श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र श्रीभगवानुवाच । § § अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ ११ ॥ न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः । न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ १२ ॥ । ५.२) - यह सिद्धान्त आगे बतलाया जावेगा। इन दोनों निष्ठाओंमेंसे । अर्जुनके मनकी चाह अब संन्यासनिष्ठाकी ओरही अधिक बढ़ी हुई थी। अतएव । उसी मार्गके तत्त्वज्ञानसे अर्जुनकी भूल पहले उसे सुझा दी गई है; और । आगे ३९ वें श्लोकसे भगवानने कर्मयोगका प्रतिपादन करना आरंभ कर दिया । है। सांख्य-मार्गवाले पुरुष ज्ञानके पश्चात् कर्म भलेही न करतें हों; पर उनका । ब्रह्मज्ञान और कर्मयोगका ब्रह्मज्ञान कुछ भिन्न भिन्न नहीं है। तब सांख्य-निष्ठाके । अनुसार देखने परभी आत्मा यदि अविनाशी और नित्य है, तो फिर किंचित् । उपहासपूर्वक अर्जुनसे भगवानका प्रथम कथन है, कि तेरी यह बकबक व्यर्थ । है, कि “मैं अमुकको कैसे मारूँ?” ] श्रीभगवानने कहा :- ( ११ ) जिनका शोक न करना चाहिये, तू उन्हींका शोक कर रहा है और ज्ञानकीभी हाँकता है ! किसीके प्राण ( चाहे ) जायें या ( चाहे ) रहें; ज्ञानी पुरुष उनका शोक नहीं करते । । [ इस श्लोकमें यह कहा गया है, कि ज्ञानी लोग स्वाभाविक प्राणोंके । जानेका या रहनेकाभी शोक नहीं करते । इनमेंसे जानेका शोक करना तो । स्वाभाविक है उसे न करनेका उपदेश करना उचित है। पर टीकाकारोंने यह । शंका करके, कि प्राण रहनेका शोक कैसा और क्यों करना चाहिये; उसके । विषयमें बहुत-कुछ चर्चा की है; और कई एकोंने कहा है, कि मूर्ख एवं अज्ञानी । लोगोंके प्राण रहना शोककाही कारण है। किंतु इतनी बालकी खाल निकालते । रहनेकी अपेक्षा ‘शोक करना’ शब्दकाही ‘भला या बुरा लगना’ अथवा । ‘परवाह करना’ ऐसा व्यापक अर्थ करनेसे कोईभी अडचन रह नहीं जाती । । यहाँ इतनाही वक्तव्य है, कि ज्ञानी पुरुषको दोनों बातें एकहीसी होती हैं। ] ( १२ ) देखो न; ऐसा तो हैही नहीं, कि मैं ( पहले ) कभीही था नहीं । ऐसाभी नहीं, कि तू और ये राजा लोग ( पहले ) न थे; और ऐसाभी नहीं हो सकता, कि हम सब लोग अब आगे न होंगे । । [ इस श्लोकपर रामानुज-भाष्यमें जो टीका है, उसमें लिखा है :- इस । श्लोकसे ऐसा सिद्ध होता है, कि ‘मैं’ अर्थात् परमेश्वर और ‘तू एवं राजा लोग’ । अर्थात् अन्यान्य आत्मा, ये दोनों यदि पहले ( अतीतकालमें ) थे; और आगे