भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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६१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् । उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥ २५ ॥ तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् । आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥ २६ ॥ श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि । तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥ २७ ॥ कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् । अर्जुन उवाच । § § दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ २८ ॥ सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥ २९ ॥ गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते । न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ ३० ॥ निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव । न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ ३१ ॥ | रूढ हो गये हैं, उनकी निरुक्ति बतलानेमें इस प्रकारकी अडचनोंका आना या | मतभेद हो जाना बिलकुल सहज बात है । ] (२५) भीष्म, द्रोण तथा सब राजाओंके सामने (वे) बोले, कि “अर्जुन ! (यहाँ) एकत्रित हुए इन कौरवोंको देखो ।” (२६) तब अर्जुनको दिखाई दिया, कि वहाँ पर इकट्ठे हुए सब (अपनेही) बड़े-बूढ़े, आजा, आचार्य, मामा, भाई, बेटे, नाती, मित्र, (२७) ससुर और स्नेही दोनोंही सेनाओंमें हैं; (और इस प्रकार) यह देखकर, कि वे सभी एकत्रित हमारे बांधव हैं, कुंतीपुत्र अर्जुन (२८) परम करुणासे व्याप्त होता हुआ खिन्न होकर यह कहने लगा :- अर्जुनने कहा :- हे कृष्ण ! युद्ध करनेकी इच्छासे (यहाँ) जमा हुए इन स्वजनोंको देखकर (२९) मेरे गात्र शिथिल हो रहे हैं, मुँह सूख रहा है, शरीरमें कँपकँपी उठकर रोएँभी खड़े हो गये हैं; (३०) गांडीव (धनुष्य) हाथसे गिर पड़ता है; और शरीरमेंभी सर्वत्र दाह हो रहा है; खड़ा नहीं रहा जाता और मेरा मन चक्कर-सा खा गया है । (३१) इसी प्रकार हे केशव ! (मुझे सब) लक्षण विपरीत दिखते हैं; और स्वजनोंको युद्धमें मारकर श्रेय अर्थात् कल्याण (होगा

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