श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात ज्ञानसे और श्रद्धासे - उसमेंभी विशेषतः भक्तिके सुलभ राजमार्गसे जितनी हो सके उतनी समबुद्धि करके लोकसंग्रहके निमित्त स्वधर्मानुसार अपने अपने कर्म निष्कामबुद्धिसे मरणपर्यंत करते रहनाही प्रत्येक मनुष्यका परम कर्तव्य है; उसीमें उसका सांसारिक और पारलौकिक परम कल्याण है; तथा उसे मोक्षकी प्राप्तिके लिये कर्म छोड़ बैठनेकी अथवा और कोईभी दूसरा अनुष्ठान करनेकी आवश्यकता नहीं है - समस्त गीताशास्त्रका यही फलितार्थ है, जो गीतारहस्यमें प्रकरणशः विस्तारपूर्वक प्रतिपादित हो चुका है। इसी प्रकार चौदहवें प्रकरणमें यहभी दिखला चुके हैं, कि उल्लिखित उद्देश्यसे गीताके अठारह अध्यायोंका मेल कैसे अच्छा और सरल मिल जाता है; एवं इस कर्मयोग-प्रधान गीता-धर्ममें अन्यान्य मोक्ष-साधनोंके कौन-कौन-से भाग किस प्रकार आये हैं। इतना कह चुकनेपर, वस्तुतः इससे अधिक काम नहीं रह जाता, कि गीताके श्लोकोंका हमारे मतानुसार क्रमशः हिंदी भाषामें सरल अर्थ बतला दिया जावे। किंतु गीतारहस्यके सामान्य विवेचनमें यह बतलाते न बनता था, कि गीताके प्रत्येक अध्यायके विषय-विभाग कैसे किये गये हैं ? अथवा टीकाकारोंने अपने संप्रदायकी सिद्धिके लिये गीताके कुछ विशेष श्लोकोंके पदोंकी किस प्रकार खींचातानी की है, अतः इन दोनों बातोंका विचार करके और जहाँका तहाँ पूर्वापर संदर्भ दिखला देनेके लियेभी अनुवादके साथ साथ आलोचनाके ढंगपर कुछ टिप्पणियोंके देनेकी आवश्यकता हुई। फिरभी जिन विषयोंका गीतारहस्यमें विस्तृत वर्णन हो चुका है, उनका केवल दिग्दर्शन करा दिया है; और गीतारहस्यके जिस प्रकरणमें उस विषयका विचार किया गया है, उसका सिर्फ हवाला दे दिया है। ये टिप्पणियाँ मूल ग्रंथसे अलग पहचान ली जा सकें, इसके लिये उन्हें ऐसे [ ] चौकोन कोष्ठकोंके भीतर रखा गया है और उनके पीछे टूटी हुई खड़ी रेखाएँभी लगा दी गयी हैं। श्लोकोंका अनुवाद, जहाँतक बना पड़ा है, शब्दशः किया गया है; और कितनेही स्थलोंपर तो मूलकेही शब्द रख दिये गये हैं; एवं 'अर्थात्, याने 'से जोड़कर उनका अर्थ खोल दिया है; और छोटी-मोटी टिप्पणियोंका काम अनुवादसेही निकाल लिया गया है। इतना करनेपरभी संस्कृतकी और हिंदीकी भाषाप्रणाली भिन्न भिन्न है, इस कारण, मूल संस्कृत श्लोकका पूर्ण अर्थ व्यक्त करनेके लिये हिंदीमें कुछ अधिक शब्दोंका प्रयोग अवश्य करना पड़ता है; और अनेक स्थलोंपर मूलके शब्दको अनुवादमें प्रमाणार्थ लेना पड़ता है। इन शब्दोंपर ध्यान जमनेके लिये ऐसे ( ) गोलाकार कोष्ठकमें ये शब्द रखे गये हैं। संस्कृत ग्रंथोंमें श्लोकका आँकड़ा श्लोकके अंतमें रहता है; परंतु अनुवादमें हमने उसे आरंभमें रखा है। अतः किसी श्लोकका अनुवाद देखना हो,