श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 672, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ६२७ § § नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ १६ ॥ | गीतार. प्र. ९, पृष्ठ २२६ और २४५-२४७) । अब अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिसे | इसी अर्थको व्यक्तकर दिखलाते हैं :- ] ( १६ ) जो नहीं ( असत् ) है, वह होही नहीं सकता; और जो है ( सत् ), उसका अभाव नहीं होता; तत्त्वज्ञानी पुरुषोंने इस प्रकार ‘है और नहीं है’ (इन सत् और असत् ) इन दोनोंका अंत देख लिया है – अर्थात् अंत देखकर उनके स्वरूपका निर्णय किया है । | [ इस श्लोकके ‘अन्त’ शब्दका अर्थ और ‘राद्धान्त’, ‘सिद्धान्त’ एवं | ‘कृतान्त’ शब्दोंके ( गीता १८. १३ ) ‘अन्त’ शब्दका अर्थ एकही है। शाश्वत-, | कोशमें ( शा. ३८१ ) ‘अन्त’ शब्दके ये अर्थ हैं – “स्वरूपप्रान्तयोरन्तमन्तिकेऽपि | प्रयुज्यते । ” इस श्लोकमें सत्का अर्थ ब्रह्म और असत्का अर्थ नामरूपात्मक | दृश्य जगत् है ( गीतार. प्र. ९, पृ. २२६-२२७; और २४५-२४७ ) | स्मरण रहे, कि “ जो है, उसका अभाव नहीं होता ” इत्यादि तत्त्व देखनेमे | यद्यपि सत्कार्यवादके समान दीख पड़े, तोभी उसका अर्थ कुछ निराला है। जहां | एक वस्तुमे दूसरी वस्तु निर्मित है – उदा., बीजसे वृक्ष – वहाँ सत्कार्यवादका तत्त्व | उपयुक्त होता है। प्रस्तुत श्लोकमें इस प्रकारका प्रश्न नहीं है; वक्तव्य इतनाही | है, कि सत् अर्थात् जो है, उसका अस्तित्व ( भाव ) और असत् अर्थात् जो नहीं | है, उसका अभाव, ये दोनों नित्य याने सदैव कायम रहनेवाले हैं। इस प्रकार | क्रमसे दोनोंके भाव-अभावको नित्य मान लें, तो आगे फिर आप-ही-आप कहना | पड़ता है, कि जो ‘सत्’ है, उसका नाश होकर उसीका ‘असत्’ नहीं हो जाता । | परंतु यह अनुमान, और सत्कार्यवादमें पहलेही ग्रहणकी हुई एक वस्तुसे दूसरी | वस्तुकी कार्यकारणरूप उत्पत्ति, ये दोनों एक-सी नहीं हैं ( गीतार. प्र. ७, पृ. | १५६ ) । माध्वभाष्यमें इस श्लोकके “ नासतो विद्यते भावः ” इस पहले चरणके | ‘ विद्यते भावः ’ का ‘ विद्यते + अभावः ’ ऐसा परिच्छेद है और उसका यह अर्थ | किया है, कि असत् याने अव्यक्त-प्रकृतिका अभाव, अर्थात् नाश, नही होता । | और जब कि दूसरे चरणमें यह कहा है, कि सत्काभी नाश नहीं होता, तब | अपने द्वैती संप्रदायके अनुसार मध्वाचार्यने इस श्लोकका ऐसा अर्थ किया है, | कि सत् और असत् दोनों नित्य हैं ! परंतु यह अर्थ सरल नहीं है, इसमे | खीचातानी है । क्योंकि स्वाभाविक रीतिसे दीख पड़ता है, कि परस्पर-विरोधी | असत् और सत् शब्दोंके समानही अभाव और भाव ये दो विरोधी शब्दही इस | स्थलपर प्रयुक्त हैं; एवं दूसरे चरणमें अर्थात् “ नाभावो विद्यते सतः ” यहाँपर