श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 647, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ें६०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
तीसरा अध्याय – कर्मयोग
१, २ अर्जुनका यह प्रश्न, कि कर्मोंको छोड़ देना चाहिये या करते रहना चाहिये; सच क्या है ? ३-८ यद्यपि सांख्य (कर्म-संन्यास) और कर्मयोग, दो निष्ठाएँ हैं, तोभी कर्म किसीके नहीं छूटते, इसलिये कर्मयोगकी श्रेष्ठता सिद्ध करके अर्जुनको उसीके आचरण करनेका निश्चित उपदेश। ९-१६ मीमांसकोंके यज्ञार्थ कर्मकोभी आसक्ति छोड़कर करनेका उपदेश, यज्ञचक्रका अनादित्व और जगत्के धारणार्थ उसकी आवश्यकता । १७-१९ ज्ञानी पुरुषमें स्वार्थ नहीं होता, इसीलिये प्राप्त कर्मोंको वह निःस्वार्थ अर्थात् निष्काम-बुद्धिसे किया करे; क्योंकि कर्म किसीकेभी नहीं छूटते। २०-२४ जनक आदिका उदाहरण; लोकसंग्रहका महत्त्व और स्वयं भगवान्का दृष्टान्त । २५-२९ ज्ञानी और अज्ञानीके कर्मोंमें भेद, एवं यह आवश्यकता कि ज्ञानी मनुष्य निष्काम कर्म करके अज्ञानीको सदाचरणका आदर्श दिखलावे । ३० ज्ञानी पुरुषके समान परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे युद्ध करनेका अर्जुनको उपदेश । ३१, ३२ भगवानके इस उपदेशके अनुसार श्रद्धापूर्वक बर्ताव करने अथवा न करनेका फल। ३३, ३४ प्रकृतिकी प्रबलता और इंद्रियनिग्रह। ३५ निष्काम कर्मभी स्वधर्मकाही करे; उसमें यदि मृत्यु हो जाय, तो कोई परवाह नहीं । ३६-४१ कामही मनुष्यको उसकी इच्छाके विरुद्ध पाप करनेके लिये उकसाता है; इंद्रियसंयमसे उसका नाश । ४२, ४३ इंद्रियोंकी श्रेष्ठताका क्रम और आत्मज्ञानपूर्वक उनका नियमन ।
चौथा अध्याय – ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
१-३ कर्मयोगकी संप्रदाय-परंपरा -। ४-८ जन्मरहित परमेश्वर मायासे दिव्य जन्म अर्थात् अवतार कब और किस लिये लेता है - इसका वर्णन । ९, १०, इस दिव्य जन्मका और कर्मका तत्त्व जान लेनेसे पुनर्जन्म छूटकर भगवत्प्राप्ति । ११, १२ अन्य रीतिसे भजे तो वैसा फल; उदाहरणार्थ, इस लोकके फल पानेके लिये देवताओंकी उपासना। १३-१५ भगवानके चातुर्वर्ण्य आदि निर्लेप कर्म, उनके तत्त्वको जान लेनेसे कर्मबंधका नाश और वैसे कर्म करनेके लिये उपदेश । १६-२३ कर्म, अकर्म और विकर्मका भेद; अकर्मही निःसंग कर्म है। वही सच्चा कर्म है; और उसीसे कर्मबंधका नाश होता है । २४-३३ अनेक प्रकारके लाक्षणिक यज्ञोंका वर्णन; और ब्रह्म-बुद्धिसे किये हुए यज्ञकी अर्थात् ज्ञानयज्ञकी श्रेष्ठता । ३४-३७ ज्ञातासे ज्ञानोपदेश, ज्ञानसे आत्मौपम्य-दृष्टि और पापपुण्यका नाश । ३८-४० ज्ञान प्राप्तिके उपाय - बुद्धि (- योग) और श्रद्धा । इसके अभावमें नाश । ४१, ४२ (कर्म-) योग और ज्ञानका पृथक् उपयोग बतलाकर दोनोंके आश्रयमे युद्ध करनेके लिये उपदेश ।