श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥ बाह्य सृष्टिके पदार्थोंके ( इंद्रियोंमे ) जो संयोग हैं, उनकी उत्पत्ति होती है और नाश होता है। ( अतएव ) वे अनित्य अर्थात् विनाशवान् हैं। हे भारत ! ( शोक न करके ) उनको तू सहन कर । ( १५ ) क्योंकि, हे नरश्रेष्ठ ! सुख और दुःखको समान माननेवाले जिस ज्ञानी पुरुषको इनकी व्यथा नहीं होती, वही अमृतत्व अर्थात् अमृत-ब्रह्मकी स्थितिको प्राप्तकर लेनेमें समर्थ होता है। [ जिस पुरुषको ब्रह्मात्मैक्यज्ञान होनेपरभी नामरूपात्मक जगत् मिथ्या नहीं जान पड़ा है, वह बाह्य पदार्थों और इंद्रियोंके संयोगसे होनेवाले शीत-उष्ण आदि या सुखदुःख आदि विकारोंको सत्य मानकर आत्मामें उनका अध्यारोप किया करता है; और इस कारणसे उसको दुःखकी पीड़ा होती है। परंतु जिसने यह जान लिया है, कि ये सभी विकार प्रकृतिके हैं, आत्मा अकर्ता और अलिप्त है; उसे सुख और दुःख एकहीसे हैं। अब भगवान् अर्जुनसे यह कहते हैं, कि इस सम-बुद्धिसे तू उनको सहन कर। और यही अर्थ अगले अध्यायमें अधिक विस्तारसे वर्णित है। शांकरभाष्यमें 'मात्रा' शब्दका अर्थ इस प्रकार किया है :- " मीयते एभिरिति मात्राः " अर्थात् जिनसे बाहरी पदार्थ मापे जाते हैं या ज्ञात होते हैं, उन्हें इंद्रियाँ कहते हैं। पर मात्राका अर्थ इंद्रियाँ न करके, कुछ लोग ऐसाभी अर्थ करते हैं, कि इंद्रियोंसे मापे जानेवाले शब्दरूप आदि बाह्य पदार्थोंको मात्रा कहते हैं; और उनका इंद्रियोंसे तो स्पर्श अर्थात् संयोग होता है, उसे मात्रास्पर्श कहते हैं। इसी अर्थको हमने स्वीकृत किया है। क्योंकि, इस श्लोकके विचार गीतामें आगे जहाँपर आये हैं (गीता ५. २१-२३), वहाँ 'बाह्यस्पर्श' शब्द है। और 'मात्रास्पर्श' शब्दका, हमारे किये हुए अर्थके समान, अर्थ करनेसे इन दोनों शब्दोंका अर्थ एकही-सा हो जाता है। यद्यपि इस प्रकार ये दोनों शब्द मिलते-जुलते हैं, तोभी मात्रास्पर्श शब्द पुराना दीख पड़ता है। क्योंकि मनु- स्मृतिमें (६. ५७) इसी अर्थमें मात्रासंग शब्द आया है; और बृहदारण्यकोप- निषदमें वर्णन है, कि मरनेपर ज्ञानी पुरुषके आत्माका मात्राओंसे असंसर्ग (मात्राऽसंसर्गः) होता है अर्थात् वह मुक्त हो जाता है; और उसे संज्ञा नहीं रहती (बृ. माध्यं. ४. ५. १४; वे. सू. शां. भा. १. ४. २२)। शीतोष्ण और सुखदुःख पद उपलक्षणात्मक हैं; उनमेंही राग-द्वेष, सत्-असत् और मृत्यु-अमरत्व इत्यादि परस्पर-विरोधी द्वंद्वोंका समावेश होता है। ये सब माया-सृष्टिके द्वंद्व हैं। सच्चा परब्रह्म, नासदीय सूक्तमें जो वर्णन है, उसके अनुसार, इन द्वंद्वोंसे परे है। इसलिये प्रकट है, कि अनित्य माया-सृष्टिके इन द्वंद्वोंको शांतिपूर्वक सहकर, इन द्वंद्वोंसे बुद्धिको छुड़ाये बिना ब्रह्म-प्राप्ति नहीं होती (गीता २. ४५; ७. २८;