श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय ६११ अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम । नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥ भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः । अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ ८ ॥ अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः । नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९ ॥ अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् । पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥ एवं सुभद्राका पुत्र (अभिमन्यु) तथा द्रौपदीके (पांच) पुत्र-ये सभी महारथी हैं। | [ दस हजार धनुर्धारी योद्धाओके साथ अकेले युद्ध करनेवालेको महारथी | कहते हैं। दोनों ओरकी सेनाओंमें जो रथी, महारथी अथवा अतिरथी थे, उनका | वर्णन उद्योगपर्वके (१६४ से १७१ तक) आठ अध्यायोंमें किया गया है। वहाँ | बतला दिया है, कि धृष्टकेतु शिशुपालका बेटा था। इसी प्रकार पुरुजित् | कुंतिभोज, ये दो भिन्न भिन्न पुरुषोंके नाम नहीं है। जिस कुंतिभोज राजाको | कुंती गोद दी गई थी, पुरुजित् उसका औरस पुत्र था, और कुंतिभोज उसके | कुलका नाम है; एवं यह वर्णन पाया जाता है, कि वह धर्म, भीष्म और | अर्जुनका मामा था। ( मभा. उ. १७१. २ ) । युधामन्यु और उत्तमौजा, दोनों | पांचाल्य थे; और चेकितान एक यादव था। युधामन्यु और उत्तमौजा, युद्धमें, | दोनों अर्जुनके चक्र-रक्षक थे। शैव्य शिबी देशका राजा था। ] ( ७ ) हे द्विजश्रेष्ठ ! अब हमारी ओर, सेनाके जो मुख्य मुख्य नायक हैं, उनके नामभी मैं आपको सुनाता हूँ; ध्यान देकर सुनिये। ( ८ ) आप और भीष्म, कर्ण और रणजित् कृप, अश्वत्थामा और ( दुर्योधनके सौ भाइयोंमेंसे एक ) विकर्ण, तथा सोमदत्तका पुत्र ( भूरिश्रवा ), ( ९ ) एवं इनके सिवा बहुतेरे अन्यान्य शूर मेरे लिये प्राण देनेको तैयार हैं; और सभी नाना प्रकारके शस्त्र चलानेमें निपुण तथा युद्धमें प्रवीण हैं। ( १० ) इस प्रकार हमारी यह सेना - जिसकी रक्षा स्वयं भीष्म कर रहे हैं - अपर्याप्त अर्थात् अपरिमित या अमर्यादित है; किंतु उनकी ( पांडवों ) वह सेना - जिसकी रक्षा भीम कर रहा है - पर्याप्त अर्थात् परिमित या मर्यादित है। | [ इस श्लोकमें 'पर्याप्त' और 'अपर्याप्त' शब्दोंके अर्थके विषयमें मतभेद | है। 'पर्याप्त'का सामान्य अर्थ 'बस' या 'काफ़ी' होता है, इसलिये कुछ लोग यह | अर्थ बतलाते हैं, कि "पांडवोंकी सेना काफ़ी है; और हमारी काफ़ी नहीं है।" | परंतु यह अर्थ ठीक नहीं है। पहले उद्योगपर्वमें, धृतराष्ट्रसे अपनी सेनाका वर्णन | करते समय उक्त मुख्य मुख्य सेनापतियोंके नाम बतलाकर दुर्योधनने कहा है'