श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयानुक्रमणिका ६०७ पदवर्णन । ७-११ जीव और लिंगशरीरका स्वरूप एवं संबंध । ज्ञानीके लिये गोचर है । १२-१५ परमेश्वरकी सर्वव्यापकता । १६-१८ क्षराक्षरलक्षण । उससे परे पुरुषोत्तम । १९,२० इस गुह्य पुरुषोत्तम-ज्ञानसे सर्वज्ञता और कृतकृत्यता । सोलहवाँ अध्याय - दैवासुरसम्पद्विभागयोग १-३ दैवी संपत्तिके छब्बीस गुण । ४ आसुरी संपत्तिके लक्षण । ५ दैवी संपत्ति मोक्षप्रद और आसुरी बंधनकारक है । ६-२० आसुरी लोगोंका विस्तृत वर्णन, उनको जन्म जन्ममें अधोगति मिलती है । २१, २२ नरकके त्रिविध द्वार - काम, क्रोध और लोभ । इनसे बचनेमें कल्याण है । २३, २४ शास्त्रानुसार कार्या- कार्यका निर्णय और आचरण करनेके विषयमें उपदेश । सत्रहवाँ अध्याय - श्रद्धात्रयविभागयोग १-४ अर्जुनके पूछनेपर प्रकृति-स्वभावानुरूप सात्त्विक आदि विविध श्रद्धाका वर्णन । जैसी श्रद्धा वैसा पुरुष । ५, ६ इनसे भिन्न आसुर । ७-१० सात्त्विक, राजस और तामस आहार । ११-१३ विविध यज्ञ । १४-१६ तपके तीन भेद - शारीर, वाचिक और मानस । १७-१९ इनमें सात्त्विक आदि भेदोंसे प्रत्येक विविध है । २०-२२ सात्त्विक आदि विविध दान । २३ ॐ तत्सत् ब्रह्मनिर्देश । २४-२७ इनमें 'ॐ' से आरंभसूचक, 'तत्' से निष्काम और 'सत्' से प्रशस्त कर्मका समावेश होता है । २८ शेष, अर्थात् असत् इहलोक और परलोकमें निष्फल है । अठारहवाँ अध्याय - मोक्ष-संन्यासयोग १, २ अर्जुनके पूछनेपर संन्यास और त्यागकी कर्मयोग-मार्गान्तर्गत व्याख्याएँ । ३-६ कर्मका त्याज्य-अत्याज्यविषयक निर्णय ; यज्ञयाग आदि कर्मोंकोभी अन्यान्य कर्मोंके समान निःसंग-बुद्धिसे करनाही चाहिये । ७-९ कर्मत्यागके तीन भेद- सात्त्विक, राजस और तामस, फलाशा छोड़कर कर्तव्य-कर्म करनाही सात्त्विक त्याग है । १०, ११ कर्मफलत्यागी ही सात्त्विक त्यागी है । क्योंकि कर्म तो किसीसेभी छूटही नहीं सकता । १२ कर्मका त्रिविध फल सात्त्विक त्यागी पुरुषको बंधक नहीं होता । १३-१५ कोईभी कर्म होनेके पाँच कारण हैं, केवल मनुष्यही कारण नहीं है । १६, १७ अतएव यह अहंकार-बुद्धि कि मैं करता हूँ छूट जानेसे कर्म करनेपरभी अलिप्त रहता है । १८, १९ कर्मचोदना और कर्मसंग्रहका सांख्यो- क्त लक्षण और उनके तीन भेद । २०-२२ सात्त्विक आदि गुण-भेदसे ज्ञानके तीन भेद । ' अविभक्तं विभक्तेषु ' यह सात्त्विक ज्ञान है । २३-२५ कर्मकी विविधता । फलाशारहित कर्म सात्त्विक है । २६-२८ कर्ताके तीन भेद । निस्संग कर्ता सात्त्विक है । २९-३२ बुद्धिके तीन भेद । ३३-३५ धृतिके तीन भेद । ३६-३९ सुखके