भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 649

६०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अष्टधा अपरा और जीवरूपी परा प्रकृति उससे आगे सारा विस्तार । ८-१२ विस्तारके सात्त्विक आदि सब भागोंमें गुंथे हुए परमेश्वरस्वरूपका दिग्दर्शन । १३ - १५ परमेश्वरकी यही गुणमयी और दुस्तर माया है; और उसीके शरणागत होनेपर मायासे उद्धार होता है । १६-१९ भक्त चतुर्विध हैं; उनमें ज्ञानी श्रेष्ठ है । अनेक जन्मोंसे ज्ञानकी पूर्णता और भगवत्प्राप्तिरूप नित्य फल । २०-२३ अनित्य काम्य-फलोंके निमित्त देवताओंकी उपासना; परंतु उसमेंभी उनकी श्रद्धाका फल भगवानही देते हैं । २४-२८ भगवानका सत्य-स्वरूप अव्यक्त है; परंतु मायाके कारण और द्वंद्वमोहके कारण वह दुर्ज्ञेय है । मायामोहके नाशसे स्वरूपका ज्ञान । २९, ३० ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, और अधिभूत, अधिदेव, अधियज्ञ सब एक परमेश्वरही है – यह जान लेनेसे अंततक ज्ञानसिद्धि हो जाती है । आठवाँ अध्याय – अक्षर-ब्रह्मयोग १-४ अर्जुनके प्रश्न करनेपर ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदेव, अधि- यज्ञ और अधिदेहकी व्याख्याएँ । उन सबमें एकही ईश्वर है । ५-८ अंतकालमें भगवत्स्मरणसे मुक्ति । परंतु जो मनमें नित्य रहता है, वही अंतकालमेंभी रहता है; अतएव सदैव भगवानका स्मरण करने और युद्ध करनेके लिये उपदेश । ९-१३ अंतकालमें परमेश्वरका अर्थात् ॐकारका समाधिपूर्वक ध्यान और उसका फल १४-१६ भगवानका नित्य चिंतन करनेसे पुनर्जन्म-नाश । ब्रह्मलोकादि गतियाँ नित्य नहीं हैं । १७-१९ ब्रह्माका दिन-रात, दिनके आरंभमें अव्यक्तसे सृष्टिकी उत्पत्ति और रात्रिके आरंभमें उसीमें लय । २०-२२ इस अव्यक्तसेभी परेका अव्यक्त और अक्षर पुरुष । भक्तिसे उनका ज्ञान और उसकी प्राप्तिसे पुनर्जन्मका नाश । २३-२६ देवयान और पितृयाणमार्ग; पहला पुनर्जन्मनाशक है और दूसरा इसके विपरीत है । २७, २८ इन मार्गोंके तत्त्वको जाननेवाले योगीको अत्युत्तम फल मिलता है; अतः तदनुसार सदा व्यवहार करनेका उपदेश । नौवाँ अध्याय – राजविद्या-राजगुह्ययोग १-३ ज्ञान-विज्ञानयुक्त भक्ति-मार्ग मोक्षप्रद होनेपरभी प्रत्यक्ष और सुलभ है । अतएव राजमार्ग है । ४-६ परमेश्वरकी अपार योगसामर्थ्य । प्राणिमात्रमें रहकरभी उनमें नहीं है; और प्राणिमात्रभी उसमें रहकर नहीं है । ७-१० माया- त्मक प्रकृतिके द्वारा सृष्टिकी उत्पत्ति और संहार, भूतोंकी उत्पत्ति और लय । इतना करनेपरभी वह निष्काम है, अतएव अलिप्त है । ११, १२ इसे विना पहचाने, मोहमें फँसकर, मनुष्यदेहधारी परमेश्वरकी अवज्ञा करनेवाले मूर्ख और आसुरी है । १३- १५ ज्ञानयज्ञके द्वारा अनेक प्रकारसे उपासना करनेवाले दैवी हैं । १६-१९ ईश्वर सर्वत्र है, वही जगत्का माँ-बाप है, स्वामी है, पोषक है और भले-बुरेका कर्ता है ।