श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ६२१ द्वितीयोऽध्यायः । संजय उवाच । तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच । कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥ २ ॥ क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते । क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप ॥ ३ ॥ अर्जुन उवाच । § § कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन । इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥ ४ ॥ दूसरा अध्याय । संजयने कहा :- ( १ ) इस प्रकार करुणासे व्याप्त, आँखोंमें आँसू भरे हुए और विषाद पानेवाले अर्जुनसे मधुसूदन ( श्रीकृष्ण ) यह बोले - श्रीभगवानने कहा :- ( २ ) हे अर्जुन ! संकटके इस प्रसंगपर तेरे ( मनमें ) यह मोह ( कश्मलं ) कहाँसे आ गया, जिसका कि आर्योंने अर्थात् सत्पुरुषोंने ( कभी ) आचरण नहीं किया, जो अधोगतिको पहुँचानेवाला है, और जो दुष्कीर्तिकारक है ? ( ३ ) हे पार्थ ! ऐसा नामर्द मत हो ! यह तुझे शोभा नहीं देता । अरे, शत्रुओंको ताप देनेवाले ! अंतःकरणकी इस क्षुद्र दुर्बलताको छोड़ ( युद्धके लिये ) खड़ा हो । | [ इस स्थानपर हमने 'परंतप' शब्दका अर्थ कर तो दिया है; परंतु | बहुतेरे टीकाकारोंका यह मत हमारी रायमे युक्तिसंगत नही है, कि अनेक | स्थानोंपर आनेवाले विशेषणरूपी संबोधन या कृष्ण-अर्जुनके नाम गीतामें हेतु- | गर्भित अथवा अभिप्रायसहित प्रयुक्त हुए हैं। हमारा मत है, कि पद्यरचनाके | लिये अनुकूल नामोंका प्रयोग किया गया है; और उनमें कोई विशेष अर्थ उद्दिष्ट | नहीं है। अतएव कई बार हमने श्लोकमें प्रयुक्त नामोंकाही हूबहू अनुवाद न | कर 'अर्जुन' या 'श्रीकृष्ण' ऐसा साधारण अनुवाद कर दिया है।] अर्जुनने कहा :- ( ४ ) हे मधुसूदन ! मैं (परम-)पूज्य भीष्म और द्रोणके