भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 654, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 654

श्रीमद्भगवद्गीता प्रथमोऽध्यायः । धृतराष्ट्र उवाच । धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ १ ॥ पहला अध्याय । [ भारतीय युद्धके आरंभमें श्रीकृष्णने अर्जुनको जिस गीताका उपदेश किया है, उसका आगे लोगोंमें प्रचार कैसे हुआ; इसकी परंपरा वर्तमान महाभारत ग्रंथमेंही इस प्रकार दी गई है :- युद्धमें आरंभ होनेसे प्रथम व्यासजीने धृतराष्ट्रसे जाकर कहा, कि " यदि तुम्हारी इच्छा युद्ध देखनेकी हो, तो मैं तुम्हें दृष्टि देता हूँ । " इसपर धृतराष्ट्रने कहा, कि ' मैं अपने कुलका क्षय नहीं देखना चाहता । " तब एकही स्थानपर बैठे बैठे, सब बातोंका प्रत्यक्ष ज्ञान हो जानेके लिये संजय नामक सूतको व्यासजीने दिव्य-दृष्टि दे दी । इस संजयके द्वारा युद्धके अविकल वृत्तान्त धृतराष्ट्रको अवगत करा देनेका प्रबंध करके व्यासजी चले गये ( मभा. भीष्म. २ ) । जब आगे युद्धमें भीष्म आहत हुए और उक्त प्रबंधके अनुसार, वह समा- चार सुनानेके लिये पहले संजय धृतराष्ट्रके पास गया, तब भीष्मके बारेमें शोक करते हुए धृतराष्ट्रने संजयको आज्ञा दी, कि युद्धकी सारी बातोंका वर्णन करो । तदनुसार संजयने पहले दोनों दलोंकी सेनाओंका वर्णन किया; और फिर धृतराष्ट्रके पूछनेपर गीता बतलाना आरंभ किया है । आगे चलकर यह सब वार्ता व्यासजीने अपने शिष्योंको, बादमें उन शिष्योंमेंसे वैशंपायनने जनमेजयको और अंतमें सौतीने शौनकको सुनाई । महाभारतकी सभी छपी हुई प्रतियोंमें भीष्मपर्वके २५ वें अध्यायसे ४२ वें अध्यायतक यही गीता कही गई है । इस परंपराके अनुसार :- ] धृतराष्ट्रने पूछा - ( १ ) हे संजय ! कुरुक्षेत्रकी पुण्यभूमिमें एकत्रित मेरे और पांडुके युद्धेच्छुक पुत्रोंने क्या किया ? | [ हस्तिनापुरके चहूँ ओरका मैदान कुरुक्षेत्र है । वर्तमान दिल्ली शहर | इसी मैदानपर बसा हुआ है । महाभारतमें यह कथा है, कि कौरव-पांडवोंका गी. र. ३९