भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 651, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 651

६०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

पासना क्लेशकारक है; और व्यक्तोपासना सुलभ एवं शीघ्र-फलप्रद है। अतः निष्काम कर्मपूर्वक व्यक्तोपासना करनेके विषयमें उपदेश। ९-१२ भगवानमें चित्तको स्थिर करनेके अभ्यास, ज्ञान-ध्यान इत्यादि उपाय और उनमें कर्मफलत्यागकी श्रेष्ठता। १३-१९ भक्तिमान् पुरुषकी स्थितिका वर्णन और भगवत्प्रियता। २० इस धर्मका आचरण करनेवाले श्रद्धालु भक्त भगवान्को अत्यंत प्रिय हैं। तेरहवाँ अध्याय - क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभागयोग १, २ क्षेत्र और क्षेत्रज्ञकी व्याख्याएँ। उनका ज्ञानही परमेश्वरका ज्ञान है। ३, ४ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार उपनिषदोंका और ब्रह्मसूत्रोंका है। ५, ६ क्षेत्र-स्वरूप- लक्षण। ७-११ ज्ञानका स्वरूप-लक्षण। तद्विरुद्ध अज्ञान। १२-१७ ज्ञेयके स्वरूपका लक्षण। १८ इस सबको जान लेनेका फल। १९-२१ प्रकृति-पुरुष-विवेक। करने- धरनेवाली प्रकृति है, पुरुष अकर्ता किंतु भोक्ता, द्रष्टा इत्यादि है। २२, २३ पुरुषही देहमें परमात्मा है। इस प्रकृति-पुरुष-ज्ञानसे पुनर्जन्म नष्ट होता है। २४, २५ आत्मज्ञानके मार्ग - ध्यान, सांख्ययोग, कर्मयोग और श्रद्धापूर्वक श्रवणसे भक्ति। २६-२८ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके संयोगसे स्थावर-जंगम सृष्टि; उसमें जो अविनाशी है, वही परमेश्वर है। अपने प्रयत्नसे उसकी प्राप्ति। २९, ३० करने-धरनेवाली प्रकृति है; और आत्मा अकर्ता है; सब प्राणिमात्र एकमें हैं; और एकसे सब प्राणिमात्र होते हैं। यह जान लेनेसे ब्रह्म-प्राप्ति। ३१-३३ आत्मा अनादि और निर्गुण है, अतएव यद्यपि वह क्षेत्रका प्रकाशक है, तथापि निर्लेप है। ३४ क्षेत्र- क्षेत्रज्ञके भेदको जान लेनेसे परम सिद्धि। चौदहवाँ अध्याय - गुणत्रयविभागयोग १, २ ज्ञान-विज्ञानान्तर्गत प्राणिवैचित्र्यका गुणभेदसे विचार। वहभी मोक्षप्रद है। ३, ४ प्राणिमात्रका पिता परमेश्वर है; और उसके अधीनस्थ प्रकृति माता है। ५-९ प्राणिमात्रपर सत्त्व, रज और तमके होनेवाले परिणाम। १०-१३ एक एक गुण अलग नहीं रह सकता। किन्ही दोको दबाकर तीसरेकी वृद्धि; और प्रत्येककी वृद्धिके लक्षण। १४-१८ गुण-प्रवृद्धिके अनुसार कर्मके फल और मरनेपर प्राप्त होनेवाली गति। १९, २० त्रिगुणातीत हो जानेसे मोक्ष-प्राप्ति। २१-२५ अर्जुनके प्रश्न करनेपर त्रिगुणातीतके लक्षणका और आचारका वर्णन। एकान्त-भक्तिसे त्रिगुणातीत अवस्थाकी सिद्धि, और फिर सब मोक्षके, धर्मके, एवं सुखके अंतिम स्थान परमेश्वरकी प्राप्ति। पंद्रहवाँ अध्याय - पुरुषोत्तमयोग १, २ अश्वत्थरूपी ब्रह्मवृक्षके वेदोक्त और सांख्योक्त वर्णनका मेल। ३-६ असंगसे इसको काट डालनाही उससे परेके अव्यक्त पदकी प्राप्तिका मार्ग है। अव्यय