भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 660

पहला अध्याय ६१५ संजय उवाच । एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥ करनेकी इच्छासे यहाँ जो लड़नेवाले जमा हुए हैं, उन्हें मैं देख लूं । संजय बोला :- ( २४ ) हे धृतराष्ट्र ! गुडाकेश अर्थात् आलस्यको जीतनेवाले अर्जुनके इस प्रकार कहनेपर हृषीकेश अर्थात् इंद्रियोंके स्वामी श्रीकृष्णने ( अर्जुनके ) उत्तम रथको दोनों सेनाओंके मध्यभागमें लाकर खड़ा कर दिया; और :- [ हृषीकेश और गुडाकेश शब्दोंके जो अर्थ ऊपर दिये गये हैं, वे टीका- कारोंके मतानुसार हैं। नारदपंचरात्रमेंभी 'हृषीकेश' की यह निरुक्ति है, कि हृषीक = इंद्रियां और उनका ईश = स्वामी ( नारदपंच. ५. ८. १७ ) ; और अमरकोशपर क्षीरस्वामीकी जो टीका है, उसमें लिखा है, कि हृषीक ( अर्थात् इंद्रियां ) शब्द हृष् = आनंद देना, इस धातुमे बना है; इंद्रियां मनुष्यको आनंद देती हैं, इसलिये उन्हें हृषीक कहते हैं । तथापि, यह शंका होती है, कि हृषीकेश और गुडाकेशके जो अर्थ ऊपर दिये गये हैं, वे ठीक हैं या नहीं ? क्योंकि, हृषीक ( अर्थात् इंद्रियां ) और गुडाका ( अर्थात् निद्रा या आलस्य ) ये शब्द प्रचलित नहीं हैं; हृषीकेश और गुडाकेश इन दोनों शब्दोंकी व्युत्पत्ति दूसरी रीतिसेभी लग सकती है । हृषीक + ईश और गुडाका + ईशके बदले हृषी + केश और गुडा + केश ऐसाभी पदच्छेद किया जा सकता है; और फिर ये अर्थ हो सकते हैं, कि हृषी अर्थात् हर्षसे खड़े किये हुए या प्रशस्त जिसके केश (बाल) हैं, वह श्रीकृष्ण; और गुडा अर्थात् गूढ़ या घने जिसके केश हैं, वह अर्जुन । भारतके टीकाकार नीलकंठने गुडाकेश शब्दका यह अर्थ, गीता १०. २० पर अपनी टीकामें विकल्पसे सूचित किया है; और सूतके बापका जो रोमहर्षण नाम है, उससे हृषीकेश शब्दकी उल्लिखित दूसरी व्युत्पत्तिकोभी असंभवनीय नहीं कह सकते । महाभारतके शांतिपर्वान्तर्गत नारायणीयोपाख्यानमें विष्णुके मुख्य मुख्य नामोंकी निरुक्ति देते हुए यह अर्थ किया है, कि हृषी अर्थात् आनंद- दायक ; और केश अर्थात् किरण ; और कहा है, कि सूर्यचंद्ररूप अपनी विभूतियोंकी किरणोंसे समस्त जगत्को हर्षित करता है, इसलिये उसे हृषीकेश कहते हैं ( महा. शांति. ३४१. ४७; ३४२. ६४, ६५; उद्यो. ६९. ९ ) ; और पहलेके श्लोकोंमें कहा गया है, कि उसी प्रकार केशव शब्दभी केश अर्थात् किरण शब्दसे बना है ( शां. ३४१. ४७ ) इनमेंसे कोईभी अर्थ क्यों न लें; पर श्रीकृष्ण और अर्जुनके ये नाम रखे जानेके, सभी अंशोंमें, योग्य कारण बतलाये जा नहीं सकते, लेकिन यह दोष नैरुक्तिकोंका नहीं है । जो व्यक्तिवाचक या विशेष नाम अत्यंत