श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ६३१ § § अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिवेदना ॥ २८ ॥ § § आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः । आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ २९ ॥ है, और जो मरता है, उसका जन्म निश्चित है; इसलिये ( इम ) अपरिहार्य बातका ( ऊपर उल्लिखित तेरे मतके अनुसारभी ) शोक करना तुझको उचित नहीं। । [ स्मरण रहे, कि ऊपरके दो श्लोकोंमें बतलाई हुई उपपत्ति सिद्धान्त- | पक्षकी नहीं है; यह ' अथ च = अथवा ' शब्दसे बीचमेंही उपस्थित किये हुए पूर्व | पक्षका उत्तर है । आत्माको नित्य मानो चाहे अनित्य; दिखलाना इतनाही है, | कि दोनोंभी पक्षोंमें शोक करनेका प्रयोजन नहीं है । गीताका यह सच्चा सिद्धान्त | पहलेही बतला चुके हैं, कि आत्मा सत्, नित्य, अज, अविकार्य और अचिंत्य या | निर्गुण है । अस्तु; देह अनित्य है, अतएव शोक करना उचित नहीं; इसीका, | सांख्यशास्त्रके अनुसार, दूसरी उपपत्ति बतलाते हैं— ] ( २८ ) सब भूत आरंभमें अव्यक्त, मध्यमें व्यक्त और मरणसमयमें फिर अव्यक्त होते हैं; ( ऐसी यदि सभीकी स्थिति है ) तो हे भारत ! उसमें शोक किस बात का ? । [ 'अव्यक्त' शब्दकाही अर्थ है :—“ इंद्रियोंको गोचर न होनेवाला ”। मूल | एक अव्यक्त द्रव्यसेही आगे क्रमक्रमसे समस्त व्यक्त सृष्टि निर्मित होती है; और | अंतमें अर्थात् प्रलय-कालमें सब व्यक्त सृष्टिका फिर अव्यक्तमेंही लय हो जाता है | ( गीता ८. १८ ); इस सांख्य-सिद्धान्तका अनुसरण कर, इस श्लोककी दलीलें हैं । | सांख्य-मतवालोंके इस सिद्धान्तका स्पष्टीकरण गीतारहस्यके सातवें और आठवें | प्रकरणमें किया गया है । किसीभी पदार्थकी व्यक्त स्थिति यदि इस प्रकार कभी | न कभी नष्ट होनेवाली है, तो जो व्यक्त स्वरूप निसर्गसेही नाशवान् है, उसके | विषयमें शोक करनेकी कोई आवश्यकताही नहीं । यही श्लोक 'अव्यक्त'के बदले | 'अभाव' शब्दसे संयुक्त होकर महाभारतके स्त्रीपर्वमें ( महा. स्त्री. २. ६ ) आया | है । और आगे “ अदर्शनादापतिताः पुनश्चादर्शनं गताः । न ते तव न तेषां त्वं तत्र | का परिवेदना । ” ( स्त्री २. १३ ) इस श्लोकमें 'अदर्शन' अर्थात् “ नजरसे दूर हो | जाना ” इस शब्दकाभी मृत्युको उद्देश्यकर उपयोग किया गया है । सांख्य और | वेदान्त, दोनों शास्त्रोंके अनुसार शोक करना यदि व्यर्थ सिद्ध होता है, और आत्मा- | को अनित्य माननेसेभी यदि यही बात सिद्ध होती है, तो फिर लोग मृत्युके विषयमें | शोक क्यों करते हैं ? आत्मस्वरूपसंबंधी अज्ञानही इसका उत्तर है । क्योंकि —] ( २९ ) कोई तो मानो आश्चर्य ( अद्भुत वस्तु ) समझकर इसकी ओर