श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 662, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय ६१७ न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च । किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥ ३२ ॥ येषामर्थे कांक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च । त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ ३३ ॥ आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥ ३४ ॥ एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन । अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ ३५ ॥ निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन । पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानातातयिनः ॥ ३६ ॥ तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् । स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥ ३७ ॥ ऐसा ) नही दीख पड़ता । ( ३२ ) हे कृष्ण ! मुझे विजयको इच्छा नहीं, न राज्य चाहिये और न सुखभी । हे गोविंद ! राज्य, उपभोग या जीवित रहनेसेभी हमें उसका क्या उपयोग है ? ( ३३ ) जिनके लिये राज्यकी, उपभोगोंकी और सुखोंकी इच्छा करनी थी, वेही ये लोग जीव और संपत्तिकी आशा छोड़कर युद्धके लिये खड़े हैं । ( ३४ ) आचार्य, बड़े-बूढ़े, लड़के, दादा, मामा, ससुर, नाती, साले और संबंधी ( ३५ ) यद्यपि ये ( हमें ) मारनेके लिये खड़े हैं, तथापि हे मधुसूदन ! त्रैलोक्यके राज्यतकके लिये, मैं ( इन्हें ) भारनेकी इच्छा नहीं करता; फिर पृथ्वीकी बात है क्या चीज ? ( ३६ ) हे जनार्दन ! इन कौरवोंको मारकर हमारा कौन-सा प्रिय होगा ? यद्यपि ये आततायी हैं, तोभी इनको मारनेसे हमें पापही लगेगा । ( ३७ ) इसलिये हमें अपनेही बांधव कौरवोंको मारना उचित नहीं है। क्योंकि हे माधव ! स्वजनोंको मारकर हम सुखी क्योंकर होंगे ? | [ अग्निदो गरदश्चैव शस्त्रपाणिर्धनापहः । क्षेत्रदारापहरश्चैव षडेते आत- | तायिनः ।। ( वसिष्टस्मृ. ३. १६ ) अर्थात् घर जलानेके लिये आयाहुआ, विष | देनेवाला, हाथमें हथियार लेकर मारनेके लिये आया हुआ, धन लूटकर ले | जानेवाला और स्त्री या खेत हरणकर्ता - ये छः आततायी हैं। मनुनेभी कहा | है, कि इन दुष्टोंको बेधड़क जानसे मार डालें, इसमें कोई पातक नहीं है | ( मनु. ८. ३५०, ३५१ ) । ]