भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 648

विषयानुक्रमणिका ६०३ पाँचवाँ अध्याय - संन्यासयोग १, २ यह स्पष्ट प्रश्न, कि संन्यास श्रेष्ठ है या कर्मयोग ? इसपर भगवानका यह निश्चित उत्तर कि मोक्षप्रद तो दोनों हैं, पर उनमेंसे कर्मयोगही श्रेष्ठ है। ३-६ संकल्पोंको छोड़ देनेसे कर्मयोगी नित्य-संन्यासीही होता है; और बिना कर्मके संन्यासभी सिद्ध नहीं होता। इसलिये तत्त्वतः दोनों एकही हैं। ७-१३ मन सदैव संन्यस्त रहता है, और कर्म केवल इंद्रियाँ किया करती हैं, इसलिये कर्मयोगी सदा अलिप्त, शांत और मुक्त रहता है। १४, १५ सच्चा कर्तृत्व और भोक्तृत्व प्रकृतिका है, परंतु अज्ञानसे आत्माका अथवा परमेश्वरका समझा जाता है। १६, १७ इस अज्ञानके नाशसे पुनर्जन्मसे छुटकारा। १८-२३ ब्रह्मज्ञानसे प्राप्त होनेवाले सम- दर्शित्वका, स्थिर बुद्धिका और सुखदुःखकी क्षमताका वर्णन। २४-२८ सर्वभूत- हितार्थ कर्म करते रहनेपर भी कर्मयोगी इसी लोकमें सदैव ब्रह्मभूत, समाधिस्थ और मुक्त है। २९ ( कर्तृत्व अपने ऊपर न लेकर ) परमेश्वरको यज्ञ-तपका भोक्ता और सब भूतोंका मित्र जान लेनेका फल। छठा अध्याय - ध्यानयोग १, २ फलाशा छोड़कर कर्तव्य करनेवालाही सच्चा संन्यासी और योगी है। संन्यासीका अर्थ निरग्नि और अक्रिय नहीं है। ३, ४ कर्मयोगीकी साधनावस्थामें और सिद्धावस्थामें शम एवं कर्मके कार्य-कारणका बदल जाना तथा योगारूढ़का लक्षण। ५, ६ योगको सिद्ध करनेके लिये आत्माकी स्वतंत्रता। ७-९ जितात्म योगयुक्तोंमेंभी सम-बुद्धिकी श्रेष्ठता। १०-१७ योगसाधनके लिये आवश्यक आसन और आहारविहारका वर्णन। १८-२३ योगीके और योगसमाधिके आत्यंतिक सुखका वर्णन। २४-२६ मनको धीरे धीरे समाधिस्थ, शांत और आत्मनिष्ठ कैसे करना चाहिये ? २७, २८ योगीही ब्रह्मभूत और अत्यंत सुखी है। २९-३२ प्राणि- मात्रमें योगीकी आत्मौपम्य-बुद्धि। ३३-३६ अभ्यास और वैराग्यसे चंचल मनका निग्रह। ३७-४५ अर्जुनके प्रश्न करनेपर इस विषयका वर्णन, कि योगभ्रष्टको अथवा जिज्ञासुकोभी जन्मजन्मांतरमें उत्तम फल मिलनेसे अंतमें पूर्ण सिद्धि कैसे मिलती है ? ४६, ४७ तपस्वी, ज्ञानी और निरे कर्मीकी अपेक्षा कर्मयोगी - और उनमेंभी भक्तिमान् कर्मयोगी - श्रेष्ठ है। अतएव अर्जुनको (कर्म-) योगी होनेके विषयमें उपदेश। सातवाँ अध्याय - ज्ञान-विज्ञानयोग १-३ कर्मयोगकी सिद्धिके लिये ज्ञान-विज्ञानके निरूपणका आरंभ। सिद्धिके लिये प्रयत्न करनेवालोंका कम मिलना। ४-७ क्षराक्षरविचार। भगवानकी