श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय ६१९ अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥ ४१ ॥ संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ ४२ ॥ दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः । उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ ४३ ॥ उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन । नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ ४४ ॥ § § अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् । यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ ४५ ॥ यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ ४६ ॥ छूटनेसे समूचे कुलपर अधर्मकी धाक जमती है; (४१) हे कृष्ण ! अधर्मके फैलनेसे कुलस्त्रियाँ बिगड़ती हैं; हे वार्ष्णेय ! स्त्रियोंके बिगड़ जानेपर वर्णसंकर होता है। (४२) और वर्णसंकर होनेसे वह कुलघातकको और (समग्र) कुलको निश्चयही नरकमें ले जाता है; एवं पिंडदान और तर्पणादि क्रियाओके लुप्त हो जानेसे उनके पितरभी पतन पाते हैं। (४३) कुलघातकोंके इन वर्णसंकरकारक दोषोसे पुरातन जातिधर्म और कुलधर्म उत्पन्न होते हैं; (४४) और हे जनार्दन ! हम ऐसा सुनते आ रहे हैं, कि जिन मनुष्योंके कुलधर्म विच्छिन्न हो जाते हैं, उनको निश्चयही नरकवास होता है । (४५) देखो तो सही ! हम राज्य-सुख-लोभसे स्वजनोंको मारनेके लिये उद्यत हुए हैं, (सचमुचही) यह हमने एक बड़ा पाप करनेकी योजना की है ! (४६) इसकी अपेक्षा मेरा अधिक कल्याण तो इसमें होगा, कि मैं निःशस्त्र होकर प्रतिकार करना छोड़ दूं; (और ये) शस्त्रधारी कौरव मुझे रणमें मार डालें। संजयने कहा :- । [रथमें खड़े होकर युद्ध करनेकी प्रणाली थी, अतः “रथमें अपने स्थान- । पर बैठ गया” इन शब्दोंसे यही अर्थ अधिक व्यक्त होता है, कि खिन्न हो जानेके । कारण युद्ध करनेकी उसे इच्छा न थी। महाभारतमें कुछ स्थलोंपर इन रथोंका । जो वर्णन है, उससे दीख पड़ता है, कि भारतकालीन रथ प्रायः दो पहियोंके । होते थे; बड़े-बड़े रथोंमें चार-चार घोड़े जोते जाते थे; और रथी एवं