेके लिये, अलंकार और अति- शयोक्तिके लिये, और युक्तिवादके पोषक किसी विषयका पूर्व-इतिहास बतलानेके लिये कुछ और वर्णनभी कर देता है। उक्त कारणों या प्रसंगोंके अतिरिक्त औरभी अन्य कारण हो सकते हैं; और कभी तो विशेष कारणभी नहीं होता। ऐसी अवस्थामें ग्रंथकार जो वर्णन करता है, वह यद्यपि विषयांतर नहीं हो सकता, तथापि वह केवल गौरवके लिये या स्पष्टीकरणके लियेही किया जाता है, इसलिये यह नहीं माना जा सकता कि उक्त वर्णन हमेशा सत्यही होगा।* अधिक क्या कहा जाय, कभी कभी स्वयं ग्रंथकार यह देखनेके लिये सावधान नहीं रहता, कि ये अप्रधान बातें अक्षरशः सत्य हैं या नहीं। अतएव ये सब बातें प्रमाणभूत नहीं मानी जातीं; अर्थात् यह नहीं माना जाता, कि इन भिन्न भिन्न बातोंका ग्रंथकारके सिद्धान्त पक्षके साथ कोई घना संबंध है। उलटे यही माना जाता है, कि ये सब बातें अनावश्यक अथवा केवल प्रशंसा या स्तुतिहीके लिये हैं - ऐसा समझकरही मीमांसक लोग इन्हें 'अर्थवाद' कहा करते हैं, और इन अर्थवादात्मक बातोंको छोड़कर फिर ग्रंथका तात्पर्य निश्चित किया करते हैं। इतना कर लेनेपरभी उपपत्तकी ओर ध्यान देनाही चाहिये। किसी विशेष बातको सिद्धकर दिखलानेके लिये बाधक प्रमाणोंका खंडन करना और साधक प्रमाणोंका तर्कशास्त्रानुसार मंडन करना 'उपपत्ति' अथवा 'उपपादन' कहलाता है। उपक्रम और उपसंहार-रूप आद्यंतके दो छोरोंके स्थिर हो जाने पर, बीचका मार्ग अर्थवाद और उपपत्तकी सहायतासे निश्चित किया जा सकता है। अर्थवादसे यह मालूम हो सकता है, कि कौनसा विषय अप्रस्तुत या आनुषंगिक (अप्रधान) है। एक बार अर्थवादका निर्णय हो जानेपर ग्रंथ-तात्पर्यका निश्चय करनेवाला मनुष्य सब टेढ़े मेढ़े रास्तोंको छोड़ देता है, और ऐसा करनेपर जब पाठक या परीक्षक सीधे और प्रधान मार्गपर आ जाता है, तब वह उपपत्तकी सहायतासे ग्रंथके आरंभसे अंतिम तात्पर्यतक आप-

  • अर्थवादका वर्णन यदि वस्तुस्थिति (यथार्थता) के आधारपर किया गया हो तो उसे 'अनुवाद' कहते हैं; यदि विरुद्ध रीतिसे किया गया हो तो उसे 'गुणवाद' कहते हैं; और यदि इससे भिन्न प्रकारका हो तो उसे 'भूतार्थवाद' कहते हैं। 'अर्थवाद' सामान्य शब्द है; उसके सत्यासत्यके अनुसार उक्त तीन भेद किये गये हैं।

विषयप्रवेश २३

ही-आप पहुँच जाता है। हमारे प्राचीन मीमांसकोंके निश्चित किये ग्रंथ तात्पर्य- निर्णय के ये नियम सब देशोंके विद्वानोंको एकसमान मान्य हैं। इसलिये उप- योगिता और आवश्यकताके संबंधमें यहाँ अधिक विवेचन करनेकी आवश्यकता नहीं है।* इसपर यह प्रश्न किया जा सकता है, कि क्या मीमांसकोंके उक्त नियम संप्रदाय चलानेवाले आचार्योंको मालूम नहीं थे? यदि ये सब नियम उनके ग्रंथोंहीमें पाये जाते हैं, तो फिर उनका बताया हुआ गीताका तात्पर्य एकदेशीय कैसे कहा जा सकता है? उसका उत्तर इतनाही है, कि एक बार किसीकी दृष्टि सांप्रदायिक (संकुचित) बन जाती है, तब वह व्यापकताका स्वीकार नही कर सकता

  • तब वह किसी-न-किसी रीतिसे यही सिद्ध करनेका यत्न किया करता है, कि प्रमाणभूत धर्मग्रंथोंमें अपनेही संप्रदायका वर्णन किया गया है। इन ग्रंथोंके तात्पर्यके विषयमें सांप्रदायिक टीकाकारोंकी पहलेसेही ऐसी धारणा हो जाती है, कि यदि उक्त ग्रंथोंका, उनके सांप्रदायके अर्थसे भिन्न कुछ दूसरा अर्थ हो सकता हो, तो वे यह समझते हैं, कि वह अर्थ सत्य नहीं है, उसका हेतु कुछ औरही है। इस प्रकार जब वे पहलेसे निश्चित किये हुए अपनेही संप्रदायके अर्थको सत्य मानने लगते हैं, और यह सिद्धकर दिखानेका यत्न करने लगते हैं, कि वही अर्थ सब धार्मिक ग्रंथोंमें प्रतिपादन किया गया है; तब वे इस बातकी परवाह नहीं करते कि हम मीमांसा- शास्त्रके कुछ नियमोंका उल्लंघन कर रहे हैं। हिंदु धर्मशास्त्रके मिताक्षरा, दायभाग इत्यादि ग्रंथोंमें स्मृतिवचनोंकी व्यवस्था या एकता इसी तत्त्वानुसारकी जाती है। ऐसा नहीं समझना चाहिये कि यह बात केवल हिंदु धर्मग्रंथोंमेंही पाई जाती है। क्रिस्तानोंके आदिग्रंथ बायबल और मुसलमानोंके कुरानमेंभी इन लोगोंके सैकड़ो सांप्रदायिक ग्रंथकारोंने ऐसाही अर्थांतर कर दिया है; और इसी तरह ईसाइयोंने पुरानी बायबलके कुछ वाक्योंका अर्थ यहूदियोंके अर्थसे भिन्न माना है। यहाँतक देखा जाता है, कि जब कभी यह बात पहलेहीसे निश्चित कर दी जाती है, कि किसी विषयपर अमुक ग्रंथ या लेखहीको प्रमाण मानना चाहिये और जब कभी इस प्रमाणभूत तथा नियमित ग्रंथहीके आधारपर सब बातोंका निर्णय करना पड़ता है, तब तो ग्रंथार्थ-निर्णयकी उसी पद्धतिका स्वीकार किया जाता है, जिसका
  • ग्रंथ-तात्पर्य-निर्णयके ये नियम अंग्रेजी अदालतोंमेंभी पाले जाते हैं। उदाहरणार्थ, मान लीजिये कि किसी फैसलेका कुछ मतलब नहीं निकलता। तब हुक्मनामेको देखकर फैसलेके अर्थका निर्णय किया जाता है। और यदि किसी फैसलेमें कुछ ऐसी बातें हों जो मुख्य विषयका निर्णय करनेमें आवश्यक नहीं हैं, तो वे दूसरे मुकदमोंमें प्रमाण (नजीर) नहीं मानी जातीं। ऐसी बातोंको अंग्रेजीमें 'आबिटर डिक्टा' (Obiter Dicta) अर्थात् 'व्यर्थ विधान' कहते हैं; यथार्थमें यह अर्थवादहीका एक भेद है।

२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उल्लेख ऊपर किया गया है। आजकलके बड़े बड़े कायदे-पंडित, वकील और न्यायाधीश लोग, पहलेके प्रमाणभूत कानूनी किताबों और फैसलोंका अर्थ करनेमें जो खींचातानी करते हैं, उसका रहस्यभी यही है। यदि सामान्य लौकिक बातोंका यह हाल है, तो इसमें कुछ आश्चर्य नहीं कि हमारे प्रमाणभूत धर्मग्रंथों - उप- निषद्, वेदान्तसूत्र और गीता - परभी इसी खींचातानीके कारण, भिन्न भिन्न संप्रदायोंके अनेक भाष्य, टीकाग्रंथ लिखे गये हैं। परंतु इस सांप्रदायिक पद्धतिको छोड़कर, यदि उपर्युक्त मीमांसकोंकी पद्धतिसे भगवद्गीताके उपक्रम, उपसंहार आदिको देखें, तो मालूम हो जावेगा कि भारतीय युद्धका आरंभ होनेके पहले जब कुरुक्षेत्रमें दोनों पक्षोंकी सेनाएँ लड़ाईके लिये सुसज्जित हो गई थीं; और जब एक दूसरेपर शस्त्र चलानेहीवाला था, कि इतनेमें अर्जुन ब्रह्मज्ञानकी बड़ी बड़ी बातें बतलाने लगा और 'विमनस्क' होकर संन्यास लेनेको तैयार हो गया; तभी उसे अपने क्षात्रधर्ममें प्रवृत्त करनेके लिये भगवानने गीताका उपदेश दिया है। जब अर्जुन यह देखने लगा कि दुष्ट दुर्योधनके सहायक बनकर उससे लड़ाई करनेके लिये कौन-कौन-से शूर वीर आये हैं, तब वृद्ध भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, गुरुपुत्र अश्वत्थामा, विपक्षी बने हुए अपने बंधु कौरव-गण, अन्य सुहृद् तथा आप्त, मामा-चाचा आदि रिश्तेदार, अनेक राजा और राजपुत्र आदि सब लोग उसे दीख पड़े। तब वह मनमें सोचने लगा कि इन सबको केवल एक छोटेसे हस्तिना- पुरके राज्यकी प्राप्तिके लिये निर्दयतासे मारना पड़ेगा और अपने कुलका क्षय करना पड़ेगा। इस महत्यापके भयसे उसका मन एकदम दुःखित और क्षुब्ध हो गया। एक ओर तो क्षात्रधर्म उससे कह रहा था, कि 'युद्ध कर'; और दूसरी ओर पितृभक्ति, गुरुभक्ति, बंधुप्रेम, सुहृत्प्रीति आदि अनेक धर्म उसे जबरदस्ती पीछे खींच रहे थे ! यह बड़ा भारी संकट था। यदि लड़ाई करे तो अपनेही रिश्तेदारों- की, गुरुजनोंकी, और बंधु-मित्रोंकी हत्या करके महापातकका भागी बनेगा और लड़ाई न करे तो क्षात्रधर्ममे च्युत होना पड़ेगा !! इधर देखो तो कुआँ और उधर देखो तो खाई ! ! ! उस समय अर्जुनकी अवस्था वैसीही हो गयी थी जैसी जोरसे टकराती हुई दो रेलगाड़ियोंके बीचमें किसी असहाय मनुष्यकी हो जाती है। यद्यपि अर्जुन कोई साधारण पुरुष नहीं था, वह एक बड़ा भारी योद्धा था, तथापि धर्माधर्मके इस महान् नैतिक संकटमें पड़कर बेचारेका मुंह सूख गया, शरीरपर रोंगटे खड़े हो गये, धनुष्य हाथसे गिर पड़ा और वह "मैं नहीं लडूंगा" कहकर अति दुःखित चित्तसे रथमें बैठ गया। और अंतमें समीपवर्ती बंधुस्नेहका प्रभाव - उस ममत्वका प्रभाव जो मनुष्यको स्वभावतः प्रिय होता है - दूरवर्ती क्षत्रियधर्मपर जमही गया ! तब वह मोहवश हो कहने लगा, "पिता-सम पूज्य वृद्ध और मित्रोंको मारकर तथा अपने कुलका क्षय करके घोर पाप करके, राज्यका एक टुकड़ा पानेसे भीख माँगकर जीवन निर्वाह करना कहीं श्रेयस्कर है ! चाहे मेरे शत्रु मुझे

अभी निःशस्त्र देखकर मेरी गर्दन उड़ा दें; परंतु मैं अपने स्वजनोंकी हत्या करके उनके खून और शापसे ग्रस्त सुखोंका उपभोग नहीं करना चाहता । क्या क्षात्रधर्म इसीको कहते हैं ? भाईको मारो, गुरुकी हत्या करो, पितृवध करनेसे न चुको, अपने कुलका नाश करो - क्या यही क्षात्रधर्म है ? आग लगे ऐसे अनर्थकारी क्षात्र- धर्ममें और गाज गिरे ऐसी क्षात्रनीतिपर ! दुश्मनोंको ये सब धर्मसंबंधी बातें मालूम नहीं हैं; वे दुष्ट हैं; तो क्या उनके साथ मैंभी पापी हो जाऊँ ? कभी नहीं। मुझे यह देखना चाहिये कि मेरी आत्माका कल्याण कैसे होगा। मुझे तो यह घोर हत्या और पाप करना श्रेयस्कर नहीं जँचता; फिर चाहे क्षात्रधर्म शास्त्रविहित हो, तोभी इस समय मुझे उसकी आवश्यकता नहीं है।" इस प्रकार विचार करते करते उसका चित्त डांवाडोल हो गया और वह किंकर्तव्यविमूढ होकर भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें गया। तब भगवानने उसे गीताका उपदेश देकर उसके चंचल चित्तको स्थिर और शांत कर दिया। इसका यह फल हुआ, कि जो अर्जुन पहले भीष्म आदि गुरुजनोंकी हत्याके भयके कारण युद्धसे पराङ्मुख हो रहा था, वही अब गीताका उपदेश सुनकर अपना यथोचित कर्तव्य समझ गया; और अपनी इच्छासे युद्धके लिये तत्पर हो गया। यदि हमें गीताके उपदेशका रहस्य जानना है, तो इस उपक्रमोप- संहार और परिणामको अवश्य ध्यानमें रखना पड़ेगा। भक्तिसे मोक्ष कैसे मिलता है ? ब्रह्मज्ञान या पातंजल योगसे मोक्षकी सिद्धि कैसे होती है ? इत्यादि, केवल निवृत्ति-मार्ग या कर्मत्यागरूप संन्यास-धर्म-संबंधी प्रश्नोंकी चर्चा करनेका वहाँ कोई प्रयोजन नहीं था। भगवान् श्रीकृष्णका यह उद्देश्य नहीं था, कि, अर्जुन संन्यास-दीक्षा लेकर और बैरागी बनकर भीख मांगता फिरे, या लंगोटी लगा- कर और नीमके पत्ते खाकर मृत्युपर्यंत हिमालयमें योगाभ्यास साधता रहे। अथवा भगवानका यहभी उद्देश्य नहीं था कि अर्जुन धनुष्य-बाणको फेंक दे और हाथमें वीणा तथा मृदंग लेकर कुरुक्षेत्रकी धर्मभूमिमें उपस्थित भारतीय क्षात्रसमाजके सामने भगवन्नामका उच्चारण करता हुआ, बृहन्नडाके समान और एक बार अपना नाच दिखावें। अब तो अज्ञातवास पूरा हो गया था और अर्जुनको कुरुक्षेत्रम खड़े होकर औरही प्रकार का नाच नाचना था। गीता कहते कहते स्थान स्थानपर भगवानने अनेक प्रकारके अनेक कारण बतलाये हैं; और अंतमें अनुमानदर्शक अत्यंत महत्त्वके 'तस्मात्' ('इसलिये') पदका उपयोग करके अर्जुनको यही निश्चितार्थक कर्म-विषयक उपदेश दिया है कि "तस्माद्युध्यस्व भारत" - इसलिये हे अर्जुन ! तू युद्ध कर (गीता २. १८); "तस्मादुत्तिष्ठ कौंतेय युद्धाय कृतनिश्चयः"

  • इसलिये हे कौंतेय अर्जुन ! तू युद्धका निश्चय करके उठ (गीता २. ३७); "तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर" - इसलिये तू मोह छोड़कर अपना कर्तव्य-कर्म कर (गीता ३. १९); "कुरु कर्मैव तस्मात् त्वं" - इसलिये तू कर्मही कर (गीता ४. १५); "मामनुस्मर युध्य च" - इसलिये मेरा स्मरण कर और

२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लड ( गीता ८. ७ ) ; “करने-करानेवाला सब कुछ मैं ही हूँ, तू केवल निमित्त है, इसलिये युद्ध करके शत्रुओंको जीत ” ( गीत ११. ३३) ; “ शास्त्रोक्त कर्तव्य करना तुझे उचित है ” ( गीता १६. २४ ) । अठारहवें अध्यायके उपसंहारमें भगवानने अपने निश्चित और उत्तम मतको औरभी एक बार प्रकट किया है- “ इन सब कर्मोंको करना चाहिये ” ( गीता १८. ६ ) । और अंतमें ( गीता १७. ७२ ), भगवानने अर्जुनसे प्रश्न किया है, कि “ हे अर्जुन ! तेरा अज्ञानमोह अभीतक नष्ट हुआ कि नहीं ? ” इसपर अर्जुनने संतोषजनक उत्तर दिया :- नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ॥ अर्थात् “ हे अच्युत ! स्वकर्तव्यसंबंधी मेरा मोह और संदेह नष्ट हो गया है; अब मैं आपके कथनानुसार सब काम करूँगा । ” यह अर्जुनका केवल मौखिक उत्तर नहीं था; उसने सचमुच उस युद्धमें भीष्म-कर्ण-जयद्रथ आदिका वधभी किया । इस- पर कुछ लोग कहते हैं, कि “ भगवानने अर्जुनको जो उपदेश दिया है वह केवल निवृत्तिविषयक ज्ञान, योग या भक्तिकाही है; और यही गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषयभी है। परंतु युद्धका आरंभ हो जानेके कारण बीच बीचमें, कर्मकी थोड़ी-सी प्रशंसा करके भगवानने अर्जुनको युद्ध पूरा करने दिया है; अर्थात् युद्धका समाप्त करना मुख्य बात नहीं है- उसे आनुषंगिक या अर्थवादात्मकही मानना चाहिये ” परंतु ऐसे अधूरे और कमजोर युक्तिवादसे गीताके उपक्रमोपसंहार और परिणाम- की उपपत्ति ठीक ठीक नहीं हो सकती । यहाँ (कुरुक्षेत्र) पर तो इसी बातके महत्व और आबश्यकताको दिखाना याकि स्वधर्मसम अपने कर्तव्यको मरणपर्यंत अनेक कष्ट और बाधाएँ सहकरभी करते रहना चाहिये। और इस बातको सिद्ध करनेके लिये श्रीकृष्णने गीताभरमें कहींभी बे-सिर-पैरका कारण नहीं बतलाया है, जैसा ऊपर लिखे हुए कुछ लोगोंके आक्षेपमें कहा गया है। यदि ऐसा युक्तिहीन कारण बतलाया- भी गया होता तो अर्जुनसरीखा बुद्धिमान और छानबीन करनेवाला पुरुष इन बातोंका विश्वास कैसे कर लेता ? उसके मनमें मुख्य प्रश्न क्या था ? यही न, कि भयंकर कुलक्षयको प्रत्यक्ष आँखोंके आगे देखकरभी मुझे युद्ध करना चाहिये या नहीं; और युद्ध करनाही हो तो कैसे करे, जिससेकी पाप न लगे ? इस बिकट प्रश्नके ( इस प्रधान विषयके ) उत्तरको, कि “ निष्काम बुद्धिसे युद्ध कर ” या “ कर्म कर ” - अर्थवाद कहकरभी नहीं टाल सकते । ऐसा करना मानों घरके मालिकको उसीके घरमें मेहमान बना देना है। हमारा यह कहना नहीं है, कि गीतामें वेदान्त, भक्ति और पातंजल योगका उपदेश बिलकुल दियाही नहीं गया है। परंतु इन तीनों विषयोंका गीतामें जो मेल किया गया है, वह केवल ऐसाही होना चाहिये, कि जिससे परस्पर- विरुद्ध धर्मोंके भयंकर संकटमें पड़े हुए, “ यह करूँ कि वह ” कहनेवाले कर्तव्य-मूढ़ अर्जुनको अपने कर्तव्यके विषयमें कोई निष्पाप मार्ग मिल जाय; और वह क्षात्रधर्मके

अनुसार अपने शास्त्रविहित कर्ममें प्रवृत्त हो जाय । इससे यही बात सिद्ध होती है, कि प्रवृत्तिधर्महीका ज्ञान गीताका प्रधान विषय है; और अन्य सब बातें उस प्रधान विषयहीकी सिद्धिके लिये कही गयी हैं। अर्थात् वे सब आनुषंगिक हैं। अतएव गीताधर्मका रहस्यभी प्रवृत्तिविषयक अर्थात् कर्मविषयकही होना चाहिये । परंतु इस बातका स्पष्टीकरण किसी टीकाकारने नहीं किया है, कि वह प्रवृत्तिविषयक रहस्य क्या है; और वेदान्तशास्त्रहीसे कैसे सिद्ध हो सकता है। जिस टीकाकारको देखो, वही गीताके आद्यंत के उपक्रम-उपसंहार तथा फलपर ध्यान न देकर निवृत्ति- दृष्टिसे इस बातका विचार करनेहीमें निमग्न दीख पड़ता है, कि गीताका ब्रह्मज्ञान या भक्ति अपनेही संप्रदायके कैसे अनुकूल है। मानों ज्ञान और भक्तिका कर्मसे नित्य संबंध बतलाना एक बड़ा भारी पाप है। यही शंका एक टीकाकारके मनमें हुई थी; और उसने लिखा था, कि स्वयं श्रीकृष्णके चरित्रको आंखोंके सामने रखकर भगवद्गीताका अर्थ करना चाहिये* । श्रीक्षेत्र काशीके सुप्रसिद्ध अद्वैती परमहंस श्रीकृष्णानंद स्वामीका - जो हालहीमें समाधिस्थ हुए हैं - भगवद्गीता- पर लिखा हुआ 'गीतार्थ-परामर्श' नामक संस्कृतमें एक निबंध है, उसमें स्पष्ट रीतिसे यही सिद्धान्त लिखा हुआ है, कि "तस्मात् गीता नाम ब्रह्मविद्यामलं नीतिशास्त्रम्" अर्थात् - इसलिये गीता वह नीतिशास्त्र अथवा कर्तव्यधर्मशास्त्र है जो कि ब्रह्म- विद्यासे सिद्ध होता है ।† यही बात जर्मन पंडित प्रो. डॉयसेनने अपने ' उपनिषदों- का तत्त्वज्ञान ' नामक ग्रंथमें कही है। इनके अतिरिक्त पश्चिमी और पूर्वी गीता- परीक्षक अनेक विद्वानोंकाभी यही मत है। तथापि इनमेंसे किसीने समस्त गीता- ग्रंथकी परीक्षा करके यह स्पष्टतया दिखलानेका प्रयत्न नहीं किया है, कि कर्मप्रधान दृष्टिसे उसके सब प्रतिपादनों और अध्यायोंका मेल कैसा है। बल्कि डॉयसेनने अपने ग्रंथमें कहा है ‡, कि यह प्रतिपादन कष्टसाध्य है। इसलिये प्रस्तुत ग्रंथका मुख्य उद्देश्य यही है, कि उक्त रीतिसे गीताकी परीक्षा करके उसके विषयोंका मेल अच्छी तरह प्रकटकर दिया जावे परंतु । ऐसा करनेसे पहले, गीताके आरंभमें परस्परविरुद्ध नीतिधर्मोंकी पकड़में फँसे अर्जुनपर जो संकट आया था उसका असली रूपभी दिखलाना चाहिये; नहीं तो गीतामें प्रतिपादित विषयोंका मर्म पाठकोंके ध्यानमें पूर्णतया नहीं जम सकेगा । इसलिये अब यह जाननेके लिये कर्म-अकर्म


  • इस टीकाकारका नाम और उसकी टीकाके कुछ अवतरण बहुत दिन हुए एक महाशयने हमको पत्रद्वारा बतलाये थे । परंतु हमारी परिस्थितिकी गड़बड़में यह पत्र न जाने कहाँ खो गया । † श्रीकृष्णानंदस्वामीकृत चारों निबंध ( श्रीगीतारहस्य, गीतार्थप्रकाश, गीतार्थपरामर्श और गीतासारोद्धार) एकत्र करके राजकोटमें प्रकाशित किये गये हैं। ‡ Prof. Deussen's 'Philosophy of the Upanishads' P. 362. (English Translation, 1906. )

२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र के झगडे कैसे बिकट होते हैं और अनेक बार " इसे करूँ कि उसे " यह सूझ न पडनेके कारण मनुष्य कैसा घबड़ा उठता है, ऐसेही प्रसंगोंके अनेक उदाहरणोंका विचार किया जायगा, जो हमारे शास्त्रोंमें - विशेषतः महाभारतमें - पाये जाते हैं।

दूसरा प्रकरण कर्मजिज्ञासा किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः

  • गीता ४. १६ भगवद्गीताके आरंभमें, परस्पर-विरुद्ध दो धर्मोंकी उलझनमें फँस जानेके कारण अर्जुन जिस तरह कर्तव्यमूढ हो गया था, और उसपर जो आपत्ति आ पडी थी वह कुछ अपूर्व नहीं है। उन असमर्थ और अपनाही पेट पालनेवाले लोगोंकी बातही भिन्न है, जो संन्यास लेकर और संसारको छोड़कर वनमें चले जाते हैं अथवा जो कमजोरीके कारण जगतके अनेक अन्यायोंको चुपचाप सह लिया करते हैं। परंतु समाजमें रहकरही जिन महान् तथा कार्यकर्ता पुरुषोंको अपने सांसारिक कर्तव्योंका पालन धर्म तथा नीतिपूर्वक करना पडता है, उनपर ऐसी आपत्तियाँ अनेक बार आया करती हैं। युद्धके आरंभहीमें अर्जुनको कर्तव्य-जिज्ञासा और मोह हुआ। ऐसाही मोह युधिष्ठिरको - युद्धमें मरे हुए अपने रिश्तेदारोंका श्राद्ध करते समय - हुआ था। उसके इस मोहको दूर करनेके लिये 'शांतिपर्व' कहा गया है। कर्माकर्मसंशयके ऐसे अनेक प्रसंग ढूँढ़ कर अथवा कल्पित करके उनपर बड़े बड़े कवियोंने सुरस काव्य और उत्तम नाटक लिखे हैं। उदाहरणार्थ, प्रसिद्ध अंग्रेजी नाटककार शेक्सपीयरका हैमलेट नाटक लीजिये। डेन्मार्क देशके प्राचीन राजपुत्र हैमलेटके चाचाने अपने राजकर्ता भाई - हैमलेटके बाप - को मार डाला। हैमलेट- की माताको अपनी पत्नी बना लिया और राजगद्दीभी छीन ली। तब उस राज- कुमारके मनमें यह संघर्ष पैदा हुआ, कि ऐसे पापी चाचाका वध करके पुत्र-धर्मके अनुसार अपने पिताके ऋणसे मुक्त हो जाऊँ; अथवा अपने सगे चाचा, अपनी माताके पति और गद्दीपर बैठे हुए राजापर दया करूँ? इस मोहमें पड जानेके कारण कोमल अंतःकरणके हैमलेटकी कैसी दशा हुई और श्रीकृष्णके समान कोई मार्ग-दर्शक और हितकर्ता न होनेके कारण वह कैसे पागल हो गया और अंतमें 'जियें या मरें' इसी बातकी चिंता करने उसका अंत कैसे हो गया, इत्यादि बातोंका चित्र इस नाटकमें बहुत अच्छी तरहसे दिखाया गया है। 'कोरियोलेनस' नामके दूसरे नाटकमेंभी इसी तरह एक और प्रसंगका वर्णन शेक्सपीयरने किया है।
  • "पंडितोंकोभी इस विषयमें मोह हो जाया करता है, कि कर्म कौन-सा है और अकर्म कौन-सा है।" इस स्थानपर अकर्म शब्दको 'कर्मके अभाव' और 'बुरे कर्म' दोनों अर्थोंमें यथासंभव लेना चाहिये। मूल श्लोकपर हमारी टीका देखो।

३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र रोम नगरमें कोरियोलेनस नामका एक शूर सरदार था । नगरवासियोंने उसको शहरसे निकाल दिया । तब वह रोमन लोगोंके शत्रुओंमें जा मिला और उसने प्रतिज्ञा की, कि “ मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोडूंगा । ” कुछ समयके बाद इन शत्रुओंकी सहायतासे उसने रोमन लोगोंपर हमला किया और वह अपनी सेना लेकर रोम शहरके दरवाजेके पास आ पहुँचा । उस समय रोम शहरकी स्त्रियोंने कोरियोलेनसकी पत्नी और माताको सामने करके, मातृभूमिके संबंधके कर्तव्यका उसको उपदेश किया । अंतमें उसको रोमके शत्रुओंको दिये हुए वचनका भंग करना पडा । कर्तव्य- अकर्तव्यके मोहमें फँस जानेके ऐसे औरभी कई उदाहरण दुनियाके प्राचीन और आधुनिक इतिहासमें पाये जाते हैं। परंतु हम लोगोंको इतना दूर जानेकी कोई आवश्यकता नहीं। हमारा महाभारत-ग्रंथ ऐसे उदाहरणोंकी एक बड़ी भारी खानही है। ग्रंथके आरंभ ( आ. २) में भारतका वर्णन करते हुए स्वयं व्यासजीने उसको 'सूक्ष्मार्थन्याययुक्तं', 'अनेकसामयान्वितं' आदि विशेषण दिये हैं। उसमें धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और मोक्षशास्त्र, सब कुछ आ गया है। इतनाही नहीं, किंतु उसकी महिमा इस प्रकार गाई गयी, कि “ यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् ” - अर्थात् जो कुछ इसमें है वही और स्थानोंमें है, जो इसमें नहीं है वह और किसीभी स्थानमें नहीं है (आ. ६२. ५३) । सारांश यह है, कि इस संसारमें अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं; ऐसे समय बड़े बड़े प्राचीन पुरुषोंने कैसा बर्ताव किया, इसका सुलभ आख्यानों- के द्वारा साधारण जनोंको बोध करा देनेहीके लिये 'भारत'का 'महाभारत' हो गया है। नहीं तो सिर्फ भारतीय युद्ध अथवा 'जय'नामक इतिहासका वर्णन करनेके लिये अठारह पर्वोंकी कुछ आवश्यकता नहीं थी । अब यह प्रश्न किया जा सकता है, कि श्रीकृष्ण और अर्जुनकी बातें छोड़ दीजिये; हमारे-तुम्हारे लिये इतने गहरे पानीमें पैठनेकी क्या आवश्यकता है ? क्या मनु आदि स्मृतिकारोंने अपने ग्रंथोंमें इस बातके स्पष्ट नियम नहीं बना दिये हैं, कि मनुष्य संसारमें किस तरह बर्ताव करे ? किसीकी हिंसा मत करो, नीति- पर चलो, सच बोलो, गुरु और बड़ोंका सम्मान करो, चोरी और व्यभिचार मत करो; इत्यादि सब धर्मोंमें पाई जानेवाली साधारण आज्ञाओंका यदि पालन किया जाय, तो ऊपर लिखे कर्तव्य-अकर्तव्यके झगड़ेमें पड़नेकी क्या आवश्यकता है ? परंतु इसके विरुद्ध यहभी प्रश्न किया जा सकता है कि जबतक इस संसारके सब लोग उक्त आज्ञाओंके अनुसार बर्ताव नहीं करते हैं, तबतक सज्जनोंको क्या करना चाहिये ? क्या ये लोग अपने सदाचारके कारण दुष्ट जनोंके फंदेमें अपनेको फँसा लें ? या अपनी रक्षाके लिये 'जैसे को तैसा' इस न्यायसे उन लोगोंका प्रतिकार करें ? इसके सिवा एक बात और है । यद्यपि उक्त साधारण नियमों- को नित्य और प्रमाणभूत मान लें, तथापि कार्यकर्ताओंको अनेक बार ऐसी आपत्तियोंका सामना करना पडता है कि उस समय उक्त साधारण नियमोंसे दो

[Page Header: कर्मजिज्ञासा ३१]

या अधिक नियम एकसाथ लागू होते हैं। उस समय "यह करूँ या वह करूँ" इस चिंतामें पड़कर मनुष्य पागल-सा हो जाता है। अर्जुनपर ऐसीही आपत्ति आ पडी थी, परंतु अर्जुनके सिवा और लोगोंपरभी ऐसे कठिन प्रसंग अक्सर आया करते हैं। इस बातका मार्मिक विवेचन महाभारतमें कई स्थानोंमें किया गया है। उदा- हरणार्थ, मनुने सब वर्णोंके लोगोंके लिये नीतिधर्मके पांच नियम बतलाये हैं- "अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः" (मनु. १०. ६३) - अहिंसा, सत्य, अस्तेय, काया, वाचा और मनकी शुद्धता, एवं इंद्रियनिग्रह - इन नीतिधर्मोंमेंसे एक अहिंसाही का विचार कीजिये। "अहिंसा परमो धर्मः" (महा. आ. ११. १३) यह तत्त्व सिर्फ हमारे वैदिक धर्महीमें नहीं, किंतु अन्य सब धर्मोंमेंभी प्रधान माना गया है। बौद्ध और ईसाई धर्मग्रंथोंमें जो आज्ञाएं हैं, उनमें अहिंसाको मनुकी आज्ञाके समान पहला स्थान दिया गया है। सिर्फ किसीकी जान ले लेनाही हिंसा नहीं है तो उसमें किसीके मन अथवा शरीरको दुख देनेकाभी समावेश किया जाता है। अर्थात्, किसी सचेतन प्राणीको किसी प्रकार दुःखित न करनाही अहिंसा है। पितृ- वध, मातृवध और मनुष्यवध - ये हिंसाके भयानक प्रकार हैं, अतः इस संसारमें सब लोगोंकी संमतिके अनुसार यह अहिंसाधर्म सब धर्मोंमें श्रेष्ठ माना गया है। परंतु अब कल्पना कीजिये, कि हमारी जान लेनेके लिये या हमारी पत्नी अथवा कन्यापर बलात्कार करनेके लिये, अथवा हमारे घरमें आग लगानेके लिये, या हमारा धन छीन लेनेके लिये, कोई दुष्ट मनुष्य हाथमें शस्त्र लेकर तैयार हो जाय और उस समय हमारी रक्षा करनेवाला हमारे पास कोई न हो; तो उस समय हमको क्या करना चाहिये ? क्या, "अहिंसा परमो धर्मः" कहकर ऐसे आततायी मनुष्य- पर दया की जाय ? या, यदि वह दुष्ट सीधी तरहसे न माने तो यथाशक्ति उसका शासन किया जाय ? मनुजी कहते हैं :- गुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम् । आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन् ॥ अर्थात् "ऐसे आततायी या दुष्ट मनुष्यको अवश्य मार डालें; उस समय यह विचार न करें कि वह गुरु है, बुढ़ा है, बालक है या विद्वान् ब्राह्मण है।" शास्त्रकार कहते हैं कि (मनु. ८. ३५०) ऐसे समय हत्या करनेका पाप हत्या करनेवालेको नहीं लगता; किंतु आततायी मनुष्य अपने अधर्महीसे मारा जाता है। आत्मरक्षाका यह हक़

  • कुछ मर्यादाके भीतर - आधुनिक फौजदारी कानूनमेंभी स्वीकृत किया गया है। ऐसे प्रसंगोंपर अहिंसासे आत्मरक्षाकी योग्यता अधिक मानी जाती है। भ्रूण- हत्या सबसे अधिक निंदनीय मानी है; परंतु जब बच्चा पेटमें टेढ़ा होकर अटक जाता है तब क्या उसको काटकर निकाल नहीं डालना चाहिये ? यज्ञमें पशुका वध करना वेदनेभी प्रशस्त माना है (मनु. ५. ३१), परंतु पिष्टपशुके द्वारा वह टलभी सकता है (महा. शां. ३३७; अनु. ११५. ५६)। तथापि हवा, पानी,

३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र फल इत्यादि सब स्थानोंमें जो सैकड़ों सूक्ष्म जीव-जंतु हैं उनकी हत्या कैसे टाली जा सकती है ? महाभारतमें (शां. १५. २६) अर्जुन कहता है :- सूक्ष्मयोनीनि भूतानि तर्कगम्यानि कानिचित् । पक्ष्मणोऽपि निपातेन येषां स्यात् स्कन्धपर्ययः ॥ “इस जगत्‌में ऐसे असंख्य सूक्ष्म जंतु हैं, कि जिनका अस्तित्व यद्यपि नेत्रोंसे देख नहीं पड़ता, तथापि तर्कसे सिद्ध है। और यदि हम अपनी आँखोंकी पलक हिलावें, तो उतनेहीसे, उन जंतुओंका नाश हो जाता है !” ऐसी अवस्था में यदि हम मुखसे कहते रहें, कि “हिंसा मत करो, हिंसा मत करो,” तो उससे क्या लाभ होगा ? इसी सारासार विचारके अनुसार अनुशासन पर्वमें (अनु. ११६) शिकार करनेका समर्थन किया गया है। वनपर्वमें एक कथा है, कि कोई ब्राह्मण क्रोधसे किसी पति- व्रता स्त्रीको भस्मकर डालना चाहता था; परंतु जब उसका यत्न सफल नहीं हुआ तब वह उस स्त्रीकी शरणमें गया। तब धर्मका सच्चा रहस्य समझ लेनेके लिये उस ब्राह्मणको उस स्त्रीने किसी व्याधके यहाँ भेज दिया। यह व्याध मांस बेचा करता था; परंतु था अपने माता-पिताका बड़ा भक्त ! व्याधका वह व्यवसाय देख- कर ब्राह्मणको अत्यंत विस्मय और खेद हुआ। तब व्याधने उसे अहिंसाका सच्चा तत्त्व समझाकर बतला दिया कि इस जगत्‌में कौन किसको नहीं खाता ? “जीवो जीवस्य जीवनम्” (भाग. १. १३. ४६) - यही नियम सर्वत्र दीख पड़ता है। आपत्कालमें तो “प्राणस्यान्नमिदं सर्वम्” यह नियम सिर्फ़ स्मृतिकारोंहीने नहीं, (मनु. ५. २८; मभा. शां. १५. २१) कहा है तो उपनिषदोंमेंभी स्पष्ट कहा गया है। (वे. सू. ३. ४. २८; छां. ५. २. ८; बृ. ६. १. १४) यदि सब लोग हिंसा छोड़ दें तो क्षात्रधर्म कहाँ और कैसे शेष रहेगा। यदि क्षात्रधर्म नष्ट हो जाय तो प्रजाकी रक्षा कैसे होगी ? सारांश यह है कि नीतिके सामान्य नियमोंहीसे सदा काम नहीं चलता; नीतिशास्त्रके प्रधान नियम - अहिंसा - मेंभी कर्तव्य-अकर्तव्यका सूक्ष्म विचार करनाही पड़ता है। अहिंसाधर्मके अनुसारही क्षमा, दया, शांति आदि गुण शास्त्रोंमें कहे गये हैं; परंतु सब समय शांतिसे कैसे काम चल सकेगा ? सदा शांत रहनेवाले मनुष्योंके बाल-बच्चोंकोभी दुष्ट लोग हरण किये बिना नहीं रहेंगे। इसी कारणका प्रथम उल्लेख करके प्रल्हादने अपने नाती, राजा बलिसे कहा है :- न श्रेयः सततं तेजो न नित्यं श्रेयसी क्षमा । . . . . . . . . . . . . . . . तस्मान्नित्यं क्षमा तात पंडितैरपवादिता ॥ “सदैव क्षमा करना अथवा क्रोध करना श्रेयस्कर नहीं होता ! इसी लिये, हे तात ! पंडितोंने क्षमाके लिये कुछ अपवादभी कहे हैं (मभा. वन. २८. ६, ७) इसके बाद कुछ प्रसंगोंका वर्णन किया गया है, जो क्षमाके लिये उचित है; तथापि प्रल्हाद-

कर्मजिज्ञासा ३३ ने इस बातका उल्लेख नहीं किया, कि इन प्रसंगोंको पहचाननेका तत्त्व या नियम क्या हैं। यदि इन प्रसंगोंको पहचाने बिना, सिर्फ अपवादोंकाही कोई उपयोग करे, तो वह दुराचरण समझा जाएगा; इसलिये यह जानना अत्यंत आवश्यक और महत्त्वका है, कि इन प्रसंगोंको पहचाननेका नियम क्या है। दूसरा तत्त्व 'सत्य' है, जो सब देशों और धर्मोंमें भलीभाँति माना जाता है और प्रमाण समझा जाता है। सत्यकी महानताका वर्णन कहाँतक किया जाय ? वेदमें सत्यकी महिमाके विषयमें कहा है, कि सारी सृष्टिकी उत्पत्तिके पहले 'ऋतं' , और 'सत्यं' उत्पन्न हुए; और सत्यहीसे आकाश, पृथ्वी, वायु आदि पंचमहाभूत स्थिर हैं- "ऋतंच सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत" (ऋ. १०. १९०. १), "सत्ये- नोत्तमिता भूमिः" (ऋ. १०. ८५. १) आदि मंत्र देखो। 'सत्य' शब्दका धात्वर्थभी यही है- "रहनेवाला अर्थात् कभी नष्ट न होनेवाला।" अथवा 'त्रिकाल-अबा- धित'; इसीलिये सत्यके विषयमें कहा गया है, कि "सत्यके सिवा और धर्म नहीं है; सत्यही परब्रह्म है।" महाभारतमें कई जगह इस वचनका उल्लेख किया गया है, कि "नास्ति सत्यात्परो धर्मः" (महा. शां. १६२. २४) और यहभी लिखा है कि :- अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥ "हज़ार अश्वमेध और सत्य की तुलना की गयी तो सत्यही श्रेष्ठ सिद्ध हुआ" (आ. ७४. १०२)। यह वर्णन सामान्य सत्यके विषयमें हुआ। सत्यके विषयमें मनुजी एक और विशेष बात कहते हैं (महा. मनु. ४. २५६) :- वाच्यार्था नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनिःसृताः । तां तु यः स्तेनयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः ॥ "मनुष्योंके सब व्यवहार वाणीसे हुआ करते हैं। एकके विचार दूसरेको बतानेके लिये शब्दके समान अन्य साधन नहीं है। वही सब व्यवहारोंका आश्रय-स्थान और वाणीका मूल स्रोत है। जो मनुष्य उसको मलिन कर डालता है, अर्थात् जो वाणीकी प्रतारणा करता है, वह सब पूंजीहीकी चोरी करता है।" इसलिये मनुने कहा है, कि "सत्यपूतां वदेद्वाचं" (मनु. ६. ४६) - जो सत्यसे पवित्र किया गया हो, वही बोला जाय। और धर्मोंकी अपेक्षा सत्यहीको पहला स्थान देनेके लिये उपनिषद्- मेंभी कहा है, "सत्यं वद। धर्मं चर" (तै. १. ११. १)। जब बाणोंकी शय्यापर पड़े पड़े भीष्म पितामह शांति और अनुशासन पर्वोंमें युधिष्ठिरको सब धर्मोंका उपदेश देचुके, तब प्राण छोड़नेके पहले "सत्येषु यतितव्यं वः सत्यं हि परमं बलं" इस वचनको सब धर्मोंका सार कहकर उन्होंने सत्यहीके अनुसार बर्ताव करनेके लिये सब लोगोंको उपदेश किया है (महा. अनु. १६७. ५०)। बौद्ध और ईसाई धर्मोंमेंभी इन्हीं नियमोंका अनुवाद पाया जाता है। गी. र. ३

३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र क्या उस बातकी कभी कल्पनाकी जा सकती है, कि जो सत्य इस प्रकार स्वयंसिद्ध और चिरस्थायी है, इसके लियेभी कुछ अपवाद होंगे ? परंतु दुष्ट जनोंमे भरे हुए इस जगतका व्यवहार बहुत कठिन है। कल्पना कीजिये, कि कुछ आदमी चोरोंसे पीछा किये जानेपर तुम्हारे सामने किसी स्थानमें जाकर छिप गये। इसके बाद हाथमें तलवार लिये हुए चोर तुम्हारे पास आकर पूछने लगे, कि वे आदमी कहाँ चले गये ? ऐसी अवस्थामें तुम क्या कहोगे ? क्या तुम सच बोलकर सब हाल कह दोगे, या उन निरपराधी जीवोंकी हिंसाको रोकोगे ? क्यों कि निरपराधोंकी हिंसाको रोकना सत्यहीके समान महत्त्वका धर्म है। मनु कहते हैं, “नापृष्टः कस्यचिद् ब्रूयान्न चान्यायेन पृच्छतः” (मनु. २. ११०; मभा. शां. २८७. ३४) - जबतक कोई प्रश्न न करे, तबतक किसीसे बोलना न चाहिये; और यदि कोई अन्यायसे प्रश्न करे तो पूछनेपरभी उत्तर नहीं देना चाहिये। यदि मालूमभी हो, तो सिड़ी या पागलके समान कुछ हूँ-हूँ करके बात बना देनी चाहिये - "जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत्।" अच्छा, पर हूँ-हूँ कर देना और बात बना देना एक तरहसे असत्य भाषण करना नहीं है ? महाभारत (मभा. आ. २१५. ३४) में कई स्थानोंमें कहा है, “न व्याजेन चरेद्धर्मम्” - धर्मसे प्रतारणा करके मनका समाधान नहीं कर लेना चाहिये; क्योंकि तुम धर्मको धोखा नहीं दे सकते। तुम खुद धोखा खा जाओगे । अच्छा, यदि हूँ-हूँ करके कुछ बात बना लेनेकाभी समय न हो, तो क्या करना चाहिये ? मान लीजिये, कोई चोर हाथमें तलवार लेकर छातीपर आ बैठा है; और पूछ रहा है, कि तुम्हारा धन कहाँ है ? यदि कुछ उत्तर न दोगे, तो जानहीसे हाथ धोना पड़ेगा। ऐसे समयपर क्या बोलना चाहिये ? सब धर्मोंका रहस्य जाननेवाले भगवान् श्रीकृष्ण - ऐसेही चोरोंकी कहानीका दृष्टान्त देकर - कर्णपर्व (मभा. क. ६९. ६१) में अर्जुनसे और आगे शांतिपर्वके सत्यानृतं अध्याय (मभा. शां. १०९. १५. १६) में भीष्म पितामह युधिष्ठिरसे कहते हैं :- अकूजनेन चेन्मोक्षो नावक्कूजेत्कथंचन । अवश्यं कूजितव्ये वा शंकेरन् वाप्यकूजनात् । श्रेयस्तत्रानृतं वक्तुं सत्यादिति विचारितम् ॥ अर्थात् 'यह बात विचारपूर्वक निश्चित की गई है, कि यदि बिना बोले मोक्ष या छुटकारा हो सके, तोभी हो, बोलना नहीं चाहिये; और यदि बोलना आवश्यक हो, अथवा न बोलनेसे (दूसरो को) कुछ संदेह होना संभव हो, तो उस समय सत्यके बदले असत्य बोलनाही अधिक प्रशस्त है।' इसका कारण यह है, कि सत्य धर्म केवल शब्दोच्चारहीके लिये नहीं है। अतएव जिस आचरणसे सब लोगोंका कल्याण हो, वह आचरण सिर्फ इसी कारणसे निंद्य नहीं माना जा सकता, कि शब्दोच्चार अयथार्थ है। जिससे सभीकी हानि हो, वह न तो सत्यही है; और न अहिंसाही।

कर्मजिज्ञासा ३५ शांतिपर्व (मभा. शां. ३२९. १३; २८७. १९) में सनत्कुमारके आधारपर नारदजी शुकजीसे कहते हैं :- सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत् । यद्भूतहितमत्यन्तं एतत्सत्यं मतं मम ।। " सच बोलना अच्छा है; परंतु सत्यसेभी अधिक ऐसा बोलना अच्छा है; जिसमे सब प्राणियोंका हित हो। क्योकि जिससे सब प्राणियोंका अत्यंत हित होता है, वही हमारे मतमें सत्य है। " 'यद्भूतहितं' पदको देखकर आधुनिक उपयोगितावादी अंग्रेजों का स्मरण करके यदि कोई उक्त वचनको प्रक्षिप्त कहना चाहें, तो उन्हें स्मरण रखना चाहिये, कि वह वचन महाभारतके वनपर्वमे - ब्राह्मण और व्याधके संवादमें - दो-तीन बार आया है। उनमेंसे एक जगह तो " अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतहितं परम् " पाठ है ( मभा. वन. २०६. ७३ ) ; और दूसरी जगह " यद्भूतहितमत्यन्तं तत्सत्यमिति धारणा " ( वन. २०८. ४ ) , ऐसा पाठभेद किया गया है। सत्यप्रतिज्ञ युधिष्ठिरने द्रोणाचार्यसे " नरो वा कुंजरो वा " कहकर उन्हें संदेहमें क्यों डाल दिया ? इसका कारण वही है, जो ऊपर दिया गया है; और कुछ नहीं । ऐसेही और बातोंमेंभी यही नियम लगाया जाता है। हमारे शास्त्रोंका यह कथन नही है, कि झूठ बोलकर किसी खूनीकी जान बचाई जाये । शास्त्रोंमें खून करनेवाले आदमीके लिये देहांत प्रायश्चित्त अथवा वधदंडकी सजा कही गयी है। इसलिये वह सजा पाने योग्य अथवा वध्य है। सभी शास्त्रकारोंने कहा है कि इसीके समान और किसी समय जो आदमी झूठो गवाही देता है वह अपने सात या अधिक पूर्वजोंसहित नरकमें जाता है। (मनु. ८. ८९-९९; मभा. आ. ७. ३)। परंतु जब कर्णपर्वमें वर्णित उक्त चोरोंके दृष्टान्तके समान हमारे सच बोलनेसे निरपराधी आदमियोंकी जान जानेकी शंका हो, तो उस समय क्या करना चाहिये ? ग्रीन नामक एक अंग्रेज ग्रंथकारने अपने ' नीतिशास्त्र का उपोद्घात' नामक ग्रंथमें लिखा है, कि ऐसे अवसरोंपर नीतिशास्त्र मूक हो जाते हैं। यद्यपि मनु और याज्ञवल्क्य ऐसे प्रसंगोंकी गणना सत्यापवादोंमें करते हैं, तथापि यह भी उनके मतसे गौण बात है। इसलिये अंतमें उन्होने इस अपवादके लिये भी प्रायश्चित्त बतलाया है - "तत्पावनाय निर्वाप्यश्चरुः सारस्वतो द्विजैः" (याज्ञ. २. ८३; मनु. ८. १०४-१०६) । कुछ बड़े अंग्रेजोंने - जिन्हें अहिंसाके अपवादके विषयमें आश्चर्य नहीं मालूम होता - हमारे शास्त्रकारोंको सत्यके विषयमें दोष देनेका यत्न किया है। इसलिये यहाँ इस बातका उल्लेख किया जाता है, कि सत्यके विषयमें प्रामाणिक ईसाई धर्मोप- देशक और नीतिशास्त्रके अंग्रेज ग्रंथकार क्या कहते हैं। क्राइस्टका शिष्य पॉल नये बाइबलमें कहता है, 'यदि मेरे असत्य भाषणसे प्रभुके सत्यकी महिमा और बढ़ती है ( अर्थात् ईसाई धर्मका अधिक प्रचार होता है ), तो इससेमैं पापी कैसे हो सकता हूँ' ? ( रोम. ३. ७ ) ईसाई धर्मके इतिहासकार मिलमैलने लिखा है, कि

३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्राचीन ईसाई धर्मोपदेशक कई बार इसी तरह आचरण किया करते थे। यह बात सच है, कि वर्तमान समयके पाश्चिमात्य नीतिशास्त्रज्ञ किसीको धोखा देकर या भुलाकर धर्मभ्रष्ट करना न्याय्य नहीं मानेंगे; परंतु वेभी यह कहनेको तैयार नहीं हैं, कि सत्यधर्म अपवादरहित है। उदाहरणार्थ, यह देखिये, कि सिजविक नामके जिस पंडितका नीतिशास्त्र हमारे कॉलेजोंमें पढ़ाया जाता है, उसकी क्या राय है। कर्म और अकर्मके संदेहका निर्णय जिस तत्त्वके आधारपर यह ग्रंथकार किया करता है, उसको "सबसे अधिक लोगोंका सबसे अधिक सुख" (बहुत लोगोंका बहुत सुख) कहते हैं। इसी नियमके अनुसार उसने यह निर्णय किया है, कि छोटे लड़कोंको, पागलोंको, और इसी प्रकार बीमार आदमियोंको (यदि सच बात सुना देनेसे उसके स्वास्थ्यके बिगड़ जानेका भय हो), अपने शत्रुओंको, चोरोंको और (यदि बिना बोले काम चल न सकता हो तो) जो अन्यायसे प्रश्न करें, उसको उत्तर देनेके समय, अथवा वकीलोंको अपने व्यवसायमें झूठ बोलना अनुचित नहीं है।* मिलके नीतिशास्त्रके ग्रंथमेंभी इसी अपवादका समावेश किया गया है।† इन अपवादोंके अतिरिक्त सिजविक अपने ग्रंथमें यहभी लिखता है, कि 'यद्यपि कहा गया है, कि सब लोगोंको सच बोलना चाहिये, तथापि हम यह नहीं कह सकते, कि जिन राज-नीतिज्ञोंको अपनी कारवाई गुप्त रखनी पड़ती है, वे औरोंके साथ, तथा व्यापारी अपने ग्राहकोंसे हमेशा सचही बोला करें।'‡ किसी अन्य स्थानमें वह लिखता है, कि यही छूट पादरियों और सिपाहियोंको मिलती है। लेस्ली स्टीफन नामका एक और अंग्रेज ग्रंथकार है। उसने नीतिशास्त्रका विवेचन आधिभौतिक दृष्टिसे किया है। वहभी अपने ग्रंथमें ऐसेही उदाहरण देकर अंतमें लिखता है, 'किसी कार्यके परिणामकी ओर ध्यान देनेके बादही उसकी नीतिमत्ता निश्चित की जानी चाहिये। यदि मुझे यह विश्वास हो, कि झूठ बोलनेहीसे कल्याण होगा, तो मैं सत्य बोलनेके लिये कभी तैयार नहीं रहूँगा। मेरे इस विश्वासमें यह भाव हो सकता है, कि इस समय झूठ बोलनाही मेरा कर्तव्य है।'§ ग्रीन साहबने नीति- शास्त्र का विचार अध्यात्मदृष्टिसे किया है। आप उक्त प्रसंगोंका उल्लेख करके स्पष्ट

  • Sidgwick's Methods of Ethics, Book III Chap. XI § 6. p. 355 (7th Ed.) Also, see pp. 315-317 (same Ed.). † Mill's Utilitarianism, Chap. II pp. 33-34 (15th Ed. Longmans, 1907). ‡ Sidgwick's Methods of Ethics, Book IV. Chap. III, § p. 454 (7th Ed.); and Book II Chap. V. § 3. p. 169. § Leslie Stephen's Science of Ethics (Chap. IV § 29. p. 369 (2nd Ed.) "And the certainty might be of such a kind as to make me think it a duty to lie."

रीतिसे कहते हैं, कि ऐसे समय नीतिशास्त्र मनुष्यके संदेहकी निवृत्ति कर नहीं सकता । अंतमें आपने यह सिद्धान्त लिखा है, " नीतिशास्त्र यह नहीं कहता, कि किसी साधारण नियमके अनुसार - सिर्फ यह समझकर कि वह है - हमेशा चलनेमें कुछ विशेष महत्त्व है; किंतु उसका कथन सिर्फ यही है, कि 'सामान्यतः' उस नियमके अनुसार चलना हमारे लिये श्रेयस्कर है । इसका कारण यह है, कि ऐसे समय हम लोग केवल नीतिके लिये अपनी लोभमूलक नीच मनोवृत्तियोंको त्यागनेकी शिक्षा पाया करते हैं ।"* नीतिशास्त्रपर ग्रंथ लिखनेवाले बेन, वेवेल आदि अन्य अंग्रेज पंडितोंकाभी ऐसाही मत है। ‡ यदि उक्त अंग्रेज ग्रंथकारोंके मतोंकी तुलना हमारे धर्मशास्त्रकारोंके बनाये हुए नियमोंके साथ की जाय, तो यह बात सहजही ध्यानमें आ जाएगी, कि सत्यके विषयमें अधिक अभिमानी कौन है। इसमें संदेह नहीं, कि हमारे शास्त्रोंमें कहा है :- न नर्मयुक्तं वचनं हिनस्ति न स्त्रीषु राजन्न विवाहकाले । प्राणात्यये सर्वधनापहारे पंचानृतान्याहुरपातकानि ॥ अर्थात् " हँसीमें, स्त्रियोंके साथ, विवाहके समय, जब जानपर आ बने तब, और संपत्तिकी रक्षाके लिये झूठ बोलना पाप नहीं है" ( मभा. आ. ८२. १६ और महा. शां. १०९ तथा मनु. ८. ११०) । परंतु इसका मतलब यह नहीं है, कि स्त्रियोंके साथ हमेशा झूठही बोलना चाहिये । जिस भावसे सिजविक साहबने ' छोटे बच्चे, पागल और बीमार 'के विषयमें अपवाद किया है, वही भाव महाभारतके उक्त कथनकाभी है। अंग्रेज ग्रंथकार पारलौकिक तथा आध्यात्मिक दृष्टिकी ओर कुछ ध्यान नहीं देते । उन लोगोंने तो खुल्लमखुल्ला यहां तक प्रतिपादन किया है कि व्यापारियोंका अपने लाभके लिये झूठ बोलना अनुचित नहीं है । किंतु वह बात हमारे शास्त्रकारोंको संमत नहीं है । इन लोगोंने कुछ ऐसेही प्रसंगोंपर असत्य बोलनेकी अनुमति दी है, जबकि केवल सत्य शब्दोच्चारण (अर्थात् केवल वाचिक सत्य) और सर्वभूतहित ( अर्थात् वास्तविक सत्य ) में विरोध हो जाता है, और व्यवहारकी दृष्टिसे झूठ बोलना अपरिहार्य हो जाता है । इनकी राय है, कि सत्य आदि नीतिधर्म नित्य – अर्थात् सब समय एक समान अबाधित - हैं। अतएव यह अपरिहार्य झूठ बोलनाभी थोड़ा-सा पापही हैं; और उसके लिये प्रायश्चित्तभी कहा गया है । संभव है, कि आजकलके आधिभौतिक पंडित इन प्रायश्चित्तोंको निरर्थक होवा कहेंगे; परंतु जिन्होंने ये प्रायश्चित्त कहे हैं और जिन लोगोंके


  • Greens's Prolegomena to Ethics, § 315. p. 379, ( 5th Cheaper edition ). ‡ Bain's Mental and Moral Science, p. 445 ( Ed. 1875); and Whewell's Elements of Morality. Book II. Chaps. XIII and XIV. ( 4th Ed., 1864 ).