भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 668

दूसरा अध्याय ६२३ न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् । अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ ८ ॥ संजय उवाच । एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परंतप । न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥ ९ ॥ तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥ १० ॥ कर्तव्यका मनमें मोह हो गया है, इसलिये मैं तुमसे पूछता हूँ, कि जो निश्चयसे श्रेयस्कर हो, वह मुझे बतलाओ । मैं तुम्हारा शिष्य हूँ । मुझ शरणागतको समझाइये । (८) क्योंकि पृथ्‍वीका निष्कंटक समृद्ध राज्य या देवताओं (स्वर्ग) काभी स्वामित्व मिल जाय, तथापि मुझे ऐसा कुछभी (साधन) नज़र नहीं आता, कि जो इंद्रियोंको सुखा डालनेवाले मेरे इस शोकको दूर करे । संजयने कहा :- (९) इस प्रकार शत्रुसंतापी गुडाकेश अर्थात् अर्जुनने हृषीकेशसे (श्रीकृष्ण) कहा; और फिर श्रीगोविन्दसे 'मैं न लडूंगा' कहकर (वह) चुप हो गया ! (१०) (फिर) हे भारत (धृतराष्ट्र) ! दोनों सेनाओंके बीच खिन्न होकर बैठे हुए अर्जुनसे श्रीकृष्ण कुछ हँसते हुए-से बोले । । [ एक ओर तो क्षत्रियका स्वधर्म और दूसरी ओर गुरुहत्या एव कुलक्षय- | के पातकोंका भय - इस खींचातानीमें 'मरें या मारें', के झमेलेमें पड़कर, लड़ाई | छोड़कर भिक्षा माँगनेके लिये तैयार हो जानेवाले अर्जुनको अब भगवान् इस | जगतके उसके सच्चे कर्तव्यका उपदेश करते हैं । अर्जुनकी शंका थी, कि लड़ाई | जैसे घोर कर्मसे आत्माका कल्याण न होगा । इसीसे, जिन उदार पुरुषोंने परब्रह्मका | ज्ञान प्राप्तकर अपने आत्माका पूर्ण कल्याण कर लिया है, वे इस दुनियामें कैसा | बर्ताव करते हैं; यहींसे गीताके उपदेशका आरंभ हुआ है । भगवान् कहते हैं, | कि संसारकी चाल-ढालके परखनेसे दीख पड़ता है, कि आत्मज्ञानी पुरुषोंके | जीवन बितानेके अनादिकालसे दो मार्ग चले आ रहे हैं (गीता ३. ३; गीता रहस्य | प्र. ११) । आत्मज्ञान संपादन करनेपर शुकसरीखे पुरुष संसार छोड़कर आनंदसे | भिक्षा माँगते फिरते हैं, तो जनकसरीखे दूसरे आत्मज्ञानी ज्ञानके पश्चात्‌भी | स्वधर्मानुसार लोगोंके कल्याणार्थ संसारके सैकड़ों व्यवहारोंमें अपना समय | लगाया करते हैं । पहले मार्गको सांख्य या सांख्यनिष्ठा कहते हैं; और दूसरेको | कर्मयोग या योग कहते हैं (श्लोक ३९) । यद्यपि ये दोनों निष्ठाएँ प्रचलित हैं, | तथापि गीताका यह सिद्धान्त है, कि इनमेंसे कर्मयोगही अधिक श्रेष्ठ है (गीता