श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताके अध्यायोंकी श्लोकशः विषयानुक्रमणिका [ टिप्पणी :- इस अनुक्रमणिकामें गीताके अध्यायोंके, विषयोंके, श्लोकोंके क्रमसे जो विभाग किये गये गये हैं, वे मूल संस्कृत श्लोकोंके पहले §§ इस चिन्हसे दिखलाये गये हैं; और अनुवादमें ऐसे श्लोकोंसे अलग परिच्छेद शुरू किया गया है । ] पहला अध्याय – अर्जुनविषादयोग १ संजयसे धृतराष्ट्रका प्रश्न । २-११ दुर्योधनका द्रोणाचार्यसे दोनों दलोंकी सेनाओंका वर्णन करना । १२-१९ युद्धके आरंभमें परस्पर सलामीके लिये शंख- ध्वनि । २०-२७ अर्जुनका रथ आगे ले जाकर सैन्यनिरीक्षण । २८-३७ दोनों सेनाओमें अपनेही बांधव हैं, उनको मारनेसे कुलक्षय होगा, यह सोचकर अर्जुनको विषाद हुआ । ३८-४४ कुलक्षय प्रभृति पातकोंका परिणाम । ४५-४७ युद्ध न करनेका अर्जुनका निश्चय और धनुर्बाणत्याग । दूसरा अध्याय – सांख्ययोग १-३ श्रीकृष्णका उत्तेजन । ४-१० अर्जुनका उत्तर, कर्तव्यमूढता और धर्म- निर्णयार्थ श्रीकृष्णके शरणापन्न होना । ११-१३ आत्माका अशोच्यत्व । १४, १५ देह और सुखदुःखकी अनित्यता । १६-२५ सदसद्विवेक और आत्माके नित्यादि स्वरूपकथनसे उसके अशोच्यत्वका समर्थन । २६, २७ आत्माके अनित्यत्व पक्षको उत्तर । २८ सांख्यशास्त्रानुसार व्यक्त भूतोंका अनित्यत्व और अशोच्यत्व । २९, ३० लोगोंको आत्मा दुर्ज्ञेय है सही; परंतु तू सत्य ज्ञानको प्राप्तकर, शोक करना छोड़ दे । ३१-३८ क्षात्रधर्मके अनुसार युद्ध करनेकी आवश्यकता । ३९ सांख्य- मार्गानुसार विषय-प्रतिपादनकी समाप्ति और कर्मयोगके प्रतिपादनका आरंभ । ४० कर्मयोगका स्वल्प आचरणभी क्षेमकारक है । ४१ व्यवसायात्मिका बुद्धिकी स्थिरता । ४२-४४ कर्मकांडके अनुयायी मीमांसकोंकी अस्थिर बुद्धिका वर्णन । ४५, ४६ स्थिर और योगस्थ बुद्धिसे कर्म करनेके विषयमें उपदेश । ४७ कर्मयोगकी चतुःसूत्री । ४८-५० कर्मयोगका लक्षण और कर्मकी अपेक्षा कर्ताकी बुद्धिकी श्रेष्ठता । ५१-५३ कर्मयोगसे मोक्षप्राप्ति, ५४-७० अर्जुनके पूछनेपर, कर्मयोगी स्थितप्रज्ञके लक्षण; और उसीमें प्रसंगानुसार विषयासक्तिसे काम आदिकी उत्पत्तिका क्रम । ७१, ७२ ब्राह्मी स्थिति ।