भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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विषयानुक्रमणिका ६०५ २०-२२ श्रौत यज्ञायाग आदिका दीर्घ उद्योग यद्यपि स्वर्गप्रद है, तोभी वह फल अनित्य है। योगक्षेमके लिये यदि आवश्यक समझें तो वह भक्तिसेभी साध्य है। २३-२५ अन्यान्य देवताओंकी भक्ति पर्यायसे परमेश्वरकीही होती है, परंतु जैसी भावना होगी और जैसा देवता होगा, फलभी वैसाही मिलेगा। २६ भक्ति हो, तो परमेश्वर फूलकी पंखुरीसेभी संतुष्ट हो जाता है। २७, २८ सब कर्मोंको ईश्वरार्पण करनेका उपदेश। उसीके द्वारा कर्मबंधसे छुटकारा और मोक्ष। २९-३३ परमेश्वर सबको एक-सा है। दुराचारी हो या पापयोनि, स्त्री हो, या वैश्य या शूद्र निःसीम भक्त होनेपर सबको एकही गति मिलती है। ३४ यही मार्ग अंगीकार करनेके लिये अर्जुनको उपदेश। दसवाँ अध्याय – विभूतियोग १-३ यह जान लेनेसे पापका नाश होता है, कि अजन्मा परमेश्वर देवताओं और ऋषियोंसेभी पूर्वका है। ४-६ ईश्वरी विभूति और योग। ईश्वरसेही बुद्धि आदि भावोंकी, सप्तर्षियोंकी और मनुकी, एवं परंपरासे सबकी, उत्पत्ति। ७-११ इसे जाननेवाले भगवद्भक्तोंको ज्ञान-प्राप्ति; परंतु उन्हेंभी बुद्धि-सिद्धि भगवानही देते हैं। १२-१८ अपनी विभूति और योग बतलानेके लिये भगवानसे अर्जुनकी प्रार्थना। १९-४० भगवानकी अनंत विभूतियोंमेंसे मुख्य मुख्य विभूतियोंका वर्णन। ४१, ४२ जो कुछ विभूतिमत्, श्रीमत् और ऊर्जित है, वह सब परमेश्वरी तेज है; परंतु अंशसे है। ग्यारहवाँ अध्याय – विश्वरूप-दर्शनयोग १-४ पूर्व अध्यायमें बतलाये हुए अपने ईश्वरी रूपको दिखलानेके लिये भगवानसे प्रार्थना। ५-८ इस आश्चर्यकारक और दिव्य रूपको देखनेके लिये अर्जुनको दिव्य-दृष्टि-ज्ञान। ९-१४ विश्वरूपका संजयकृत वर्णन। १५-३१ विस्मय और भयसे नम्र होकर अर्जुनकृत विश्वरूप-स्तुति और यह प्रार्थना, कि प्रसन्न होकर बतलाइये, कि “आप कौन हैं?” ३२-३४ पहले यह बतलाकर, कि “मै काल हूँ” फिर अर्जुनको उत्साहजनक ऐसा उपदेश, कि पूर्वसेही इस कालके-द्वारा ग्रसे- हुए वीरोंको तुम निमित्त बनकर मारो। ३५-४६ अर्जुनकृत स्तुति, क्षमा, प्रार्थना और पहलेका सौम्य रूप दिखलानेके लिये विनय। ४७-५१ बिना अनन्य-भक्तिके विश्वरूपका दर्शन मिलना दुर्लभ है। फिर पूर्व स्वरूप-धारण। ५२-५४ बिना भक्तिके विश्वरूपका दर्शन देवताओंकोभी नहीं हो सकता। ५५ अतः भक्तिसे निस्संग और निर्वैर होकर परमेश्वरार्पण-बुद्धिके द्वारा कर्म करनेके विषयमें अर्जुनको सर्वार्थ-सारभूत अंतिम उपदेश। बारहवाँ अध्याय – भक्तियोग १ पिछले अध्यायके अंतिम सारभूत उपदेशपर अर्जुनका प्रश्न – व्यक्तो- पासना श्रेष्ठ है या अव्यक्तोपासना ? २-८ दोनोंमें गति एकही है; परंतु अव्यक्तो-