श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 658, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय ६१३ § § तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः । सिंहनादं विनद्योच्चैः शंखं दध्मौ प्रतापवान् ॥ १२ ॥ ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः । सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ १३ ॥ ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ । माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः ॥ १४ ॥ पांचजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः । पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदरः ॥ १५ ॥ | [ सेनापति भीष्म स्वयं पराक्रमी और किसीसेभी हार जानेवाले न थे । | " सभी ओरसे सबको उनकी रक्षा करनी चाहिये", इस कथनका कारण दुर्योधनने | दूसरे स्थलपर ( मभा. भी. १५. १५-२०; ९९. ४०, ४१ ) । यह बतलाया है, | कि भीष्मका निश्चय था कि हम शिखंडीपर शस्त्र न चलावेंगे, इसलिये | शिखंडीकी ओरसे भीष्मका घात होनेकी संभावना थी, अतएव सबको सावधानी | रखनी चाहिये :- अरक्ष्यमाणं हि वृको हन्यात् सिंहं महाबलम् । मा सिंहं जंबुकेनेव घातयेथाः शिखंडिना ॥ | " महाबलवान् सिंहकी रक्षा न करें, तो भेड़िया उसे मार डालेगा; इसलिये | जंबुक-सदृश शिखंडीसे सिंहका घात न होने दो ।" शिखंडीको छोड़ और दूसरे | किसीकीभी खबर लेनेके लिये भीष्म अकेलेही समर्थ थे, अन्यकी किसी | सहायताकी उन्हें अपेक्षा न थी । ] ( १२ ) ( इतनेमें ) दुर्योधनको हर्षित हुए प्रतापशाली वृद्ध कौरव पितामह ( सेनापति भीष्म ) ने सिंहकी ऐसी बड़ी गर्जना कर ( लड़ाईकी सलामीके लिये ) अपना शंख फूंका । ( १३ ) इसके साथही साथ अनेक शंख, भेरी ( नौबतें ), पणव, आनक और गोमुख ( ये लड़ाईके बाजे ) एकदम बजने लगे; और इन बाजोंका नाद चारों ओर खूब गूंज उठा । ( १४ ) अनंतर सफ़ेद घोड़ोंसे जुते हुए बड़े रथमें बैठे हुए माधव ( श्रीकृष्ण ) और पांडवने ( अर्जुन ) ( यह सूचना करनेके लिये कि हमारे पक्षकीभी तैयारी है, प्रत्युत्तरके ढंगपर ) दिव्य शंख बजाये । ( १५ ) हृषीकेश अर्थात् श्रीकृष्णने पांचजन्य ( नामक शंख ), अर्जुनने देवदत्त, भयंकर कर्म करनेवाले वृकोदर अर्थात् भीमसेनने पौंड्र नामक बड़ा शंख फूंका;