श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तीन भेद। आत्मबुद्धिप्रसादज सात्त्विक सुख है। ४० गुणभेदसे सारे जगत्के तीन भेद। ४१-४४ गुणभेदसे चातुर्वर्ण्यकी उपपत्ति; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके स्वभावजन्य कर्म। ४५, ४६ चातुर्वर्ण्य-विहित स्वकर्माचरणसेही अंतिम सिद्धि। ४७-४९ परधर्मका आचरण भयावह है, स्वकर्म सदोष होनेपरभी अत्याज्य है, सारे कर्म स्वधर्मके अनुसार, निस्संग-बुद्धिके द्वारा करनेसेही नैष्कर्म्य-सिद्धि मिलती है। ५०-५६ इसका निरूपण कि सारे कर्म करते रहनेभी यह सिद्धि किस प्रकार मिलती है? ५७, ५८ इसी मार्गको स्वीकार करनेके विषयमें अर्जुनको उपदेश। ५९-६३ प्रकृति-धर्मके सामने अहंकारकी एक नहीं चलती। ईश्वरकीही शरणमें जाना चाहिये। अर्जुनको यह उपदेश, कि इस गुह्यको समझकर फिर जो दिलमें आवे, सो कर। ६४-६६ भगवानका यह अंतिम आश्वासन, कि सब धर्म छोड़कर 'मेरी शरणमें आ,' सब पापोंसे 'मैं तुझे मुक्तकर दूंगा।' ६७-६९ कर्मयोग-मार्गकी परंपराको आगे प्रचलित रखनेका श्रेय। ७०, ७१ उसका फलमाहात्म्य। ७२, ७३ कर्तव्यमोह नष्ट होकर अर्जुनकी युद्ध करनेके लिये तैयारी। ७४-७८ धृतराष्ट्रको यह कथा सुना चुकनेपर संजयकृत उपसंहार।