भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 645

६०० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तो अनुवाद उस अंकके आगेका वाक्य पढ़ना चाहिये। अनुवादकी रचना प्रायः ऐसी की गई है, कि टिप्पणी छोड़कर निरा अनुवादही पढ़ने जायें, तो अर्थमें कहींभी कोई व्यतिक्रम न पड़े। इसी प्रकार जहाँ मूलमें एकही वाक्य एकसे अधिक श्लोकोंमें पूरा हुआ है, वहाँ उतनेही श्लोकोंके अनुवादमें वह अर्थ पूर्ण किया गया है। अतएव कुछ श्लोकोंका अनुवाद मिलाकरही पढ़ना चाहिये। ऐसे श्लोक जहाँ जहाँ हैं, वहाँ वहाँ श्लोकके अनुवादमें पूर्णविराम चिन्ह ( । ) नहीं लगाया गया है। फिरभी यह स्मरण रहे, कि अनुवाद अंतमें अनुवादही है। हमने अपने अनुवादमें गीताके सरल, खुले और प्रधान अर्थको ले आनेका प्रयत्न किया है सही; परंतु संस्कृत शब्दोंमें और विशेषतः भगवानकी प्रेमयुक्त, रसीली, व्यापक और प्रतिक्षणमें नई रुचि देनेवाली वाणीमें, लक्षणासे अनेक व्यंग्यार्थ उत्पन्न करनेकी जो सामर्थ्य है, उसे ज़राभी न घटा-बढ़ाकर दूसरे शब्दोंमें ज्यों-का-त्यों अनुवादमें छलका देना असंभव है; अर्थात् संस्कृत जाननेवाला पुरुष अनेक अवसरोंपर लक्षणासे गीताके श्लोकोंका जैसे उपयोग करेगा, वैसे गीताका निरा अनुवाद पढ़नेवाले पुरुष नहीं कर सकेंगे। अधिक क्या कहें? संभव है, कि वे गोताभी खा जायें। अतएव सब लोगोंसे हमारी आग्रहपूर्वक विनती है, कि मूल गीता-ग्रंथका अध्ययन संस्कृतमेंही अवश्य कीजिये; और अनुवादके साथही साथ मूल श्लोक रखनेका प्रयोजनभी यही है। गीताके प्रत्येक अध्यायके विषयका सुविधासे ज्ञान होनेके लिये इन सब विषयोंकी — अध्यायोंके क्रमसे प्रत्येक श्लोककी — अनुक्रमणिकाभी पहले अलग दे दी है। यह अनुक्रमणिका वेदान्त-सूत्रोंकी अधिकरण-मालाके ढंगकी है। प्रत्येक श्लोक पृथक् पृथक् न पढ़कर, अनुक्रमणिकाके इस सिलसिलेसे गीताके श्लोक एकत्र पढ़नेपर गीताके तात्पर्यके संबंधमें जो भ्रम फैला है, वह कई अंशोंमें दूर हो सकता है। क्योंकि, सांप्रदायिक टीकाकारोंने गीताके श्लोकोंकी खींचातानी कर अपने संप्रदायकी सिद्धिके लिये कुछ श्लोकोंके जो निराले अर्थ कर डाले हैं, वे प्रायः इस पूर्वापर संदर्भकी ओर दुर्लक्ष करकेही किये गये हैं। उदाहरणार्थ, गीता ३. १९; ६.३; १८. २ देखिये। इस दृष्टिसे देखें तो यह कहनेमें कोई हानि नहीं, कि गीताका वह अनुवाद और गीतारहस्य, दोनों परस्पर एक दूसरेकी पूर्ति करते हैं; और जिसे हमारा वक्तव्य पूर्णतया समझ लेना हो, उसे इन दोनों भागोंका अवलोकन करना चाहिये। भगवद्गीता ग्रंथको कंठस्थ कर लेनेकी रीति प्रचलित है, इसलिये उसमें महत्त्वके पाठभेद कहींभी नहीं पाये जाते हैं। फिरभी यह बतलाना आवश्यक है, कि वर्तमानकालमें गीतापर उपलब्ध होनेवाले भाष्योंमें जो सबमे प्राचीन भाष्य है, उसी शांकरभाष्यके मूल पाठोंको हमने प्रमाण माना है।