श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र संजय उवाच। एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्। विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ ४७ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे अर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ (४७) इस प्रकार रणभूमिमें भाषण कर, शोकमे व्यथितचित्त अर्जुन (हाथका) धनुष्य-बाण त्याग कर रथमें अपने स्थानपर योंही बैठ गया । । सारथी, दोनों अगले भागमें परस्पर एक दूसरेकी आजूबाजूमें बैठते थे । रथ । की पहचानके लिये प्रत्येक रथपर एक प्रकारकी विशेष ध्वजा लगी रहती थी । । यह बात प्रसिद्ध है, कि अर्जुनकी ध्वजापर प्रत्यक्ष हनुमानही बैठे थे । ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, अर्जुनविषादयोग नामक पहला अध्याय समाप्त हुआ । । [ गीतारहस्यके पहले ( पृष्ठ ३ ), तीसरे ( पृष्ठ ६० ), और ग्यारहवें । ( पृष्ठ ३५३ ) प्रकरणमें इस संकल्पका ऐसा अर्थ किया गया है, कि गीतामें । केवल ब्रह्मविद्याही नहीं है, किंतु उसमें ब्रह्मविद्याके आधारपर कर्मयोगका । प्रतिपादन किया गया है । यद्यपि यह संकल्प महाभारतमें नहीं है, परंतु यह । गीतापर संन्यासमार्गी टीका होनेके पहलेका होगा ; क्योंकि, संन्यास-मार्गका । कोईभी पंडित ऐसा संकल्प न लिखेगा । ओर इसमे यह प्रकट होता है, कि गीतामें । संन्यास-मार्गका प्रतिपादन नहीं है, किंतु कर्मयोगका शास्त्र समझकर, संवाद- । रूपसे विवेचन है । संवादात्मक और शास्त्रीय पद्धतिका भेद रहस्यके चौदहवें । प्रकरणके आरंभमें बतलाया गया है । ]