श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ६३३ § § स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ ३१ ॥ यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ ३२ ॥ अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ ३३ ॥ अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् । सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥ ३४ ॥ | धर्माधर्म-विवेक है और गीताका वास्तविक प्रतिपाद्य विषयभी यही है। इसीसे | जो चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था सांख्य-मार्गकोभी संमत है, उसके अनुसारभी अब प्रथम | युद्ध करना क्षत्रियोंका कर्तव्य है, इसलिये भगवान् कहते हैं, कि तू मरने- | मारनेका शोक मत कर; इतनाही नही, बल्कि लड़ाईमें मरना या मार डालना, | ये दोनो बातें क्षत्रियधर्मके अनुसार तुझको आवश्यकही हैं -] (३१) इसके सिवा स्वधर्मकी ओर देखें, तोभी (इस समय) हिम्मत हारना तुझे उचित नही है। क्योंकि धर्मोचित युद्धकी अपेक्षा क्षत्रियको श्रेयस्कर और कुछ हैही नही। | [स्वधर्मकी यह उपपत्ति आगेभी दो बार (गीता ३.३५; १८.४७) | बतलाई गई है। संन्यास अथवा सांख्य-मार्गके अनुसार यद्यपि कर्मसंन्यासरूपी | चतुर्थ आश्रम अंतकी सीढ़ी है, तोभी मनु आदि सभी स्मृति-कर्ताओंका कथन | है, कि उसके पहिले चातुर्वर्ण्यकी व्यवस्थाके अनुसार ब्राह्मणको ब्राह्मण-धर्म और | क्षत्रियको क्षत्रिय-धर्मका पालन कर गृहस्थाश्रम पूरा करना चाहिये, अतएव | इस श्लोकका और आगेके श्लोकका तात्पर्य यह है, कि गृहस्थाश्रमी अर्जुनको | युद्ध करना आवश्यक है।] (३२) और हे पार्थ ! यह युद्ध आपही आप खुला हुआ स्वर्गका द्वारही है; ऐसा युद्ध भाग्यवान् क्षत्रियोंहीको मिला करता है। (३३) अतएव यदि तू (अपने) धर्मके अनुकूल यह युद्ध न करेगा, तो स्वधर्म और कीर्ति खोकर पाप बटोरेगा; (३४) यही नहीं, बल्कि (सब) लोग तेरी अक्षय्य दुष्कीर्ति गाते रहेंगे ! और अपयश तो संभावित पुरुषके लिये मृत्युसेभी बढ़कर है। | [श्रीकृष्णने यही तत्त्व उद्योगपर्वमें युधिष्ठिरकोभी बतलाया है (महा. | उ. ७२. २४)। वहाँ यह श्लोक है- "कुलीनस्य च या निंदा वधो वाऽमित्र- | कर्षणम् । महागुणो वधो राजन् न तु निंदा कुजीविका ॥" परंतु गीतामें उसकी