भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 679

६३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः । येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ ३५ ॥ अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः । निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥ ३६ ॥ हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् । तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥ ३७ ॥ सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥ ३८ ॥ | अपेक्षा यह अर्थ संक्षेपमें है; और गीता-ग्रंथका प्रचारभी अधिक है, इस कारण | गीताके 'संभावितस्य०' इत्यादि वाक्यका कहावतका-सा उपयोग होने लगा है । | गीताके और बहुतेरे श्लोकभी इसीके समान सर्वसाधारण लोगोंमें प्रचलित हो | गये हैं। अब दुष्कीर्तिका स्वरूप बतलाते हैं - ] ( ३५ ) ( सब ) महारथी समझेंगे, कि तू डरकर रणसे भाग गया; और जिन्हें ( आज ) तू बहुमान्य हो रहा है, वेही तेरी योग्यता कम समझने लगेंगे । ( ३६ ) ऐसेही तेरी सामर्थ्यकी निंदा कर, तेरे शत्रु ऐसी ऐसी अनेक बातें ( तेरे विषयमें ) कहेंगे, जो न कहनी चाहिये । इससे अधिक दुःखकारक और हैही क्या ? ( ३७ ) मर जायगा, तो स्वर्गको जावेगा, और जीतेगा तो पृथिवी ( का राज्य ) भोगेगा ! इसलिये हे अर्जुन ! युद्धका निश्चय करके उठ ! | [ उल्लिखित विवेचनसे न केवल यही सिद्ध हुआ, कि सांख्य-ज्ञानके | अनुसार मरने-मारनेका शोक न करना चाहिये, प्रत्युत यहभी सिद्ध हो गया, | कि स्वधर्मके अनुसार युद्ध करनाही कर्तव्य है । तोभी अब इस शंकाका उत्तर | दिया जाता है, कि लड़ाईमें होनेवाली हत्याका 'पाप' कर्ताको लगता है या | नहीं । वास्तवमें इस उत्तरकी युक्तियाँ कर्मयोग-मार्गकी हैं, इसलिये उस मार्गकी | प्रस्तावना यहीं हुई है । ] ( ३८ ) सुख-दुःख, लाभ-नुकसान और जय-पराजयको एकसा मानकर फिर युद्धमें लग जा । ऐसा करनेसे तुझे ( कोईभी ) पाप लगनेका नहीं । | [ संसारमें आयु बितानेके दो मार्ग हैं - एक सांख्य और दूसरा योग । | इनमेंसे जिस सांख्य अथवा संन्यास-मार्गके आचारको ध्यानमें लाकर अर्जुन | युद्ध छोड़ भिक्षा माँगनेके लिये तैयार हुआ था, उस संन्यास-मार्गके तत्त्वज्ञाना- | नुसारही आत्माका या देहका शोक करना उचित नहीं है । भगवानने अर्जुनको | सिद्ध कर दिखलाया है, कि सुख और दुःखोंको सम-बुद्धिसे सह लेना चाहिये,