श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ १६ ॥ काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः । धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ १७ ॥ द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते । सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक् पृथक् ॥ १८ ॥ स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् । नभश्च पृथिवीं चैव तुमलो व्यनुनादयन् ॥ १९ ॥ § § अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः । प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥ २० ॥ हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते । अर्जुन उवाच । सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥ २१ ॥ यावदेतान्निर्रीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् । कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥ २२ ॥ योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः । धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३ ॥ ( १६ ) कुंतीपुत्र राजा युधिष्ठिरने अनंतविजय, नकुल और सहदेवने सुघोष, एवं मणिपुष्पक, ( १७ ) महाधनुर्धर काशिराज, महारथी शिखंडी, धृष्टद्युम्न, विराट, तथा अजेय सात्यकि, ( १८ ) द्रुपद और द्रौपदीके ( पांचों ) बेटे, तथा महाबाहु सौभद्र ( अभिमन्यु ), इन सबने, हे राजा ( धृतराष्ट्र ) ! चारों ओर अपने अपने अलग अलग शंख बजाये । ( १९ ) आकाश और पृथिवीको दहला देनेवाली उस तुमुल आवाजने कौरवोंका कलेजा फाड़ डाला । ( २० ) अनंतर कौरवोंको व्यवस्थामें खड़े देख, परस्पर एक दूसरेपर शस्त्रप्रहार होनेका समय आनेपर धनुष्य उठाकर, कपिध्वज पांडव अर्थात् अर्जुन, ( २१ ) हे राजा धृतराष्ट्र ! श्रीकृष्णसे ये शब्द बोला : अर्जुनने कहा :- हे अच्युत ! मेरा रथ दोनों सेनाओके बीच ले चलकर खड़ा करो, ( २२ ) उतनेमें युद्धकी इच्छा से तैयार हुए इन लोगोंको में अवलोकन करता हूँ; और मुझे इस रणसंग्राममें किनके साथ लड़ना है, एवं ( २३ ) युद्धमें दुर्बुद्धि दुर्योधनका कल्याण