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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

६२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गुरुनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके । हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहैव भुंजीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥ ५ ॥ न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः । यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥ कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः । यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ ७॥ साथ, हे शत्रुनाशने ! युद्धमें बाणोंसे कैसे लडूंगा ? ( ५ ) महात्मा गुरु लोगोंको न मारकर इस लोकमें भीख माँग करके पेट पालनाभी श्रेयस्कर है; परंतु अर्थलोलुप ( हों, तोभी ) गुरु लोगोंको मारकर इसी जगतमें मुझे उनके रक्तसे सने हुए भोग भोगने पड़ेंगे । | [ 'गुरु लोगोंको' इस बहुवचनान्त शब्दसे 'बड़े-बूढ़ों 'काही अर्थ लेना | चाहिये । क्योंकि, विद्या सिखानेवाला गुरु एक द्रोणाचार्यको छोड़, सेनामें | और कोई दूसरा न था । युद्ध छिड़नेके पहले जब ऐसे गुरु लोगों – अर्थात् भीष्म, | द्रोण और शल्य – की पादवंदना कर उनका आशीर्वाद लेनेके लिये युधिष्ठिर | रणांगणमें अपना कवच उतारकर नम्रतासे उनके समीप गये, तब शिष्ट- | संप्रदायका उचित पालन करनेवाले युधिष्ठिरका अभिनंदन कर सबने इसका | कारण बतलाया, कि दुर्योधनकी ओरसे हम क्यों लड़ेंगे ? अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् । इति सत्यं महाराज ! बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ॥ | “ सच तो यह है, कि मनुष्य अर्थका गुलाम है, अर्थ किसीका गुलाम नहीं; | इसलिये हे युधिष्ठिर महाराज ! कौरवोंने मुझे अर्थसे जकड़ रखा है ” ( महा. | भी. अ. ४३, श्लो. ३५. ५०, ७६ ) । ऊपर जो यह 'अर्थलोलुप' शब्द है, वह | इसी श्लोकके अर्थका द्योतक है ।] ( ६ ) हम जय प्राप्त करें या हमें ( वे लोग ) जीत ले – इन दोनों बातोंमेंसे हमें श्रेयस्कर कौन है, यहभी समझ नहीं पड़ता। जिन्हें मारकर फिर जीवित रहनेकी इच्छा नहीं, वेही ये कौरव ( युद्धके लिये ) सामने डटे हैं । | [ 'गरीयः' शब्दसे प्रकट होता है, कि अर्जुनके मनमें “ अधिकांश लोगोंके | अधिक सुख ”के समान कर्म और अकर्मकी लघुता-गुरुता ठहरानेकी कसौटी थी, | पर वह इस बातका निर्णय नहीं कर सकता था, कि उन कसौटीके अनुसार | किसकी जीत होनेमें भलाई है ? गीतारहस्य प्र. ४, पृ. ८४-८७ देखो ।] ( ७ ) दीनतासे मेरी स्वाभाविक वृत्ति नष्ट हो गई, है ( मुझे अपने ) धर्म अर्थात्

दूसरा अध्याय ६२३ न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् । अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ ८ ॥ संजय उवाच । एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परंतप । न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥ ९ ॥ तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥ १० ॥ कर्तव्यका मनमें मोह हो गया है, इसलिये मैं तुमसे पूछता हूँ, कि जो निश्चयसे श्रेयस्कर हो, वह मुझे बतलाओ । मैं तुम्हारा शिष्य हूँ । मुझ शरणागतको समझाइये । (८) क्योंकि पृथ्‍वीका निष्कंटक समृद्ध राज्य या देवताओं (स्वर्ग) काभी स्वामित्व मिल जाय, तथापि मुझे ऐसा कुछभी (साधन) नज़र नहीं आता, कि जो इंद्रियोंको सुखा डालनेवाले मेरे इस शोकको दूर करे । संजयने कहा :- (९) इस प्रकार शत्रुसंतापी गुडाकेश अर्थात् अर्जुनने हृषीकेशसे (श्रीकृष्ण) कहा; और फिर श्रीगोविन्दसे 'मैं न लडूंगा' कहकर (वह) चुप हो गया ! (१०) (फिर) हे भारत (धृतराष्ट्र) ! दोनों सेनाओंके बीच खिन्न होकर बैठे हुए अर्जुनसे श्रीकृष्ण कुछ हँसते हुए-से बोले । । [ एक ओर तो क्षत्रियका स्वधर्म और दूसरी ओर गुरुहत्या एव कुलक्षय- | के पातकोंका भय - इस खींचातानीमें 'मरें या मारें', के झमेलेमें पड़कर, लड़ाई | छोड़कर भिक्षा माँगनेके लिये तैयार हो जानेवाले अर्जुनको अब भगवान् इस | जगतके उसके सच्चे कर्तव्यका उपदेश करते हैं । अर्जुनकी शंका थी, कि लड़ाई | जैसे घोर कर्मसे आत्माका कल्याण न होगा । इसीसे, जिन उदार पुरुषोंने परब्रह्मका | ज्ञान प्राप्तकर अपने आत्माका पूर्ण कल्याण कर लिया है, वे इस दुनियामें कैसा | बर्ताव करते हैं; यहींसे गीताके उपदेशका आरंभ हुआ है । भगवान् कहते हैं, | कि संसारकी चाल-ढालके परखनेसे दीख पड़ता है, कि आत्मज्ञानी पुरुषोंके | जीवन बितानेके अनादिकालसे दो मार्ग चले आ रहे हैं (गीता ३. ३; गीता रहस्य | प्र. ११) । आत्मज्ञान संपादन करनेपर शुकसरीखे पुरुष संसार छोड़कर आनंदसे | भिक्षा माँगते फिरते हैं, तो जनकसरीखे दूसरे आत्मज्ञानी ज्ञानके पश्चात्‌भी | स्वधर्मानुसार लोगोंके कल्याणार्थ संसारके सैकड़ों व्यवहारोंमें अपना समय | लगाया करते हैं । पहले मार्गको सांख्य या सांख्यनिष्ठा कहते हैं; और दूसरेको | कर्मयोग या योग कहते हैं (श्लोक ३९) । यद्यपि ये दोनों निष्ठाएँ प्रचलित हैं, | तथापि गीताका यह सिद्धान्त है, कि इनमेंसे कर्मयोगही अधिक श्रेष्ठ है (गीता

६२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र श्रीभगवानुवाच । § § अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ ११ ॥ न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः । न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ १२ ॥ । ५.२) - यह सिद्धान्त आगे बतलाया जावेगा। इन दोनों निष्ठाओंमेंसे । अर्जुनके मनकी चाह अब संन्यासनिष्ठाकी ओरही अधिक बढ़ी हुई थी। अतएव । उसी मार्गके तत्त्वज्ञानसे अर्जुनकी भूल पहले उसे सुझा दी गई है; और । आगे ३९ वें श्लोकसे भगवानने कर्मयोगका प्रतिपादन करना आरंभ कर दिया । है। सांख्य-मार्गवाले पुरुष ज्ञानके पश्चात् कर्म भलेही न करतें हों; पर उनका । ब्रह्मज्ञान और कर्मयोगका ब्रह्मज्ञान कुछ भिन्न भिन्न नहीं है। तब सांख्य-निष्ठाके । अनुसार देखने परभी आत्मा यदि अविनाशी और नित्य है, तो फिर किंचित् । उपहासपूर्वक अर्जुनसे भगवानका प्रथम कथन है, कि तेरी यह बकबक व्यर्थ । है, कि “मैं अमुकको कैसे मारूँ?” ] श्रीभगवानने कहा :- ( ११ ) जिनका शोक न करना चाहिये, तू उन्हींका शोक कर रहा है और ज्ञानकीभी हाँकता है ! किसीके प्राण ( चाहे ) जायें या ( चाहे ) रहें; ज्ञानी पुरुष उनका शोक नहीं करते । । [ इस श्लोकमें यह कहा गया है, कि ज्ञानी लोग स्वाभाविक प्राणोंके । जानेका या रहनेकाभी शोक नहीं करते । इनमेंसे जानेका शोक करना तो । स्वाभाविक है उसे न करनेका उपदेश करना उचित है। पर टीकाकारोंने यह । शंका करके, कि प्राण रहनेका शोक कैसा और क्यों करना चाहिये; उसके । विषयमें बहुत-कुछ चर्चा की है; और कई एकोंने कहा है, कि मूर्ख एवं अज्ञानी । लोगोंके प्राण रहना शोककाही कारण है। किंतु इतनी बालकी खाल निकालते । रहनेकी अपेक्षा ‘शोक करना’ शब्दकाही ‘भला या बुरा लगना’ अथवा । ‘परवाह करना’ ऐसा व्यापक अर्थ करनेसे कोईभी अडचन रह नहीं जाती । । यहाँ इतनाही वक्तव्य है, कि ज्ञानी पुरुषको दोनों बातें एकहीसी होती हैं। ] ( १२ ) देखो न; ऐसा तो हैही नहीं, कि मैं ( पहले ) कभीही था नहीं । ऐसाभी नहीं, कि तू और ये राजा लोग ( पहले ) न थे; और ऐसाभी नहीं हो सकता, कि हम सब लोग अब आगे न होंगे । । [ इस श्लोकपर रामानुज-भाष्यमें जो टीका है, उसमें लिखा है :- इस । श्लोकसे ऐसा सिद्ध होता है, कि ‘मैं’ अर्थात् परमेश्वर और ‘तू एवं राजा लोग’ । अर्थात् अन्यान्य आत्मा, ये दोनों यदि पहले ( अतीतकालमें ) थे; और आगे

दूसरा अध्याय ६२५ देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ १३ ॥ § § मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥ | होनेवाले हैं, तो परमेश्वर और आत्मा, ये दोनों पृथक्, स्वतंत्र और नित्य हैं। | किंतु यह अनुमान ठीक नहीं है; सांप्रदायिक आग्रहका है; क्योंकि इस स्थान- | पर प्रतिपाद्य इतनाही है, कि सभी नित्य हैं; उनका पारस्परिक संबंध यहाँ | बतलाया नहीं है और बतलानेकी कोई आवश्यकताभी न थी। जहाँ वैसा प्रसंग | आया है, वहाँ गीतामेंही ऐसा अद्वैत सिद्धान्त (गीता ८. ४; १३. ३१) स्पष्ट | रीतिसे बतला दिया है, कि समस्त प्राणियोंके शरीरमे देहधारी आत्मा मैं अर्थात् | एकही परमेश्वर हूँ।] (१३) जिस प्रकार देह धारण करनेवालेको इस देहमें बालपन, जवानी, और बुढ़ापा (प्राप्त होता है), उसी प्रकार (आगे) दूसरी देह प्राप्त हुआ करती है। (इसलिये) इस विषयमें ज्ञानी पुरुषोंको मोह नहीं होता । | [अर्जुनके मनमें यही तो बड़ा डर या मोह था, कि "अमुकको मैं कैसे | मारूँ।" इसलिये उसे दूर करनेके निमित्त, तत्त्वकी दृष्टिसे भगवान् पहले | इसीका विचार बतलाते हैं, कि मरना क्या है और मारना क्या है (श्लोक | ११-३०)। मनुष्य केवल देहरूपी निरी वस्तुही नहीं है; वरन् देह और | आत्माका समुच्चय है। इनमेंसे 'मैं' इस अहंकाररूपमें व्यक्त होनेवाला आत्मा नित्य | और अमर है; वह आज है, कल था और कलभी रहेगाही। अतएव मरना या | मारना, ये शब्दही उसके लिये उपयुक्त नहीं किये जा सकते और उसका शोकभी | न करना चाहिये। अब बाकी रह गई देह; सो यह प्रकटही है, कि वह अनित्य | और नाशवान् है; आज नहीं तो कल, कल नहीं तो सौ वर्षोंमें सही; उसका तो | नाश होनेहीको है - "अद्य वाऽब्दशतान्ते वा मृत्युर्वै प्राणिनां ध्रुवः" (भाग. | १०. १ ३८); और एक देह छूटभी गई, तोभी कर्मोंके अनुसार आगे दूसरी | देह मिलेविना नहीं रहती, अतएव उसकाभी शोक करना उचित नहीं। सारांश, | देह या आत्मा, दोनों दृष्टियोंसे विचार करें, तो सिद्ध होता है, कि मरे हुएका | शोक करना पागलपन है, यह पागलपन भलेही हो; पर यह अवश्य बतलाना | चाहिये, कि वर्तमान देहका नाश होते समय जो क्लेश होते हैं, उनके लिये | शोक क्यों न करें? अतएव अब भगवान् इन कायिक सुखदुःखोंका स्वरूप बतला | कर दिखलाते हैं, कि उनकाभी शोक करना उचित नहीं है।] (१४) हे कुंतिपुत्र ! शीतोष्ण या सुखदुःख देनेवाले, ये मात्राओं अर्थात् गी. र. ४०

६२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥ बाह्य सृष्टिके पदार्थोंके ( इंद्रियोंमे ) जो संयोग हैं, उनकी उत्पत्ति होती है और नाश होता है। ( अतएव ) वे अनित्य अर्थात् विनाशवान् हैं। हे भारत ! ( शोक न करके ) उनको तू सहन कर । ( १५ ) क्योंकि, हे नरश्रेष्ठ ! सुख और दुःखको समान माननेवाले जिस ज्ञानी पुरुषको इनकी व्यथा नहीं होती, वही अमृतत्व अर्थात् अमृत-ब्रह्मकी स्थितिको प्राप्तकर लेनेमें समर्थ होता है। [ जिस पुरुषको ब्रह्मात्मैक्यज्ञान होनेपरभी नामरूपात्मक जगत् मिथ्या नहीं जान पड़ा है, वह बाह्य पदार्थों और इंद्रियोंके संयोगसे होनेवाले शीत-उष्ण आदि या सुखदुःख आदि विकारोंको सत्य मानकर आत्मामें उनका अध्यारोप किया करता है; और इस कारणसे उसको दुःखकी पीड़ा होती है। परंतु जिसने यह जान लिया है, कि ये सभी विकार प्रकृतिके हैं, आत्मा अकर्ता और अलिप्त है; उसे सुख और दुःख एकहीसे हैं। अब भगवान् अर्जुनसे यह कहते हैं, कि इस सम-बुद्धिसे तू उनको सहन कर। और यही अर्थ अगले अध्यायमें अधिक विस्तारसे वर्णित है। शांकरभाष्यमें 'मात्रा' शब्दका अर्थ इस प्रकार किया है :- " मीयते एभिरिति मात्राः " अर्थात् जिनसे बाहरी पदार्थ मापे जाते हैं या ज्ञात होते हैं, उन्हें इंद्रियाँ कहते हैं। पर मात्राका अर्थ इंद्रियाँ न करके, कुछ लोग ऐसाभी अर्थ करते हैं, कि इंद्रियोंसे मापे जानेवाले शब्दरूप आदि बाह्य पदार्थोंको मात्रा कहते हैं; और उनका इंद्रियोंसे तो स्पर्श अर्थात् संयोग होता है, उसे मात्रास्पर्श कहते हैं। इसी अर्थको हमने स्वीकृत किया है। क्योंकि, इस श्लोकके विचार गीतामें आगे जहाँपर आये हैं (गीता ५. २१-२३), वहाँ 'बाह्यस्पर्श' शब्द है। और 'मात्रास्पर्श' शब्दका, हमारे किये हुए अर्थके समान, अर्थ करनेसे इन दोनों शब्दोंका अर्थ एकही-सा हो जाता है। यद्यपि इस प्रकार ये दोनों शब्द मिलते-जुलते हैं, तोभी मात्रास्पर्श शब्द पुराना दीख पड़ता है। क्योंकि मनु- स्मृतिमें (६. ५७) इसी अर्थमें मात्रासंग शब्द आया है; और बृहदारण्यकोप- निषदमें वर्णन है, कि मरनेपर ज्ञानी पुरुषके आत्माका मात्राओंसे असंसर्ग (मात्राऽसंसर्गः) होता है अर्थात् वह मुक्त हो जाता है; और उसे संज्ञा नहीं रहती (बृ. माध्यं. ४. ५. १४; वे. सू. शां. भा. १. ४. २२)। शीतोष्ण और सुखदुःख पद उपलक्षणात्मक हैं; उनमेंही राग-द्वेष, सत्-असत् और मृत्यु-अमरत्व इत्यादि परस्पर-विरोधी द्वंद्वोंका समावेश होता है। ये सब माया-सृष्टिके द्वंद्व हैं। सच्चा परब्रह्म, नासदीय सूक्तमें जो वर्णन है, उसके अनुसार, इन द्वंद्वोंसे परे है। इसलिये प्रकट है, कि अनित्य माया-सृष्टिके इन द्वंद्वोंको शांतिपूर्वक सहकर, इन द्वंद्वोंसे बुद्धिको छुड़ाये बिना ब्रह्म-प्राप्ति नहीं होती (गीता २. ४५; ७. २८;

दूसरा अध्याय ६२७ § § नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ १६ ॥ | गीतार. प्र. ९, पृष्ठ २२६ और २४५-२४७) । अब अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिसे | इसी अर्थको व्यक्तकर दिखलाते हैं :- ] ( १६ ) जो नहीं ( असत् ) है, वह होही नहीं सकता; और जो है ( सत् ), उसका अभाव नहीं होता; तत्त्वज्ञानी पुरुषोंने इस प्रकार ‘है और नहीं है’ (इन सत् और असत् ) इन दोनोंका अंत देख लिया है – अर्थात् अंत देखकर उनके स्वरूपका निर्णय किया है । | [ इस श्लोकके ‘अन्त’ शब्दका अर्थ और ‘राद्धान्त’, ‘सिद्धान्त’ एवं | ‘कृतान्त’ शब्दोंके ( गीता १८. १३ ) ‘अन्त’ शब्दका अर्थ एकही है। शाश्वत-, | कोशमें ( शा. ३८१ ) ‘अन्त’ शब्दके ये अर्थ हैं – “स्वरूपप्रान्तयोरन्तमन्तिकेऽपि | प्रयुज्यते । ” इस श्लोकमें सत्का अर्थ ब्रह्म और असत्का अर्थ नामरूपात्मक | दृश्य जगत् है ( गीतार. प्र. ९, पृ. २२६-२२७; और २४५-२४७ ) | स्मरण रहे, कि “ जो है, उसका अभाव नहीं होता ” इत्यादि तत्त्व देखनेमे | यद्यपि सत्कार्यवादके समान दीख पड़े, तोभी उसका अर्थ कुछ निराला है। जहां | एक वस्तुमे दूसरी वस्तु निर्मित है – उदा., बीजसे वृक्ष – वहाँ सत्कार्यवादका तत्त्व | उपयुक्त होता है। प्रस्तुत श्लोकमें इस प्रकारका प्रश्न नहीं है; वक्तव्य इतनाही | है, कि सत् अर्थात् जो है, उसका अस्तित्व ( भाव ) और असत् अर्थात् जो नहीं | है, उसका अभाव, ये दोनों नित्य याने सदैव कायम रहनेवाले हैं। इस प्रकार | क्रमसे दोनोंके भाव-अभावको नित्य मान लें, तो आगे फिर आप-ही-आप कहना | पड़ता है, कि जो ‘सत्’ है, उसका नाश होकर उसीका ‘असत्’ नहीं हो जाता । | परंतु यह अनुमान, और सत्कार्यवादमें पहलेही ग्रहणकी हुई एक वस्तुसे दूसरी | वस्तुकी कार्यकारणरूप उत्पत्ति, ये दोनों एक-सी नहीं हैं ( गीतार. प्र. ७, पृ. | १५६ ) । माध्वभाष्यमें इस श्लोकके “ नासतो विद्यते भावः ” इस पहले चरणके | ‘ विद्यते भावः ’ का ‘ विद्यते + अभावः ’ ऐसा परिच्छेद है और उसका यह अर्थ | किया है, कि असत् याने अव्यक्त-प्रकृतिका अभाव, अर्थात् नाश, नही होता । | और जब कि दूसरे चरणमें यह कहा है, कि सत्काभी नाश नहीं होता, तब | अपने द्वैती संप्रदायके अनुसार मध्वाचार्यने इस श्लोकका ऐसा अर्थ किया है, | कि सत् और असत् दोनों नित्य हैं ! परंतु यह अर्थ सरल नहीं है, इसमे | खीचातानी है । क्योंकि स्वाभाविक रीतिसे दीख पड़ता है, कि परस्पर-विरोधी | असत् और सत् शब्दोंके समानही अभाव और भाव ये दो विरोधी शब्दही इस | स्थलपर प्रयुक्त हैं; एवं दूसरे चरणमें अर्थात् “ नाभावो विद्यते सतः ” यहाँपर

६२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥ १७ ॥ अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ १८ ॥ । 'नाभावो'में यदि अभाव शब्दही लेना पड़ता है, तो प्रकट है, कि पहले चरणमें । भाव शब्दही रहना चाहिये। इसके अतिरिक्त यह कहनेके लिये, कि असत् और । सत् ये दोनों नित्य है: 'अभाव' और 'विद्यते' इन पदोंके दो वार प्रयोग करनेकी । कोई आवश्यकता न थी। किंतु मध्वाचार्यके कथनानुसार यदि इस द्विरुक्तिको । आदरार्थक मानभी ले, तोभी आगे अठारहवें श्लोकमें स्पष्टही कहा है, कि व्यक्त । या दृश्यसृष्टिमें आनेवाला मनुष्यका शरीर नाशवान् अर्थात् अनित्य है। अतएव । आत्माके साथही भगवद्गीताके अनुसार, देहकोभी नित्य नहीं मान सकते; प्रकट । रूपसे यह सिद्ध होता है, कि एक नित्य है और दूसरा अनित्य। पाठकोंको यह । दिखलानेके लिये कि, सांप्रदायिक दृष्टिसे खेंचातानी कैसे की जाती है, हमने । नमूनेके ढंगपर यहाँ इस श्लोकका मध्वभाष्यवाला अर्थ लिख दिया है - अस्तु; । जो सत् है, वह कभी नष्ट होनेवाला नहीं, अतएव मत्स्वरूपी आत्माका शोक न । करना चाहिये; और तत्त्वकी दृष्टिसे नामरूपात्मक देह आदि अथवा सुखदुःख । आदि विकार मूलमेही विनाशी हैं, इसलिये उनके नाश होनेका शोक करनाभी । उचित नहीं। फलतः आरंभमें अर्जुनसे जो यह कहा है, कि "जिसका शोक न । करना चाहिये, उसका तू शोक कर रहा है", वह सिद्ध हो गया। अब । 'सत्' और 'असत्'के अर्थोंकोही अगले दो श्लोकोंमें औरभी स्पष्ट कर । बतलाते हैं - (१७) स्मरण रहे, कि यह संपूर्ण ( जगत् ) जिसने फैलाया अथवा व्याप्त किया है, वह ( मूल आत्मस्वरूप ब्रह्म ) अविनाशी है। इस अव्यक्त तत्त्वका विनाश करनेके लिये कोईभी समर्थ नहीं है। । [ पिछले श्लोकमें जिसे सत् कहा है, उसीका यह वर्णन है। यह बतलाकर, । कि शरीरका स्वामी अर्थात् आत्मा इसी 'नित्य' श्रेणीमें आता है; अब यह । बतलाते हैं, कि अनित्य या सत् किसे कहना चाहिये :- ] (१८) कहा है, कि जो शरीरका स्वामी ( आत्मा ) नित्य, अविनाशी और अचिन्त्य है, उसे प्राप्त होनेवाले ये शरीर नाशवान् अर्थात् अनित्य हैं। अतएव हे भारत ! तू युद्ध कर ! । [ सारांश, इस प्रकार नित्य-अनित्यका विवेक करनेसे तो यह भावही । झूठा होता है, कि "मैं अमुकको मारता हूँ", और युद्ध न करनेके लिये

दूसरा अध्याय ६२९ य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥ न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २० ॥ वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् । कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ २१ ॥ वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥ नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ २३ ॥ [ अर्जुनने जो कारण दिखलाया था, वह निर्मूल हो जाता है। इसी अर्थको अब और अधिक स्पष्ट करते हैं :- ] ( १९ ) ( शरीरके स्वामी या आत्मा ) कोही जो मारनेवाला मानता है, या जो ऐसा समझता है, कि वह मारा जाता है; उन दोनोंकोभी सच्चा ज्ञान नहीं है। ( क्योंकि ) यह ( आत्मा ) न तो मारता है और न माराभी जाता है। [ क्योंकि यह आत्मा नित्य और स्वयं अकर्ता है. सब खेल तो प्रकृतिकाही है। कठोपनिषदमें यह और अगला श्लोक आया है ( कठ. २. १८, १९ )। इसके अतिरिक्त महाभारतके अन्य स्थानोंमेंभी ऐसा वर्णन है, कि कालसे सब ग्रसे हुए हैं; कालकी इस क्रीडाकोही 'मारने और मरने' की लौकिक संज्ञाएं हैं ( शां. २५. १५ )। गीतामेंभी ( गीता ११. ३३ ) आगे भक्ति-मार्गकी भाषामे यही तत्त्व भगवानने अर्जुनको फिर बतलाया है, कि भीष्म-द्रोण आदिको कालस्वरूपसे मैनेही पहले मार डाला है, तू केवल निमित्त हो जा । ] ( २० ) यह ( आत्मा ) न तो कभी जन्मता है और न मरताभी है; ऐसाभी नहीं है, कि यह ( एक बार ) होकर फिर होनेका नहीं: यह अज, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, एवं शरीरका वध हो जाय तोभी मारा नहीं जाता । ( २१ ) हे पार्थ ! जिसने जान लिया, कि यह आत्मा अविनाशी, नित्य, अज और अव्यय है, वह पुरुष किसीको कैसे मरवायेगा और किसीको कैसे मारेगा ? ( २२ ) जिस प्रकार कोई मनुष्य पुराने वस्त्रोंको छोड़कर दूसरे नये ग्रहण करता है, उसी प्रकार देही अर्थात् शरीरका स्वामी आत्मा पुराने शरीर त्यागकर दूसरे नये शरीर धारण करता है । ( २३ ) इसे अर्थात् आत्माको शस्त्र काट नहीं सकते; इसे आग जला नहीं सकती; वैसेही इसे पानी भिगा या गला नहीं सकता और वायु सुखाभी नहीं सकती है ।

६३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ २४ ॥ अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते । तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ २५ ॥ § § अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । तथापि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि ॥ २६ ॥ जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २७ ॥ [ वस्त्रकी यह उपमा प्रचलित है । महाभारतमें एक स्थानपर, एक घर (शाला) छोड़कर दूसरे घरमें जानेका दृष्टान्त पाया जाता है (शां. १५, १६) ; और एक अमेरिकन ग्रंथकारने यही कल्पना पुस्तकको नई जिल्द बाँधनेका दृष्टान्त देकर व्यक्त की है । पिछले तेरहवें श्लोकमें बालपन, जवानी और बुढ़ापा, इन तीन अवस्थाओंको जो न्याय उपयुक्त किया गया है, वही अब सब शरीरके विषयमें किया गया है । ] (२४) (कभीभी) न कटनेवाला, न जलनेवाला, न भीगनेवाला और न सूखनेवाला यह (आत्मा) नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन अर्थात् चिरंतन है । (२५) इस आत्माकोही, अव्यक्त अर्थात् जो इंद्रियोंको गोचर न होनेवाला, अचिंत्य अर्थात् जो मनसेभी जाना नहीं जा सकता और अविकार्य अर्थात् जिसे किसीभी विकारकी उपाधि नहीं है, कहते हैं। इसलिये उसे (आत्माको) इस प्रकारका समझकर उसका शोक करना तुझे उचित नहीं है । [यह वर्णन उपनिषदोंसे लिया है। यह वर्णन निर्गुण आत्माका है, सगुणका नहीं । क्योंकि अविकार्य या अचिंत्य विशेषण सगुणको लग नहीं सकते (गीतारहस्य प्र. ९ देखो) । आत्माके विषयमें वेदान्तशास्त्रका जो अंतिम सिद्धान्त है, उसके आधारसे शोक न करनेके लिये यह उपपत्ति बतलाई गई है । अब कदाचित् कोई ऐसा पूर्वपक्ष करे, कि हम आत्माको नित्य नही समझते, इसलिये तुम्हारी उपपत्ति हमें ग्राह्य नहीं; तो इस पूर्वपक्षका प्रथम उल्लेख करके भगवान् उसका यह उत्तर देते हैं कि :-] (२६) अथवा, यदि तू ऐसा मानता हो, कि यह आत्मा (नित्य नहीं, शरीरके साथही) सदा जन्मता या सदा मरता है, तोभी हे महाबाहु ! उसका शोक करना तुझे उचित नहीं । (२७) क्योंकि जो जन्मता है, उसकी मृत्यु निश्चित

दूसरा अध्याय ६३१ § § अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिवेदना ॥ २८ ॥ § § आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः । आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ २९ ॥ है, और जो मरता है, उसका जन्म निश्चित है; इसलिये ( इम ) अपरिहार्य बातका ( ऊपर उल्लिखित तेरे मतके अनुसारभी ) शोक करना तुझको उचित नहीं। । [ स्मरण रहे, कि ऊपरके दो श्लोकोंमें बतलाई हुई उपपत्ति सिद्धान्त- | पक्षकी नहीं है; यह ' अथ च = अथवा ' शब्दसे बीचमेंही उपस्थित किये हुए पूर्व | पक्षका उत्तर है । आत्माको नित्य मानो चाहे अनित्य; दिखलाना इतनाही है, | कि दोनोंभी पक्षोंमें शोक करनेका प्रयोजन नहीं है । गीताका यह सच्चा सिद्धान्त | पहलेही बतला चुके हैं, कि आत्मा सत्, नित्य, अज, अविकार्य और अचिंत्य या | निर्गुण है । अस्तु; देह अनित्य है, अतएव शोक करना उचित नहीं; इसीका, | सांख्यशास्त्रके अनुसार, दूसरी उपपत्ति बतलाते हैं— ] ( २८ ) सब भूत आरंभमें अव्यक्त, मध्यमें व्यक्त और मरणसमयमें फिर अव्यक्त होते हैं; ( ऐसी यदि सभीकी स्थिति है ) तो हे भारत ! उसमें शोक किस बात का ? । [ 'अव्यक्त' शब्दकाही अर्थ है :—“ इंद्रियोंको गोचर न होनेवाला ”। मूल | एक अव्यक्त द्रव्यसेही आगे क्रमक्रमसे समस्त व्यक्त सृष्टि निर्मित होती है; और | अंतमें अर्थात् प्रलय-कालमें सब व्यक्त सृष्टिका फिर अव्यक्तमेंही लय हो जाता है | ( गीता ८. १८ ); इस सांख्य-सिद्धान्तका अनुसरण कर, इस श्लोककी दलीलें हैं । | सांख्य-मतवालोंके इस सिद्धान्तका स्पष्टीकरण गीतारहस्यके सातवें और आठवें | प्रकरणमें किया गया है । किसीभी पदार्थकी व्यक्त स्थिति यदि इस प्रकार कभी | न कभी नष्ट होनेवाली है, तो जो व्यक्त स्वरूप निसर्गसेही नाशवान् है, उसके | विषयमें शोक करनेकी कोई आवश्यकताही नहीं । यही श्लोक 'अव्यक्त'के बदले | 'अभाव' शब्दसे संयुक्त होकर महाभारतके स्त्रीपर्वमें ( महा. स्त्री. २. ६ ) आया | है । और आगे “ अदर्शनादापतिताः पुनश्चादर्शनं गताः । न ते तव न तेषां त्वं तत्र | का परिवेदना । ” ( स्त्री २. १३ ) इस श्लोकमें 'अदर्शन' अर्थात् “ नजरसे दूर हो | जाना ” इस शब्दकाभी मृत्युको उद्देश्यकर उपयोग किया गया है । सांख्य और | वेदान्त, दोनों शास्त्रोंके अनुसार शोक करना यदि व्यर्थ सिद्ध होता है, और आत्मा- | को अनित्य माननेसेभी यदि यही बात सिद्ध होती है, तो फिर लोग मृत्युके विषयमें | शोक क्यों करते हैं ? आत्मस्वरूपसंबंधी अज्ञानही इसका उत्तर है । क्योंकि —] ( २९ ) कोई तो मानो आश्चर्य ( अद्भुत वस्तु ) समझकर इसकी ओर

६३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ ३० ॥ देखता है, कोई आश्चर्यसरीखा इसका वर्णन करता है; और कोई मानो आश्चर्य समझकर सुनता है। परंतु (इस प्रकार देखकर अन्य वर्णन और) सुनकरभी (इनमेंसे), कोई इसे (तत्त्वतः) नही जानता है। [अपूर्व वस्तु समझकर बड़े-बड़े लोग आश्चर्यसे आत्माके विषयमें कितनाही विचार क्यों न करें, पर उसके सच्चे स्वरूपको जाननेवाले लोग बहुतही थोड़े हैं, इसीसे बहुतेरे लोग मृत्युके विषयमें शोक किया करते हैं। इससे तू ऐसा न करके, पूर्ण विचारमे आत्मस्वरूपको यथार्थ रीतिपर समझ ले और शोक करना छोड़दे यही इसका अर्थ है। कठोपनिषद (कठ. २. ७) में इसी ढंगका आत्माका वर्णन है।] (३०) सबके शरीरमें (रहनेवाला) शरीरका स्वामी (आत्मा) सर्वदा अवध्य अर्थात् कभीभी वध न किया जानेवाला है; अतएव हे भारत (अर्जुन)! सब अर्थात् किसीभी प्राणीके विषयमें शोक करना तुझे उचित नहीं है। [अब तक यह सिद्ध किया गया, कि सांख्य या संन्यास-मार्गके तत्त्वज्ञाना- नुसार आत्मा अमर है और देह तो स्वभावसेही अनित्य है, इस कारण कोई मरे या मारे, उसमें 'शोक' करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, परंतु यदि कोई इससे यह अनुमान कर ले, कि कोई किसीको मारे तो उसमेंभी 'पाप' नहीं, तो वह भयंकर भूल होगी। मरना या मारना, इन दो शब्दोंके अर्थोका यह पृथक्करण है, मरने या मारनेमें जो डर लगता है, उसे पहले दूर करनेके लियेही यह ज्ञान बतलाया है। मनुष्य तो आत्मा और देहका समुच्चय है। इनमें आत्मा अमर है, इसलिये मरना या मारना ये दोनों शब्द उसे उपयुक्त नहीं होते। बाकी रह गई देह; वहभी स्वभावसेही अनित्य है, इसलिये यदि उसका नाश हो जाय, तो शोक करने योग्य कुछ है नहीं। परंतु यदृच्छा या कालकी गतिसे कोई मर जाय, या किसीको कोई मार डाले, तो उसका सुख-दुःख न मानकर शोक करना छोड़ दें; तोभी इस प्रश्नका निपटारा नही हो जाता, कि युद्ध जैसा घोर कर्म करनेके लिये, जानबूझकर, प्रवृत्त होकर लोगोंके शरीरोंका नाश हम क्यों करें? क्योंकि, देह यद्यपि अनित्य है, तथापि आत्माका पक्का कल्याण या मोक्ष संपादन कर देनेके लिये देही तो एकमात्र साधन है, अतएव आत्महत्या करना अथवा बिना योग्य कारणोंके किसी दूसरेको मार डालना, ये दोनों शास्त्रानुसार घोर पातकही है। इसलिये मरे हुएका शोक करना यद्यपि उचित नहीं है, तोभी इसका कुछ-न-कुछ प्रवल कारण बतलाना आवश्यक है, कि एक दूसरेको क्यों मारे। इसीका नाम

दूसरा अध्याय ६३३ § § स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ ३१ ॥ यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ ३२ ॥ अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ ३३ ॥ अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् । सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥ ३४ ॥ | धर्माधर्म-विवेक है और गीताका वास्तविक प्रतिपाद्य विषयभी यही है। इसीसे | जो चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था सांख्य-मार्गकोभी संमत है, उसके अनुसारभी अब प्रथम | युद्ध करना क्षत्रियोंका कर्तव्य है, इसलिये भगवान् कहते हैं, कि तू मरने- | मारनेका शोक मत कर; इतनाही नही, बल्कि लड़ाईमें मरना या मार डालना, | ये दोनो बातें क्षत्रियधर्मके अनुसार तुझको आवश्यकही हैं -] (३१) इसके सिवा स्वधर्मकी ओर देखें, तोभी (इस समय) हिम्मत हारना तुझे उचित नही है। क्योंकि धर्मोचित युद्धकी अपेक्षा क्षत्रियको श्रेयस्कर और कुछ हैही नही। | [स्वधर्मकी यह उपपत्ति आगेभी दो बार (गीता ३.३५; १८.४७) | बतलाई गई है। संन्यास अथवा सांख्य-मार्गके अनुसार यद्यपि कर्मसंन्यासरूपी | चतुर्थ आश्रम अंतकी सीढ़ी है, तोभी मनु आदि सभी स्मृति-कर्ताओंका कथन | है, कि उसके पहिले चातुर्वर्ण्यकी व्यवस्थाके अनुसार ब्राह्मणको ब्राह्मण-धर्म और | क्षत्रियको क्षत्रिय-धर्मका पालन कर गृहस्थाश्रम पूरा करना चाहिये, अतएव | इस श्लोकका और आगेके श्लोकका तात्पर्य यह है, कि गृहस्थाश्रमी अर्जुनको | युद्ध करना आवश्यक है।] (३२) और हे पार्थ ! यह युद्ध आपही आप खुला हुआ स्वर्गका द्वारही है; ऐसा युद्ध भाग्यवान् क्षत्रियोंहीको मिला करता है। (३३) अतएव यदि तू (अपने) धर्मके अनुकूल यह युद्ध न करेगा, तो स्वधर्म और कीर्ति खोकर पाप बटोरेगा; (३४) यही नहीं, बल्कि (सब) लोग तेरी अक्षय्य दुष्कीर्ति गाते रहेंगे ! और अपयश तो संभावित पुरुषके लिये मृत्युसेभी बढ़कर है। | [श्रीकृष्णने यही तत्त्व उद्योगपर्वमें युधिष्ठिरकोभी बतलाया है (महा. | उ. ७२. २४)। वहाँ यह श्लोक है- "कुलीनस्य च या निंदा वधो वाऽमित्र- | कर्षणम् । महागुणो वधो राजन् न तु निंदा कुजीविका ॥" परंतु गीतामें उसकी

६३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः । येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ ३५ ॥ अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः । निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥ ३६ ॥ हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् । तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥ ३७ ॥ सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥ ३८ ॥ | अपेक्षा यह अर्थ संक्षेपमें है; और गीता-ग्रंथका प्रचारभी अधिक है, इस कारण | गीताके 'संभावितस्य०' इत्यादि वाक्यका कहावतका-सा उपयोग होने लगा है । | गीताके और बहुतेरे श्लोकभी इसीके समान सर्वसाधारण लोगोंमें प्रचलित हो | गये हैं। अब दुष्कीर्तिका स्वरूप बतलाते हैं - ] ( ३५ ) ( सब ) महारथी समझेंगे, कि तू डरकर रणसे भाग गया; और जिन्हें ( आज ) तू बहुमान्य हो रहा है, वेही तेरी योग्यता कम समझने लगेंगे । ( ३६ ) ऐसेही तेरी सामर्थ्यकी निंदा कर, तेरे शत्रु ऐसी ऐसी अनेक बातें ( तेरे विषयमें ) कहेंगे, जो न कहनी चाहिये । इससे अधिक दुःखकारक और हैही क्या ? ( ३७ ) मर जायगा, तो स्वर्गको जावेगा, और जीतेगा तो पृथिवी ( का राज्य ) भोगेगा ! इसलिये हे अर्जुन ! युद्धका निश्चय करके उठ ! | [ उल्लिखित विवेचनसे न केवल यही सिद्ध हुआ, कि सांख्य-ज्ञानके | अनुसार मरने-मारनेका शोक न करना चाहिये, प्रत्युत यहभी सिद्ध हो गया, | कि स्वधर्मके अनुसार युद्ध करनाही कर्तव्य है । तोभी अब इस शंकाका उत्तर | दिया जाता है, कि लड़ाईमें होनेवाली हत्याका 'पाप' कर्ताको लगता है या | नहीं । वास्तवमें इस उत्तरकी युक्तियाँ कर्मयोग-मार्गकी हैं, इसलिये उस मार्गकी | प्रस्तावना यहीं हुई है । ] ( ३८ ) सुख-दुःख, लाभ-नुकसान और जय-पराजयको एकसा मानकर फिर युद्धमें लग जा । ऐसा करनेसे तुझे ( कोईभी ) पाप लगनेका नहीं । | [ संसारमें आयु बितानेके दो मार्ग हैं - एक सांख्य और दूसरा योग । | इनमेंसे जिस सांख्य अथवा संन्यास-मार्गके आचारको ध्यानमें लाकर अर्जुन | युद्ध छोड़ भिक्षा माँगनेके लिये तैयार हुआ था, उस संन्यास-मार्गके तत्त्वज्ञाना- | नुसारही आत्माका या देहका शोक करना उचित नहीं है । भगवानने अर्जुनको | सिद्ध कर दिखलाया है, कि सुख और दुःखोंको सम-बुद्धिसे सह लेना चाहिये,

दूसरा अध्याय ६३५ § § एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु। बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥ ३९ ॥ § § नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ ४० ॥ | एवं स्वधर्मकी ओर ध्यान देकर युद्ध करनाही क्षत्रियको उचित है, तथा सम- | बुद्धिसे युद्ध करनेमें कोईभी पाप नहीं लगता । परंतु इस मार्गका ( सांख्य ) | मत है, कि कभी-न-कभी संसार छोड़कर संन्यास ले लेनाही प्रत्येक मनुष्यका | इस जगतमें परम कर्तव्य है, इसलिये दृष्ट जान पड़े तो अभीही युद्ध छोड़कर | संन्यास क्यों न ले लें; अथवा स्वधर्मपालनही क्यों करें ? इत्यादि शंकाओंका | निवारण सांख्य-ज्ञानसे नहीं होता; और इसीसे यह कह सकते हैं, कि अर्जुनका | मूल आक्षेप ज्यों का त्यों बना रहता है । अतएव अब भगवान् कहते हैं - ] ( ३९ ) सांख्य अर्थात् संन्यास-निष्ठाके अनुसार तुझे यह बुद्धि अर्थात् ज्ञान या उपपत्ति बतलाई । अब जिस बुद्धिसे युक्त होनेपर ( कर्मोंके न छोड़ने परभी ) हे पार्थ ! तू कर्मबंध छोड़ेगा, ऐसी यह (कर्म)-योगकी बुद्धि अर्थात् ज्ञान ( तुझे बतलाता हूँ ) सुन ! | [ भगवद्गीताका रहस्य समझनेके लिये यह श्लोक अत्यंत महत्त्वका है । | सांख्य शब्दसे कपिलका सांख्य या निरा वेदान्त, और योग शब्दसे पातंजल- | योग यहाँपर उद्दिष्ट नहीं है; सांख्यसे संन्यास-मार्ग और योगसे कर्म-मार्गहीका | अर्थ यहाँपर लेना चाहिये । गीताके ( ३. ३) श्लोकसे प्रकट यह है, कि ये दोनों | मार्गस्वतंत्र हैं, इनके अनुयायियोंकोभी क्रमसे 'सांख्य' - संन्यास-मार्गी, और 'योग' | कर्मयोग-मार्गी कहते हैं ( गीता ५. ५ ) । इनमेंसे सांख्य-निष्ठावाले लोग कभी- | न-कभी अंतमें कर्मोंको सर्वथा छोड़ देनाही श्रेष्ठ मानते हैं; इसलिये इस मार्गके | तत्त्वज्ञानसे अर्जुनकी इस शंकाका पूरा पूरा समाधान नहीं होता, कि " युद्ध क्यों | करूँ ? " अतएव जिस कर्मयोग-निष्ठाका ऐसा मत है, कि संन्यास न लेकर ज्ञान- | प्राप्तिके पश्चातभी निष्काम बुद्धिसे सदैव कर्म करते रहनाही प्रत्येकका सच्चा | पुरुषार्थ है, उसी कर्मयोगका, अथवा संक्षेपमें योग-मार्गका, ज्ञान बतलाना अब | आरंभ किया गया है; और गीताके अंतिम अध्याय तक, अनेक कारण दिखलाते | हुए, अनेक शंकाओंका निवारण कर, इसी मार्गका, पुष्टीकरण किया गया है । | गीताके विषय-निरूपणका, स्वयं भगवानका किया हुआ, यह स्पष्टीकरण ध्यानमें | रखनेसे इस विषयमें कोई शंका रह नहीं जाती, कि कर्मयोगही गीतामें प्रतिपाद्य | है । कर्मयोगके मुख्य मुख्य सिद्धान्तोंका पहले निर्देश करते हैं - ] ( ४० ) यहाँ अर्थात् इस कर्मयोग-मार्गमें ( एक बार ) आरंभ किये हुए

६३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ ४१ ॥ कर्मका नाश नहीं होता और (आगे) विघ्नभी नही होते । इस धर्मका थोड़ा-साभी (आचरण) बड़े भयसे संरक्षण करता है। | [इस सिद्धान्तका महत्त्व गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमें (पृष्ठ २८६) | दिखलाया गया है; और अधिक स्पष्टीकरण आगे गीतामेंभी किया गया है | (गीता ६.४०-४६)। इसका यह अर्थ है, कि कर्मयोग-मार्गमें यदि एक जन्ममें | सिद्धि न मिले, तो किया हुआ कर्म व्यर्थ न जाकर अगले जन्ममें उपयोगी | होता है; और प्रत्येक जन्ममें इसकी बढ़ती होती है, एवं अंतमें कभी-न-कभी | सच्ची सद्गति मिलतीही है। अब कर्म-योगमार्गका दूसरा महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त | बतलाते है - ] (४१) हे कुरुनंदन, इस मार्गमें व्यवसाय-बुद्धि अर्थात् कार्य और अकार्यका निश्चय करनेवाली (इंद्रियरूपी) बुद्धि एक अर्थात् एकाग्र रखनी पड़ती है; क्योंकि जिनकी बुद्धिका (इस प्रकार एक) निश्चय नहीं होता, उनकी बुद्धि अर्थात् वासनाएं अनेक शाखाओंपे युक्त और अनंत (प्रकारकी) होती हैं। | [संस्कृतमें बुद्धि शब्दके अनेक अर्थ है । ३९ वें श्लोकमें यह शब्द-ज्ञानके | अर्थमें आया है; और आगे ४९ वें श्लोकमें इस 'बुद्धि' शब्दकाही "समझ, इच्छा, | वासना, या हेतु" अर्थ है। परंतु बुद्धि शब्दके पीछे 'व्यवसायात्मिका' विशेषण | है, इसलिये इस श्लोकके पूर्वार्धमें उसी शब्दका अर्थ यों होता है- व्यवसाय | अर्थात् कार्य-अकार्यका निश्चय करनेवाली बुद्धि-इंद्रिय (गीतार. प्र. ६, १३४- | १३९)। पहले इस बुद्धि-इंद्रियसे किसीभी बातका भला-बुरा विचार कर लेने | पर फिर तदनुसार कर्म करनेकी इच्छा या वासना मनमें हुआ करती है, अतएव | इस इच्छा या वासनाकोभी बुद्धिही कहते हैं; परंतु उस समय 'व्यवसायात्मिका' | यह विशेषण उसके पीछे नहीं लगाते। भेद दिखलाना आवश्यकही हो, तो | 'वासनात्मक' बुद्धि कहते है । इस श्लोकके दूसरे चरणमें सिर्फ 'बुद्धि' शब्द है, | उसके पीछे 'व्यवसायात्मका' यह विशेषण नहीं है, इसलिये बहुवचनान्त | 'बुद्धयः'से 'वासना, कल्पनातरंग' अर्थ होकर पूरे श्लोकका यह अर्थ होता है, कि | "जिसकी व्यवसायात्मका बुद्धि अर्थात निश्चय करनेवाली बुद्धि-इंद्रिय स्थिर | नहीं होती, उनके मनमें क्षण-क्षण में नई तरंगें या वासनाएं उत्पन्न हुआ करती | हैं।" बुद्धि शब्दके 'निश्चय करनेवाली इंद्रिय' या 'वासना' इन दोनों अर्थोंको | ध्यानमें रखे बिना कर्मयोगकी बुद्धिके विवेचनका मर्म भली भांति समझमें आनेका | नही। व्यवसायात्मका बुद्धिके स्थिर या एकाग्र न रहनेसे प्रतिदिन भिन्न भिन्न

दूसरा अध्याय ६३७ § § यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥ ४२ ॥ कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् । क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥ ४३ ॥ भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् । व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ ४४ ॥ | वासनाओमे मन व्यग्र हो जाता है; और मनुष्य ऐसी अनेक झंझटोंमें पड़ जाता | है, कि आज पुत्रप्राप्तिके लिये अमुक कर्म करो, तो कल स्वर्गकी प्राप्तिके लिये | अमुक कर्म करो। बस इसीका वर्णन अब करते हैं :- ) ( ४२ ) हे पार्थ ! ( कर्मकांडात्मक वेदोंके ( फलश्रुति-युक्त ) वाक्योंमें भूले हुए और यह कहनेवाले मूढ़ लोग कि, उनके अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं है, बढ़ा कर कहा करते हैं, कि - ( ४३ ) "अनेक प्रकारके ( यज्ञ-याग आदि ) कर्मोंसेही ( फिर ) जन्मरूप फल मिलता है, और ( जन्म-जन्मान्तरमें ) भोग तथा ऐश्वर्य मिलता है ; " - स्वर्गके पीछे पड़े हुए वे काम्य-बुद्धिवाले ( लोग ), ( ४४ ) उल्लिखित भाषणकी ओरही उनके मन आकर्षित हो जानेसे, भोग और ऐश्वर्यमेंही गर्क रहते हैं; इस कारण उनकी व्यवसायात्मका अर्थात् कार्य-अकार्यका निश्चय करनेवाली बुद्धि ( कभीभी ) समाधिस्थ अर्थात् एक स्थानमें स्थिर नहीं रह सकती । | [ ऊपरके तीनों श्लोकोंका मिलकर एकही वाक्य है; उसमें उन ज्ञान- | विरहित कर्मठ मीमांसा-मार्गवालोंका वर्णन है, जो श्रौत-स्मार्त कर्मकांडके अनुसार | आज अमुक हेतुकी सिद्धिके लिये, तो कल और किसी हेतुसे, सदैव स्वार्थके | लियेही, यज्ञ-याग आदि कर्म करनेमें निमग्न रहते हैं। यह वर्णन उपनिषदोंके | आधारपर किया गया है - उदाहरणार्थ, मुंडकोपनिषदमें कहा है - इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः । नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥ | " इष्टापूर्तही श्रेष्ठ है, दूसरा कुछभी श्रेष्ठ नहीं - यह माननेवाले मूढ़ | लोग स्वर्गमें पुण्यका उपभोग कर चुकनेपर फिर नीचेके इस मनुष्य-लोकमें | आते हैं" ( मुंड १. २. १० )। ज्ञानविरहित कर्मोंकी इसी ढंगकी निंदा ईशा- | वास्य और कठ उपनिषदोंमेंभी की गयी है ( कठ. २. ५; ईश. ९, १२ )। परमे- | श्वरका ज्ञान प्राप्त न करके केवल कर्मोंमेंही फंसे रहनेवाले इन लोगोंको ( गीता | ९. २१ ) अपने अपने कर्मोंके स्वर्ग आदि फल मिलते तो हैं, पर उनकी वासना | आज एक कर्ममें, तो कल किसी दूसरेही कर्ममें रत होकर चारों ओर घुड़-

६३८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥ ४५ ॥ दौड़सी मचाये रहती है, इस कारण उन्हें स्वर्गका आवागमन नसीब हो जाने परभी मोक्ष नहीं मिलता। मोक्षकी प्राप्तिके लिये बुद्धि-इंद्रियको स्थिर या एकाग्र रखना चाहिये। आगे छठे अध्यायमें विचार किया गया है, कि उसको एकाग्र किस प्रकार करना चाहिये। अभी तो इतनाही कहते हैं कि - ] ( ४५ ) हे अर्जुन ! ( कर्मकांडात्मक ) वेद ( इस रीतिसे ) त्रैगुण्यकी बातोंसे भरे पड़े हैं, इसलिये तू निस्त्रैगुण्य अर्थात् त्रिगुणोंसे अतीत, नित्यसत्त्वस्थ और सुखदुःख आदि द्वंद्वोंसे अलिप्त हो, एवं योगक्षेम आदि स्वार्थोंमें न पड़कर आत्मनिष्ठ हो ! [ सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणोंसे मिश्रित प्रकृतिकी सृष्टिको त्रैगुण्य कहते हैं। यह बात गीतारहस्य ( पृ. २३१-२५७ ) में स्पष्ट कर दिखलाई गई है, कि सृष्टि, सुख-दुख आदि अथवा जन्म-मरण आदि विनाशवान् द्वंद्वोंसे भरी हुई है; और सत्य ब्रह्म उसके परे है। इसी अध्यायके ४३ वें श्लोकमें, कहा है, कि प्रकृतिके अर्थात् मायाके इस संसारके सुखोंकी प्राप्तिके लिये मीमांसक- मार्गवाले लोग श्रौत, यज्ञ-याग आदि क्रिया करते हैं; और वे इन्हींमें निमग्न रहा करते हैं। कोई पुत्र-प्राप्तिके लिये एक विशेष यज्ञ करता है, तो कोई पानी बरसानेके लिये दूसरी इष्टि करता है। ये सब कर्म इस लोगमें संसारी व्यवहारोंके लिये अर्थात् अपने योगक्षेमके लिये हैं। अतएव प्रकटही है, कि जिसे मोक्ष प्राप्त करना हो, वह वैदिक कर्मकांडके इन त्रिगुणात्मक और निरे योगक्षेम संपादन करनेवाले कर्मोंको छोड़कर, अपना चित्त इसके परेके परब्रह्मकी ओर लगावे। इसी अर्थमें 'निर्द्वन्द्व' और 'निर्योगक्षेम' - शब्द ऊपर आये हैं। यहाँ ऐसी शंका हो सकती है, कि वैदिक कर्मकांडके इन काम्य कर्मोंको छोड़ देनेसे योग-क्षेम ( निर्वाह ) कैसे होगा ( गीतार. पृ. २९२-३९१ )। किंतु इसका उत्तर यहाँ नहीं दिया है, यह विषय आगे फिर नवें अध्यायमें आया है; वहाँ कहा है, कि इस योग-क्षेमको भगवान् करते हैं; और इन्हीं दो स्थानोंपर, गीतामें 'योगक्षेम' शब्द आया है ( गीता ९. २२ और उसपर हमारी टिप्पणी देखो )। नित्य-सत्त्वस्थ पदकाही अर्थ त्रिगुणातीत होता है। क्योंकि आगे कहा है, कि सत्त्वगुणके नित्य उत्कर्षसेही फिर त्रिगुणातीत अवस्था प्राप्त होती है, और वही सच्ची सिद्धावस्था है ( गीता १४. १४, २०; गीतार. पृ. १६६-१६७ तात्पर्य यह है, कि मीमांसकोंके योगक्षेमकारक त्रिगुणात्मक काम्य कर्म छोड़कर एवं सुख-दुःखके द्वंद्वोंसे निपटकर ब्रह्मनिष्ठ अथवा आत्मनिष्ठ होनेके

दूसरा अध्याय ६३९ यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके । तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ ४६ ॥ । विषयमें यहां उपदेश किया गया है। किंतु इस बातपर फिरभी ध्यान देना । चाहिये, कि आत्मनिष्ठ होनेका अर्थ सब कर्मोंको स्वरूपतः एकदम छोड़ देना । नहीं है। ऊपरके श्लोकमें वैदिक काम्य कर्मोंकी जो निंदा की गई है, या जो । न्यूनता दिखलाई गई है, वह कर्मोंकी नहीं; बल्कि उन कर्मोंके विषयमें जो । काम्य-बुद्धि होती है, उसकी है। यदि यह काम्य-बुद्धि मनमें न हो, तो फिर । यज्ञयाग किसीभी प्रकारसे मोक्षके लिये प्रतिबंधक नहीं होते (गीतार. पृ. २९५- । २९७) । आगे अठारहवें अध्यायके आरंभमें भगवानने अपना यह निश्चित । और उत्तम मत बतलाया है, कि मीमांसकोंके इन्हीं यज्ञयाग आदि कर्मोंको । फलाशा और संग छोड़कर चित्तकी शुद्धि और लोकसंग्रहके लिये अवश्य करना । चाहिये (गीता १८. ६) ) । गीताकी इन दो स्थानोंकी बातोंको एकत्र करनेसे । यह प्रकट हो जाता है, कि इस अध्यायके श्लोकमें मीमांसकोंके कर्मकांडकी जो । न्यूनता दिखलाई गई है, वह उसकी काम्य-बुद्धिको उद्देश्य करके है, केवल । क्रियाके लिये नहीं है। इसी अभिप्रायको मनमें लाकर भागवतमेंभी कहा है :- वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसंगोऽर्पितमीश्वरे । नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्था फलश्रुतिः ॥ । वेदोक्त कर्मोंकी वेदमें जो फलश्रुति कही गयी है, वह रोचनार्थ है अर्थात् । इसीलिये है, कि कर्ताको ये कर्म अच्छे लगें । अतएव इन कर्मोंको उस फल-प्राप्तिके । लिये न करें, किंतु निःसंग-बुद्धिसे अर्थात् फलकी आशा छोड़कर ईश्वरार्पण-बुद्धिसे । करें; जो पुरुष ऐसा करता है, उसे नैष्कर्म्यसे प्राप्त होनेवाली सिद्धि मिलती । है” (भाग. ११. ३. ४६) । सारांश, यद्यपि, वेदोंमें कहा है, कि अमुक अमुक । कारणोंके निमित्त यज्ञ करें, तथापि उसमें न भूलकर केवल इसीलिये यज्ञ करें । कि वे यष्टव्य हैं। अर्थात् यज्ञ करना हमारा कर्तव्य है; काम्य-बुद्धिको तो छोड़ । दें, पर यज्ञको न छोड़ें (गीता १५. ११) ; और उसी प्रकार अन्यान्य कर्मभी । किया करें - यह गीताके उपदेशका सार है; और यही अर्थ अगले श्लोकमें । व्यक्त किया गया है । ] (४६) चारों ओर पानीकी बाढ आ जाने पर कुएँका जितना अर्थ या प्रयोजन रह जाता है (अर्थात् कुछभी काम नहीं रहता), उतनाही प्रयोजन ज्ञान-प्राप्त ब्राह्मणको सब (कर्मकांडात्मक) वेदका रहता है (अर्थात् सिर्फ काम्य-कर्मरूपी वैदिक कर्मकांडकी उसे कुछ आवश्यकता नहीं रहती। । [इस श्लोकके फलितार्थके संबंधमें मतभेद नहीं है। पर टीकाकारोंने

६४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उसके शब्दोंकी नाहक खींचातानी की है। 'सर्वतः सम्प्लुतोदके' यह सप्तम्यन्त सामासिक पद है। परंतु इसे निरी सप्तमी या उदपानका विशेषणभी न समझ कर 'सति सप्तमी' मान लेनेसे, "सर्वतः सम्प्लुतोदके सति उदपाने यावानर्थः (न स्वल्पमपि प्रयोजनं विद्यते) तावान् विजानतः ब्राह्मणस्य सर्वेषु वेदेषुः अर्थः" इस प्रकार किसीभी बाहरके पदको अध्याहृत मानना नहीं पड़ता, सरल अन्वय लग जाता है, और उसका यह सरल अर्थभी हो जाता है, कि "चारों ओर पानीही पानी होनेपर (पीनेके लिये कहींभी बिना प्रयत्नके यथेष्ट पानी मिलने लगनेपर) जिस प्रकार कुएँको कोईभी नहीं पूछता, उसी प्रकार ज्ञान- प्राप्त पुरुषको यज्ञ-याग आदि केवल वैदिक कर्मका कुछभी उपयोग नहीं रहता।" क्योंकि, वैदिक कर्म केवल स्वर्ग-प्राप्तिके लियेही नहीं, बल्कि अंतमें मोक्षसाधक ज्ञान-प्राप्तिके लिये करना होता है; और इस पुरुषको तो ज्ञान-प्राप्ति पहलेही हो जाती है. इस कारण उसे वैदिक कर्म करके कोई नई वस्तु पानेके लिये शेष रह नहीं जाती। इसी हेतुसे, आगे तीसरे अध्यायमें (गीता ३. १७) कहा है, कि "जो ज्ञानी हो गया, उसे इस जगत्‌मे कर्तव्य शेष नहीं रहता।" बड़े भारी तालाब या नदी पर अनायासही, जितना चाहिये उतना, निर्मल पानी पीनेकी सुविधा होनेपर कुएँकी ओर कौन झाँकेगा? ऐसे समय कोईभी कुएँकी अपेक्षा नहीं रखता। सनत्सुजातीयके अंतिम अध्यायमें (मभा. उद्योग. ४५. २६) यही श्लोक कुछ थोड़े-से शब्दोंके हेरफेरसे आया है। माधवाचार्यने इस श्लोककी टीकामें वैसाही अर्थ किया है, जैसा कि हमने ऊपर किया है; एवं शुकानुप्रश्नमें ज्ञान और कर्मके तारतम्यका विवेचन करते समय साफ़ कह दिया है- "न ते (ज्ञानिनः) कर्म प्रशमन्ति कूपं नद्यां पिबन्निव" - नदीपर जिसे पानी मिलता है, वह जिस प्रकार कुएँकी परवाह नहीं करता उसी प्रकार 'ते' अर्थात् ज्ञानी पुरुष कर्मकी कुछ परवाह नहीं करते (मभा. शां. २४०. १०)। ऐसेही पांडव- गीताके सतहवे श्लोकमें कुएँका दृष्टान्त यों दिया है- जो वासुदेवको छोड़कर दूसरे देवताकी उपासना करता है, वह- "तृषितो जाह्नवीतीरे कूपं वाञ्छति दुर्मतिः" - भागीरथी तटपर पीनेके लिये पानी मिलने परभी, कुएँ की इच्छा करनेवाले प्यासे पुरुषके समान मूर्ख है। यह दृष्टान्त केवल वैदिक ग्रंथोमेंही नहीं है, प्रत्युत पालिके बौद्ध ग्रंथोंमेंभी उसके प्रयोग है। यह सिद्धान्त बौद्ध धर्मकोभी मान्य है, कि जिस पुरुषने अपनी तृष्णा समूल नष्ट कर डाली हो उसे आगे और कुछ प्राप्त करनेके लिये नहीं रह जाता; और इस सिद्धान्तको बतलाते हुए उदान नामक पाली ग्रंथके (७. ९) इस श्लोकमें यह दृष्टान्त दिया है- "कि कयिरा उदपानेन आपा चे सव्वदा सियुम" - सर्वदा पानी मिलने योग्य हो जानेमे कुएँको लेकर क्या करना है? आजकल बड़े-बड़े शहरोंमें यह देखाभी जाता है, कि घरमें नल हो जानेसे फिर कोई कुएँकी परवाह नही करता। इससे और विशेष कर

दूसरा अध्याय ६४१ § § कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥ | शुकानुप्रश्नके विवेचनसे गीताके दृष्टान्तका स्वारस्य ज्ञात हो जायगा; और | यह दीख पड़ेगा, कि हमने इस श्लोकका ऊपर जो अर्थ किया है, वही सरल और | ठीक है। परंतु, चाहे इस कारणसे हो, कि ऐसे अर्थसे वेदोंमें कुछ गौणता आ जाती | है; अथवा इस सांप्रदायिक सिद्धान्तकी ओर दृष्टि देनेसे हो, कि ज्ञानमेंही समस्त | कर्मोंका समावेश रहनेके कारण ज्ञानीको कर्म करनेकी ज़रूरत नहीं। गीताके | टीकाकार इस श्लोकके पदोंका अन्वय कुछ निराले ढंगसे लगाते हैं। वे इस | श्लोकके पहले चरणमें 'तावान्' और दूसरे चरणमें 'यावान्' पदोंको अध्याहृत | मानकर ऐसा अर्थ लगाते हैं - "उदपाने यावानर्थः तावानेव सर्वतः सम्प्लुतोदके | यथा सम्पद्यते तथा यावान् सर्वेषु वेदेषु अर्थः तावान् विजानतः ब्राह्मणस्य | सम्पद्यते" - अर्थात् स्नान-पान आदि कर्मोंके लिये कुएँका जितना उपयोग | होता है, उतनाही बड़े तालाबकाभी (सर्वतः सम्प्लुतोदके) हो सकता है; | उसी प्रकार वेदोंका जितनाभी उपयोग है, उतना सब, ज्ञानी पुरुषको | ज्ञानसे हो सकता है। परंतु इस अन्वयमें पहली श्लोकपंक्तिमें 'तावान्' और | दूसरी पंक्तिमें 'यावान्' इन दो पदोंके अध्याहार कर लेनेकी आवश्यकता पड़नेके | कारण, हमने इस अन्वय और अर्थको स्वीकृत नहीं किया। हमारा अन्वय | और अर्थ किसीभी पदके, अध्याहार किये बिनाही लग जाता है; और पूर्वके | श्लोकसे सिद्ध होता है, कि उसमें प्रतिपादित वेदोंके कोरे अर्थात् ज्ञानव्यतिरिक्त | कर्मकांडका गौणत्वही इस स्थलपर विवक्षित है। अब ज्ञानी पुरुषको यज्ञयाग | आदि कर्मोंकी कोई आवश्यकता न रह जानेसे, कुछ लोग जो यह अनुमान किया | करते हैं, कि इन कर्मोंको ज्ञानी पुरुष न करे, बिलकुल छोड़ दे - यह बात गीताको | संमत नहीं है। क्योंकि, यद्यपि इन कर्मोंका फल ज्ञानी पुरुषको अभीष्ट नहीं | होता, तथापि फलके लिये न सही; तोभी यज्ञयाग आदि कर्मोंको, अपना शास्त्र- | विहित कर्तव्य समझकर, वह कभी छोड़ नहीं सकता - अठारहवें अध्यायमें | भगवान्ने अपना निश्चित मत स्पष्ट कह दिया है, कि फलाशा न रहे, तोभी | अन्यान्य निष्काम कर्मोंके समान यज्ञयाग आदि कर्मभी ज्ञानी पुरुषको निःसंग- | बुद्धिसे करनेही चाहिये (पिछले श्लोकपर और गीता ३. १९ पर हमारी जो | टिप्पणी है, उसे देखो)। यही निष्कामविषयक अर्थ अब अगले श्लोकमें व्यक्त | कर दिखलाते हैं - ] (४७) कर्म करने मात्रका तेरा अधिकार है; फल (मिलना या न मिलना) कभीभी तेरे अधिकार अर्थात् ताबेमें नहीं; (इसलिये मेरे कर्मका) गी. र. ४१