श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ ३० ॥ देखता है, कोई आश्चर्यसरीखा इसका वर्णन करता है; और कोई मानो आश्चर्य समझकर सुनता है। परंतु (इस प्रकार देखकर अन्य वर्णन और) सुनकरभी (इनमेंसे), कोई इसे (तत्त्वतः) नही जानता है। [अपूर्व वस्तु समझकर बड़े-बड़े लोग आश्चर्यसे आत्माके विषयमें कितनाही विचार क्यों न करें, पर उसके सच्चे स्वरूपको जाननेवाले लोग बहुतही थोड़े हैं, इसीसे बहुतेरे लोग मृत्युके विषयमें शोक किया करते हैं। इससे तू ऐसा न करके, पूर्ण विचारमे आत्मस्वरूपको यथार्थ रीतिपर समझ ले और शोक करना छोड़दे यही इसका अर्थ है। कठोपनिषद (कठ. २. ७) में इसी ढंगका आत्माका वर्णन है।] (३०) सबके शरीरमें (रहनेवाला) शरीरका स्वामी (आत्मा) सर्वदा अवध्य अर्थात् कभीभी वध न किया जानेवाला है; अतएव हे भारत (अर्जुन)! सब अर्थात् किसीभी प्राणीके विषयमें शोक करना तुझे उचित नहीं है। [अब तक यह सिद्ध किया गया, कि सांख्य या संन्यास-मार्गके तत्त्वज्ञाना- नुसार आत्मा अमर है और देह तो स्वभावसेही अनित्य है, इस कारण कोई मरे या मारे, उसमें 'शोक' करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, परंतु यदि कोई इससे यह अनुमान कर ले, कि कोई किसीको मारे तो उसमेंभी 'पाप' नहीं, तो वह भयंकर भूल होगी। मरना या मारना, इन दो शब्दोंके अर्थोका यह पृथक्करण है, मरने या मारनेमें जो डर लगता है, उसे पहले दूर करनेके लियेही यह ज्ञान बतलाया है। मनुष्य तो आत्मा और देहका समुच्चय है। इनमें आत्मा अमर है, इसलिये मरना या मारना ये दोनों शब्द उसे उपयुक्त नहीं होते। बाकी रह गई देह; वहभी स्वभावसेही अनित्य है, इसलिये यदि उसका नाश हो जाय, तो शोक करने योग्य कुछ है नहीं। परंतु यदृच्छा या कालकी गतिसे कोई मर जाय, या किसीको कोई मार डाले, तो उसका सुख-दुःख न मानकर शोक करना छोड़ दें; तोभी इस प्रश्नका निपटारा नही हो जाता, कि युद्ध जैसा घोर कर्म करनेके लिये, जानबूझकर, प्रवृत्त होकर लोगोंके शरीरोंका नाश हम क्यों करें? क्योंकि, देह यद्यपि अनित्य है, तथापि आत्माका पक्का कल्याण या मोक्ष संपादन कर देनेके लिये देही तो एकमात्र साधन है, अतएव आत्महत्या करना अथवा बिना योग्य कारणोंके किसी दूसरेको मार डालना, ये दोनों शास्त्रानुसार घोर पातकही है। इसलिये मरे हुएका शोक करना यद्यपि उचित नहीं है, तोभी इसका कुछ-न-कुछ प्रवल कारण बतलाना आवश्यक है, कि एक दूसरेको क्यों मारे। इसीका नाम