भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 670, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 670

दूसरा अध्याय ६२५ देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ १३ ॥ § § मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥ | होनेवाले हैं, तो परमेश्वर और आत्मा, ये दोनों पृथक्, स्वतंत्र और नित्य हैं। | किंतु यह अनुमान ठीक नहीं है; सांप्रदायिक आग्रहका है; क्योंकि इस स्थान- | पर प्रतिपाद्य इतनाही है, कि सभी नित्य हैं; उनका पारस्परिक संबंध यहाँ | बतलाया नहीं है और बतलानेकी कोई आवश्यकताभी न थी। जहाँ वैसा प्रसंग | आया है, वहाँ गीतामेंही ऐसा अद्वैत सिद्धान्त (गीता ८. ४; १३. ३१) स्पष्ट | रीतिसे बतला दिया है, कि समस्त प्राणियोंके शरीरमे देहधारी आत्मा मैं अर्थात् | एकही परमेश्वर हूँ।] (१३) जिस प्रकार देह धारण करनेवालेको इस देहमें बालपन, जवानी, और बुढ़ापा (प्राप्त होता है), उसी प्रकार (आगे) दूसरी देह प्राप्त हुआ करती है। (इसलिये) इस विषयमें ज्ञानी पुरुषोंको मोह नहीं होता । | [अर्जुनके मनमें यही तो बड़ा डर या मोह था, कि "अमुकको मैं कैसे | मारूँ।" इसलिये उसे दूर करनेके निमित्त, तत्त्वकी दृष्टिसे भगवान् पहले | इसीका विचार बतलाते हैं, कि मरना क्या है और मारना क्या है (श्लोक | ११-३०)। मनुष्य केवल देहरूपी निरी वस्तुही नहीं है; वरन् देह और | आत्माका समुच्चय है। इनमेंसे 'मैं' इस अहंकाररूपमें व्यक्त होनेवाला आत्मा नित्य | और अमर है; वह आज है, कल था और कलभी रहेगाही। अतएव मरना या | मारना, ये शब्दही उसके लिये उपयुक्त नहीं किये जा सकते और उसका शोकभी | न करना चाहिये। अब बाकी रह गई देह; सो यह प्रकटही है, कि वह अनित्य | और नाशवान् है; आज नहीं तो कल, कल नहीं तो सौ वर्षोंमें सही; उसका तो | नाश होनेहीको है - "अद्य वाऽब्दशतान्ते वा मृत्युर्वै प्राणिनां ध्रुवः" (भाग. | १०. १ ३८); और एक देह छूटभी गई, तोभी कर्मोंके अनुसार आगे दूसरी | देह मिलेविना नहीं रहती, अतएव उसकाभी शोक करना उचित नहीं। सारांश, | देह या आत्मा, दोनों दृष्टियोंसे विचार करें, तो सिद्ध होता है, कि मरे हुएका | शोक करना पागलपन है, यह पागलपन भलेही हो; पर यह अवश्य बतलाना | चाहिये, कि वर्तमान देहका नाश होते समय जो क्लेश होते हैं, उनके लिये | शोक क्यों न करें? अतएव अब भगवान् इन कायिक सुखदुःखोंका स्वरूप बतला | कर दिखलाते हैं, कि उनकाभी शोक करना उचित नहीं है।] (१४) हे कुंतिपुत्र ! शीतोष्ण या सुखदुःख देनेवाले, ये मात्राओं अर्थात् गी. र. ४०