श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गुरुनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके । हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहैव भुंजीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥ ५ ॥ न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः । यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥ कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः । यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ ७॥ साथ, हे शत्रुनाशने ! युद्धमें बाणोंसे कैसे लडूंगा ? ( ५ ) महात्मा गुरु लोगोंको न मारकर इस लोकमें भीख माँग करके पेट पालनाभी श्रेयस्कर है; परंतु अर्थलोलुप ( हों, तोभी ) गुरु लोगोंको मारकर इसी जगतमें मुझे उनके रक्तसे सने हुए भोग भोगने पड़ेंगे । | [ 'गुरु लोगोंको' इस बहुवचनान्त शब्दसे 'बड़े-बूढ़ों 'काही अर्थ लेना | चाहिये । क्योंकि, विद्या सिखानेवाला गुरु एक द्रोणाचार्यको छोड़, सेनामें | और कोई दूसरा न था । युद्ध छिड़नेके पहले जब ऐसे गुरु लोगों – अर्थात् भीष्म, | द्रोण और शल्य – की पादवंदना कर उनका आशीर्वाद लेनेके लिये युधिष्ठिर | रणांगणमें अपना कवच उतारकर नम्रतासे उनके समीप गये, तब शिष्ट- | संप्रदायका उचित पालन करनेवाले युधिष्ठिरका अभिनंदन कर सबने इसका | कारण बतलाया, कि दुर्योधनकी ओरसे हम क्यों लड़ेंगे ? अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् । इति सत्यं महाराज ! बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ॥ | “ सच तो यह है, कि मनुष्य अर्थका गुलाम है, अर्थ किसीका गुलाम नहीं; | इसलिये हे युधिष्ठिर महाराज ! कौरवोंने मुझे अर्थसे जकड़ रखा है ” ( महा. | भी. अ. ४३, श्लो. ३५. ५०, ७६ ) । ऊपर जो यह 'अर्थलोलुप' शब्द है, वह | इसी श्लोकके अर्थका द्योतक है ।] ( ६ ) हम जय प्राप्त करें या हमें ( वे लोग ) जीत ले – इन दोनों बातोंमेंसे हमें श्रेयस्कर कौन है, यहभी समझ नहीं पड़ता। जिन्हें मारकर फिर जीवित रहनेकी इच्छा नहीं, वेही ये कौरव ( युद्धके लिये ) सामने डटे हैं । | [ 'गरीयः' शब्दसे प्रकट होता है, कि अर्जुनके मनमें “ अधिकांश लोगोंके | अधिक सुख ”के समान कर्म और अकर्मकी लघुता-गुरुता ठहरानेकी कसौटी थी, | पर वह इस बातका निर्णय नहीं कर सकता था, कि उन कसौटीके अनुसार | किसकी जीत होनेमें भलाई है ? गीतारहस्य प्र. ४, पृ. ८४-८७ देखो ।] ( ७ ) दीनतासे मेरी स्वाभाविक वृत्ति नष्ट हो गई, है ( मुझे अपने ) धर्म अर्थात्