श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः । कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ ३८ ॥ कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् । कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ ३९ ॥ कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः । धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥ ४० ॥ ( ३८ ) लोभसे इनकी बुद्धि नष्ट हो गई है, इन्हें कुलके क्षयसे होनेवाला दोष और मित्रद्रोहका पातक यद्यपि दिखाई नहीं देता, ( ३९ ) तथापि हे जनार्दन ! कुलक्षयका दोष हमें स्पष्ट दाख पड़ा रहा है, अतः इस पापसे पराङ्मुख होनेकी बात हमारे मनमें आये बिना कैसे रहेगी ? [ प्रथमसेही यह प्रत्यक्ष हो जानेपर, कि युद्धमें गुरुवध, सुहृद्वध और कुलक्षय होगा, लड़ाईसंबंधी अपने कर्तव्यके विषयमें अर्जुनको जो व्यामोह हुआ, उसका क्या बीज है ? गीतामें आगे जो प्रतिपादन है, उससे इसका क्या संबंध है ? और उस दृष्टिसे प्रथमाध्यायका कौन-सा महत्त्व है ? — इन सब प्रश्नोंका विचार गीतारहस्यके पहले और फिर चौदहवें प्रकरणमें हमने किया है, उसे देखो । इस स्थानपर ऐसी साधारण युक्तियोंका उल्लेख किया गया है, कि लोभसे बुद्धि नष्ट हो जानेके कारण दुष्टोंको अपनी दुष्टता जान न पड़ती हो, तो चतुर पुरुषोंको दुष्टोंके फंदेमें पड़कर दुष्ट न होना चाहिये – “ न पापे प्रतिपापः स्यात् ” उन्हें चुप रहना चाहिये । इन साधारण युक्तियोंका ऐसे प्रसंगपर कहाँतक उपयोग किया जा सकता है, अथवा करना चाहिये ? – यहभी ऊपरके समानही एक महत्त्वका प्रश्न है; और इसका गीताके अनुसार जो उत्तर है, उसका हमने गीतारहस्यके बारहवे प्रकरणमें ( पृ. ३९३-३९८ ) निरूपण किया है । गीताके अगले अध्यायोंमें जो विवेचन है, वह अर्जुनकी उन शंकाओंकी निवृत्ति करनेके लिये है, कि जो उसे पहले अध्यायमें हुई थीं; इस वातपर ध्यान दिये रहनेसे गीताका तात्पर्य समझनेमें किसी प्रकारका संदेह नहीं रह जाता । भारतीय युद्धमें एकही राष्ट्र और धर्मके लोगोंमें फूट हो गई थी; और वे परस्पर मरने- मारनेपर उतारू हो गये थे, इसी कारणसे उक्त शंकाएँ उत्पन्न हुई हैं । अर्वाचीन इतिहासमें जहाँ जहाँ ऐसे प्रसंग आये हैं, वहाँ वहाँ ऐसेही प्रश्न उपस्थित हुए हैं । अस्तु; कुलक्षयसे आगे जो जो अनर्थ होते हैं, उन्हें अर्जुन स्पष्ट कर कहता है । ] ( ४० ) कुलका क्षय होनेसे सनातन कुलधर्म नष्ट होते हैं, और (कुल)धर्मोंके