भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 675

६३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ २४ ॥ अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते । तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ २५ ॥ § § अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । तथापि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि ॥ २६ ॥ जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २७ ॥ [ वस्त्रकी यह उपमा प्रचलित है । महाभारतमें एक स्थानपर, एक घर (शाला) छोड़कर दूसरे घरमें जानेका दृष्टान्त पाया जाता है (शां. १५, १६) ; और एक अमेरिकन ग्रंथकारने यही कल्पना पुस्तकको नई जिल्द बाँधनेका दृष्टान्त देकर व्यक्त की है । पिछले तेरहवें श्लोकमें बालपन, जवानी और बुढ़ापा, इन तीन अवस्थाओंको जो न्याय उपयुक्त किया गया है, वही अब सब शरीरके विषयमें किया गया है । ] (२४) (कभीभी) न कटनेवाला, न जलनेवाला, न भीगनेवाला और न सूखनेवाला यह (आत्मा) नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन अर्थात् चिरंतन है । (२५) इस आत्माकोही, अव्यक्त अर्थात् जो इंद्रियोंको गोचर न होनेवाला, अचिंत्य अर्थात् जो मनसेभी जाना नहीं जा सकता और अविकार्य अर्थात् जिसे किसीभी विकारकी उपाधि नहीं है, कहते हैं। इसलिये उसे (आत्माको) इस प्रकारका समझकर उसका शोक करना तुझे उचित नहीं है । [यह वर्णन उपनिषदोंसे लिया है। यह वर्णन निर्गुण आत्माका है, सगुणका नहीं । क्योंकि अविकार्य या अचिंत्य विशेषण सगुणको लग नहीं सकते (गीतारहस्य प्र. ९ देखो) । आत्माके विषयमें वेदान्तशास्त्रका जो अंतिम सिद्धान्त है, उसके आधारसे शोक न करनेके लिये यह उपपत्ति बतलाई गई है । अब कदाचित् कोई ऐसा पूर्वपक्ष करे, कि हम आत्माको नित्य नही समझते, इसलिये तुम्हारी उपपत्ति हमें ग्राह्य नहीं; तो इस पूर्वपक्षका प्रथम उल्लेख करके भगवान् उसका यह उत्तर देते हैं कि :-] (२६) अथवा, यदि तू ऐसा मानता हो, कि यह आत्मा (नित्य नहीं, शरीरके साथही) सदा जन्मता या सदा मरता है, तोभी हे महाबाहु ! उसका शोक करना तुझे उचित नहीं । (२७) क्योंकि जो जन्मता है, उसकी मृत्यु निश्चित