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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 657

६१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः । भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥ कि “मेरी सेना बड़ी और गुणवान् है, इसलिये जीत मेरीही होगी” ( उ. ५४. ६०-७० ) । इसी प्रकार आगे चलकर भीष्मपर्वमें, जिस समय द्रोणाचार्यके पास दुर्योधन फिरसे सेनाका वर्णन कर रहा था, उस समयभी, गीताके उपर्युक्त श्लोकोंके समानही श्लोक उसने अपने मुंहसे ज्यों-के-त्यों कहे है ( भीष्म ५१. ४-६ ) । और तीसरी बात यह है, कि सब सैनिकोंको प्रोत्साहित करनेके लियेही हर्षपूर्वक यह वर्णन किया गया है । इन सब बातोंका विचार करनेसे इस स्थानपर ‘अपर्याप्त’ शब्दका ‘अमर्यादित, अपार या अगणित’ के सिवा और कोई अर्थही हो नहीं सकता । ‘पर्याप्त’ शब्दका धात्वर्थ ‘चहुँ ओर (परि-)वेष्टन करने- योग्य’ ( आप् = प्राप्तना ) है । परंतु ‘अमुक कामके लिये पर्याप्त’ या ‘अमुक मनुष्यके लिये पर्याप्त’ इस प्रकार पर्याप्त शब्दके पीछे चतुर्थी अर्थके दूसरे शब्द जोड़कर प्रयोग करनेसे ‘पर्याप्त’ शब्दका यह अर्थ हो जाता है – ‘उस कामके लिये या मनुष्यके लिये भरपूर अथवा समर्थ ।’ और यदि ‘पर्याप्त’के पीछे कोई दूसरा शब्द न रखा जावे, तो केवल ‘पर्याप्त’ शब्दका अर्थ होता है ‘भरपूर, परिमित या जिसकी गिनती की जा सकती है।’ प्रस्तुत श्लोकमें ‘पर्याप्त’ शब्दके पीछे दूसरा शब्द नहीं है, इसलिये यहाँपर उसका उपर्युक्त दूसरा अर्थ (परिमित या मर्यादित) विवक्षित है; और महाभारतके अतिरिक्त अन्यत्रभी ऐसे प्रयोग किये जानेके उदाहरण ब्रह्मानंदगिरिकृत टीकामें दिये गये है। कुछ लोगोंने यह उपपत्ति बतलाई है, कि दुर्योधन भयसे अपनी सेनाको ‘अपर्याप्त’ अर्थात् ‘अधूरा’ कहता है; परंतु यह ठीक नहीं है। क्योंकि, दुर्योधनके डर जानेका वर्णन कहींभी नहीं मिलता, किंतु इसके विपरीत यह वर्णन पाया जाता है, कि दुर्योधनकी बड़ी भारी सेनाको देखकर पांडवोंने वज्र नामक व्यूह रचा; और कौरवोंकी अपार सेनाको देख युधिष्ठिरको बहुत खेद हुआ था (महा. भीष्म. १९. ५; २१. १) । पांडवोंकी सेनाका सेनापति धृष्टद्युम्न था, परंतु “भीम रक्षा कर रहा है” कहनेका कारण यह है, कि पहले दिन पांडवोंने वज्र नामका जो व्यूह रचाथा, उसकी रक्षाके लिये इस व्यूहके अग्रभागमे भीमही नियुक्त किया गया था; अतएव सेनारक्षककी दृष्टिसे दुर्योधनको वही सामने दिखाई दे रहा था ( महा. भीष्म. १९. ४-११, ३३, ३४) ; और इसी अर्थमें इन दोनों सेनाओके विषयमें महाभारतके गीताके पहलेके अध्यायोंमें ‘भीमनेत्र’ और ‘भीष्मनेत्र’ कहा गया है (महा. भी. २०.१)।] ( ११ ) (तो अब) नियुक्तिके अनुसार सब अयनोंमें अर्थात् सेनाके भिन्न भिन्न प्रवेशद्वारोंमे रहकर तुम सबको मिल करके भीष्मकीही सभी ओरसे रक्षा करनी चाहिये ।

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