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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

६३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ ३० ॥ देखता है, कोई आश्चर्यसरीखा इसका वर्णन करता है; और कोई मानो आश्चर्य समझकर सुनता है। परंतु (इस प्रकार देखकर अन्य वर्णन और) सुनकरभी (इनमेंसे), कोई इसे (तत्त्वतः) नही जानता है। [अपूर्व वस्तु समझकर बड़े-बड़े लोग आश्चर्यसे आत्माके विषयमें कितनाही विचार क्यों न करें, पर उसके सच्चे स्वरूपको जाननेवाले लोग बहुतही थोड़े हैं, इसीसे बहुतेरे लोग मृत्युके विषयमें शोक किया करते हैं। इससे तू ऐसा न करके, पूर्ण विचारमे आत्मस्वरूपको यथार्थ रीतिपर समझ ले और शोक करना छोड़दे यही इसका अर्थ है। कठोपनिषद (कठ. २. ७) में इसी ढंगका आत्माका वर्णन है।] (३०) सबके शरीरमें (रहनेवाला) शरीरका स्वामी (आत्मा) सर्वदा अवध्य अर्थात् कभीभी वध न किया जानेवाला है; अतएव हे भारत (अर्जुन)! सब अर्थात् किसीभी प्राणीके विषयमें शोक करना तुझे उचित नहीं है। [अब तक यह सिद्ध किया गया, कि सांख्य या संन्यास-मार्गके तत्त्वज्ञाना- नुसार आत्मा अमर है और देह तो स्वभावसेही अनित्य है, इस कारण कोई मरे या मारे, उसमें 'शोक' करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, परंतु यदि कोई इससे यह अनुमान कर ले, कि कोई किसीको मारे तो उसमेंभी 'पाप' नहीं, तो वह भयंकर भूल होगी। मरना या मारना, इन दो शब्दोंके अर्थोका यह पृथक्करण है, मरने या मारनेमें जो डर लगता है, उसे पहले दूर करनेके लियेही यह ज्ञान बतलाया है। मनुष्य तो आत्मा और देहका समुच्चय है। इनमें आत्मा अमर है, इसलिये मरना या मारना ये दोनों शब्द उसे उपयुक्त नहीं होते। बाकी रह गई देह; वहभी स्वभावसेही अनित्य है, इसलिये यदि उसका नाश हो जाय, तो शोक करने योग्य कुछ है नहीं। परंतु यदृच्छा या कालकी गतिसे कोई मर जाय, या किसीको कोई मार डाले, तो उसका सुख-दुःख न मानकर शोक करना छोड़ दें; तोभी इस प्रश्नका निपटारा नही हो जाता, कि युद्ध जैसा घोर कर्म करनेके लिये, जानबूझकर, प्रवृत्त होकर लोगोंके शरीरोंका नाश हम क्यों करें? क्योंकि, देह यद्यपि अनित्य है, तथापि आत्माका पक्का कल्याण या मोक्ष संपादन कर देनेके लिये देही तो एकमात्र साधन है, अतएव आत्महत्या करना अथवा बिना योग्य कारणोंके किसी दूसरेको मार डालना, ये दोनों शास्त्रानुसार घोर पातकही है। इसलिये मरे हुएका शोक करना यद्यपि उचित नहीं है, तोभी इसका कुछ-न-कुछ प्रवल कारण बतलाना आवश्यक है, कि एक दूसरेको क्यों मारे। इसीका नाम

दूसरा अध्याय ६३३ § § स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ ३१ ॥ यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ ३२ ॥ अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ ३३ ॥ अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् । सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥ ३४ ॥ | धर्माधर्म-विवेक है और गीताका वास्तविक प्रतिपाद्य विषयभी यही है। इसीसे | जो चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था सांख्य-मार्गकोभी संमत है, उसके अनुसारभी अब प्रथम | युद्ध करना क्षत्रियोंका कर्तव्य है, इसलिये भगवान् कहते हैं, कि तू मरने- | मारनेका शोक मत कर; इतनाही नही, बल्कि लड़ाईमें मरना या मार डालना, | ये दोनो बातें क्षत्रियधर्मके अनुसार तुझको आवश्यकही हैं -] (३१) इसके सिवा स्वधर्मकी ओर देखें, तोभी (इस समय) हिम्मत हारना तुझे उचित नही है। क्योंकि धर्मोचित युद्धकी अपेक्षा क्षत्रियको श्रेयस्कर और कुछ हैही नही। | [स्वधर्मकी यह उपपत्ति आगेभी दो बार (गीता ३.३५; १८.४७) | बतलाई गई है। संन्यास अथवा सांख्य-मार्गके अनुसार यद्यपि कर्मसंन्यासरूपी | चतुर्थ आश्रम अंतकी सीढ़ी है, तोभी मनु आदि सभी स्मृति-कर्ताओंका कथन | है, कि उसके पहिले चातुर्वर्ण्यकी व्यवस्थाके अनुसार ब्राह्मणको ब्राह्मण-धर्म और | क्षत्रियको क्षत्रिय-धर्मका पालन कर गृहस्थाश्रम पूरा करना चाहिये, अतएव | इस श्लोकका और आगेके श्लोकका तात्पर्य यह है, कि गृहस्थाश्रमी अर्जुनको | युद्ध करना आवश्यक है।] (३२) और हे पार्थ ! यह युद्ध आपही आप खुला हुआ स्वर्गका द्वारही है; ऐसा युद्ध भाग्यवान् क्षत्रियोंहीको मिला करता है। (३३) अतएव यदि तू (अपने) धर्मके अनुकूल यह युद्ध न करेगा, तो स्वधर्म और कीर्ति खोकर पाप बटोरेगा; (३४) यही नहीं, बल्कि (सब) लोग तेरी अक्षय्य दुष्कीर्ति गाते रहेंगे ! और अपयश तो संभावित पुरुषके लिये मृत्युसेभी बढ़कर है। | [श्रीकृष्णने यही तत्त्व उद्योगपर्वमें युधिष्ठिरकोभी बतलाया है (महा. | उ. ७२. २४)। वहाँ यह श्लोक है- "कुलीनस्य च या निंदा वधो वाऽमित्र- | कर्षणम् । महागुणो वधो राजन् न तु निंदा कुजीविका ॥" परंतु गीतामें उसकी

६३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः । येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ ३५ ॥ अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः । निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥ ३६ ॥ हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् । तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥ ३७ ॥ सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥ ३८ ॥ | अपेक्षा यह अर्थ संक्षेपमें है; और गीता-ग्रंथका प्रचारभी अधिक है, इस कारण | गीताके 'संभावितस्य०' इत्यादि वाक्यका कहावतका-सा उपयोग होने लगा है । | गीताके और बहुतेरे श्लोकभी इसीके समान सर्वसाधारण लोगोंमें प्रचलित हो | गये हैं। अब दुष्कीर्तिका स्वरूप बतलाते हैं - ] ( ३५ ) ( सब ) महारथी समझेंगे, कि तू डरकर रणसे भाग गया; और जिन्हें ( आज ) तू बहुमान्य हो रहा है, वेही तेरी योग्यता कम समझने लगेंगे । ( ३६ ) ऐसेही तेरी सामर्थ्यकी निंदा कर, तेरे शत्रु ऐसी ऐसी अनेक बातें ( तेरे विषयमें ) कहेंगे, जो न कहनी चाहिये । इससे अधिक दुःखकारक और हैही क्या ? ( ३७ ) मर जायगा, तो स्वर्गको जावेगा, और जीतेगा तो पृथिवी ( का राज्य ) भोगेगा ! इसलिये हे अर्जुन ! युद्धका निश्चय करके उठ ! | [ उल्लिखित विवेचनसे न केवल यही सिद्ध हुआ, कि सांख्य-ज्ञानके | अनुसार मरने-मारनेका शोक न करना चाहिये, प्रत्युत यहभी सिद्ध हो गया, | कि स्वधर्मके अनुसार युद्ध करनाही कर्तव्य है । तोभी अब इस शंकाका उत्तर | दिया जाता है, कि लड़ाईमें होनेवाली हत्याका 'पाप' कर्ताको लगता है या | नहीं । वास्तवमें इस उत्तरकी युक्तियाँ कर्मयोग-मार्गकी हैं, इसलिये उस मार्गकी | प्रस्तावना यहीं हुई है । ] ( ३८ ) सुख-दुःख, लाभ-नुकसान और जय-पराजयको एकसा मानकर फिर युद्धमें लग जा । ऐसा करनेसे तुझे ( कोईभी ) पाप लगनेका नहीं । | [ संसारमें आयु बितानेके दो मार्ग हैं - एक सांख्य और दूसरा योग । | इनमेंसे जिस सांख्य अथवा संन्यास-मार्गके आचारको ध्यानमें लाकर अर्जुन | युद्ध छोड़ भिक्षा माँगनेके लिये तैयार हुआ था, उस संन्यास-मार्गके तत्त्वज्ञाना- | नुसारही आत्माका या देहका शोक करना उचित नहीं है । भगवानने अर्जुनको | सिद्ध कर दिखलाया है, कि सुख और दुःखोंको सम-बुद्धिसे सह लेना चाहिये,

दूसरा अध्याय ६३५ § § एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु। बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥ ३९ ॥ § § नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ ४० ॥ | एवं स्वधर्मकी ओर ध्यान देकर युद्ध करनाही क्षत्रियको उचित है, तथा सम- | बुद्धिसे युद्ध करनेमें कोईभी पाप नहीं लगता । परंतु इस मार्गका ( सांख्य ) | मत है, कि कभी-न-कभी संसार छोड़कर संन्यास ले लेनाही प्रत्येक मनुष्यका | इस जगतमें परम कर्तव्य है, इसलिये दृष्ट जान पड़े तो अभीही युद्ध छोड़कर | संन्यास क्यों न ले लें; अथवा स्वधर्मपालनही क्यों करें ? इत्यादि शंकाओंका | निवारण सांख्य-ज्ञानसे नहीं होता; और इसीसे यह कह सकते हैं, कि अर्जुनका | मूल आक्षेप ज्यों का त्यों बना रहता है । अतएव अब भगवान् कहते हैं - ] ( ३९ ) सांख्य अर्थात् संन्यास-निष्ठाके अनुसार तुझे यह बुद्धि अर्थात् ज्ञान या उपपत्ति बतलाई । अब जिस बुद्धिसे युक्त होनेपर ( कर्मोंके न छोड़ने परभी ) हे पार्थ ! तू कर्मबंध छोड़ेगा, ऐसी यह (कर्म)-योगकी बुद्धि अर्थात् ज्ञान ( तुझे बतलाता हूँ ) सुन ! | [ भगवद्गीताका रहस्य समझनेके लिये यह श्लोक अत्यंत महत्त्वका है । | सांख्य शब्दसे कपिलका सांख्य या निरा वेदान्त, और योग शब्दसे पातंजल- | योग यहाँपर उद्दिष्ट नहीं है; सांख्यसे संन्यास-मार्ग और योगसे कर्म-मार्गहीका | अर्थ यहाँपर लेना चाहिये । गीताके ( ३. ३) श्लोकसे प्रकट यह है, कि ये दोनों | मार्गस्वतंत्र हैं, इनके अनुयायियोंकोभी क्रमसे 'सांख्य' - संन्यास-मार्गी, और 'योग' | कर्मयोग-मार्गी कहते हैं ( गीता ५. ५ ) । इनमेंसे सांख्य-निष्ठावाले लोग कभी- | न-कभी अंतमें कर्मोंको सर्वथा छोड़ देनाही श्रेष्ठ मानते हैं; इसलिये इस मार्गके | तत्त्वज्ञानसे अर्जुनकी इस शंकाका पूरा पूरा समाधान नहीं होता, कि " युद्ध क्यों | करूँ ? " अतएव जिस कर्मयोग-निष्ठाका ऐसा मत है, कि संन्यास न लेकर ज्ञान- | प्राप्तिके पश्चातभी निष्काम बुद्धिसे सदैव कर्म करते रहनाही प्रत्येकका सच्चा | पुरुषार्थ है, उसी कर्मयोगका, अथवा संक्षेपमें योग-मार्गका, ज्ञान बतलाना अब | आरंभ किया गया है; और गीताके अंतिम अध्याय तक, अनेक कारण दिखलाते | हुए, अनेक शंकाओंका निवारण कर, इसी मार्गका, पुष्टीकरण किया गया है । | गीताके विषय-निरूपणका, स्वयं भगवानका किया हुआ, यह स्पष्टीकरण ध्यानमें | रखनेसे इस विषयमें कोई शंका रह नहीं जाती, कि कर्मयोगही गीतामें प्रतिपाद्य | है । कर्मयोगके मुख्य मुख्य सिद्धान्तोंका पहले निर्देश करते हैं - ] ( ४० ) यहाँ अर्थात् इस कर्मयोग-मार्गमें ( एक बार ) आरंभ किये हुए

६३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ ४१ ॥ कर्मका नाश नहीं होता और (आगे) विघ्नभी नही होते । इस धर्मका थोड़ा-साभी (आचरण) बड़े भयसे संरक्षण करता है। | [इस सिद्धान्तका महत्त्व गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमें (पृष्ठ २८६) | दिखलाया गया है; और अधिक स्पष्टीकरण आगे गीतामेंभी किया गया है | (गीता ६.४०-४६)। इसका यह अर्थ है, कि कर्मयोग-मार्गमें यदि एक जन्ममें | सिद्धि न मिले, तो किया हुआ कर्म व्यर्थ न जाकर अगले जन्ममें उपयोगी | होता है; और प्रत्येक जन्ममें इसकी बढ़ती होती है, एवं अंतमें कभी-न-कभी | सच्ची सद्गति मिलतीही है। अब कर्म-योगमार्गका दूसरा महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त | बतलाते है - ] (४१) हे कुरुनंदन, इस मार्गमें व्यवसाय-बुद्धि अर्थात् कार्य और अकार्यका निश्चय करनेवाली (इंद्रियरूपी) बुद्धि एक अर्थात् एकाग्र रखनी पड़ती है; क्योंकि जिनकी बुद्धिका (इस प्रकार एक) निश्चय नहीं होता, उनकी बुद्धि अर्थात् वासनाएं अनेक शाखाओंपे युक्त और अनंत (प्रकारकी) होती हैं। | [संस्कृतमें बुद्धि शब्दके अनेक अर्थ है । ३९ वें श्लोकमें यह शब्द-ज्ञानके | अर्थमें आया है; और आगे ४९ वें श्लोकमें इस 'बुद्धि' शब्दकाही "समझ, इच्छा, | वासना, या हेतु" अर्थ है। परंतु बुद्धि शब्दके पीछे 'व्यवसायात्मिका' विशेषण | है, इसलिये इस श्लोकके पूर्वार्धमें उसी शब्दका अर्थ यों होता है- व्यवसाय | अर्थात् कार्य-अकार्यका निश्चय करनेवाली बुद्धि-इंद्रिय (गीतार. प्र. ६, १३४- | १३९)। पहले इस बुद्धि-इंद्रियसे किसीभी बातका भला-बुरा विचार कर लेने | पर फिर तदनुसार कर्म करनेकी इच्छा या वासना मनमें हुआ करती है, अतएव | इस इच्छा या वासनाकोभी बुद्धिही कहते हैं; परंतु उस समय 'व्यवसायात्मिका' | यह विशेषण उसके पीछे नहीं लगाते। भेद दिखलाना आवश्यकही हो, तो | 'वासनात्मक' बुद्धि कहते है । इस श्लोकके दूसरे चरणमें सिर्फ 'बुद्धि' शब्द है, | उसके पीछे 'व्यवसायात्मका' यह विशेषण नहीं है, इसलिये बहुवचनान्त | 'बुद्धयः'से 'वासना, कल्पनातरंग' अर्थ होकर पूरे श्लोकका यह अर्थ होता है, कि | "जिसकी व्यवसायात्मका बुद्धि अर्थात निश्चय करनेवाली बुद्धि-इंद्रिय स्थिर | नहीं होती, उनके मनमें क्षण-क्षण में नई तरंगें या वासनाएं उत्पन्न हुआ करती | हैं।" बुद्धि शब्दके 'निश्चय करनेवाली इंद्रिय' या 'वासना' इन दोनों अर्थोंको | ध्यानमें रखे बिना कर्मयोगकी बुद्धिके विवेचनका मर्म भली भांति समझमें आनेका | नही। व्यवसायात्मका बुद्धिके स्थिर या एकाग्र न रहनेसे प्रतिदिन भिन्न भिन्न

दूसरा अध्याय ६३७ § § यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥ ४२ ॥ कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् । क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥ ४३ ॥ भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् । व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ ४४ ॥ | वासनाओमे मन व्यग्र हो जाता है; और मनुष्य ऐसी अनेक झंझटोंमें पड़ जाता | है, कि आज पुत्रप्राप्तिके लिये अमुक कर्म करो, तो कल स्वर्गकी प्राप्तिके लिये | अमुक कर्म करो। बस इसीका वर्णन अब करते हैं :- ) ( ४२ ) हे पार्थ ! ( कर्मकांडात्मक वेदोंके ( फलश्रुति-युक्त ) वाक्योंमें भूले हुए और यह कहनेवाले मूढ़ लोग कि, उनके अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं है, बढ़ा कर कहा करते हैं, कि - ( ४३ ) "अनेक प्रकारके ( यज्ञ-याग आदि ) कर्मोंसेही ( फिर ) जन्मरूप फल मिलता है, और ( जन्म-जन्मान्तरमें ) भोग तथा ऐश्वर्य मिलता है ; " - स्वर्गके पीछे पड़े हुए वे काम्य-बुद्धिवाले ( लोग ), ( ४४ ) उल्लिखित भाषणकी ओरही उनके मन आकर्षित हो जानेसे, भोग और ऐश्वर्यमेंही गर्क रहते हैं; इस कारण उनकी व्यवसायात्मका अर्थात् कार्य-अकार्यका निश्चय करनेवाली बुद्धि ( कभीभी ) समाधिस्थ अर्थात् एक स्थानमें स्थिर नहीं रह सकती । | [ ऊपरके तीनों श्लोकोंका मिलकर एकही वाक्य है; उसमें उन ज्ञान- | विरहित कर्मठ मीमांसा-मार्गवालोंका वर्णन है, जो श्रौत-स्मार्त कर्मकांडके अनुसार | आज अमुक हेतुकी सिद्धिके लिये, तो कल और किसी हेतुसे, सदैव स्वार्थके | लियेही, यज्ञ-याग आदि कर्म करनेमें निमग्न रहते हैं। यह वर्णन उपनिषदोंके | आधारपर किया गया है - उदाहरणार्थ, मुंडकोपनिषदमें कहा है - इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः । नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥ | " इष्टापूर्तही श्रेष्ठ है, दूसरा कुछभी श्रेष्ठ नहीं - यह माननेवाले मूढ़ | लोग स्वर्गमें पुण्यका उपभोग कर चुकनेपर फिर नीचेके इस मनुष्य-लोकमें | आते हैं" ( मुंड १. २. १० )। ज्ञानविरहित कर्मोंकी इसी ढंगकी निंदा ईशा- | वास्य और कठ उपनिषदोंमेंभी की गयी है ( कठ. २. ५; ईश. ९, १२ )। परमे- | श्वरका ज्ञान प्राप्त न करके केवल कर्मोंमेंही फंसे रहनेवाले इन लोगोंको ( गीता | ९. २१ ) अपने अपने कर्मोंके स्वर्ग आदि फल मिलते तो हैं, पर उनकी वासना | आज एक कर्ममें, तो कल किसी दूसरेही कर्ममें रत होकर चारों ओर घुड़-

६३८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥ ४५ ॥ दौड़सी मचाये रहती है, इस कारण उन्हें स्वर्गका आवागमन नसीब हो जाने परभी मोक्ष नहीं मिलता। मोक्षकी प्राप्तिके लिये बुद्धि-इंद्रियको स्थिर या एकाग्र रखना चाहिये। आगे छठे अध्यायमें विचार किया गया है, कि उसको एकाग्र किस प्रकार करना चाहिये। अभी तो इतनाही कहते हैं कि - ] ( ४५ ) हे अर्जुन ! ( कर्मकांडात्मक ) वेद ( इस रीतिसे ) त्रैगुण्यकी बातोंसे भरे पड़े हैं, इसलिये तू निस्त्रैगुण्य अर्थात् त्रिगुणोंसे अतीत, नित्यसत्त्वस्थ और सुखदुःख आदि द्वंद्वोंसे अलिप्त हो, एवं योगक्षेम आदि स्वार्थोंमें न पड़कर आत्मनिष्ठ हो ! [ सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणोंसे मिश्रित प्रकृतिकी सृष्टिको त्रैगुण्य कहते हैं। यह बात गीतारहस्य ( पृ. २३१-२५७ ) में स्पष्ट कर दिखलाई गई है, कि सृष्टि, सुख-दुख आदि अथवा जन्म-मरण आदि विनाशवान् द्वंद्वोंसे भरी हुई है; और सत्य ब्रह्म उसके परे है। इसी अध्यायके ४३ वें श्लोकमें, कहा है, कि प्रकृतिके अर्थात् मायाके इस संसारके सुखोंकी प्राप्तिके लिये मीमांसक- मार्गवाले लोग श्रौत, यज्ञ-याग आदि क्रिया करते हैं; और वे इन्हींमें निमग्न रहा करते हैं। कोई पुत्र-प्राप्तिके लिये एक विशेष यज्ञ करता है, तो कोई पानी बरसानेके लिये दूसरी इष्टि करता है। ये सब कर्म इस लोगमें संसारी व्यवहारोंके लिये अर्थात् अपने योगक्षेमके लिये हैं। अतएव प्रकटही है, कि जिसे मोक्ष प्राप्त करना हो, वह वैदिक कर्मकांडके इन त्रिगुणात्मक और निरे योगक्षेम संपादन करनेवाले कर्मोंको छोड़कर, अपना चित्त इसके परेके परब्रह्मकी ओर लगावे। इसी अर्थमें 'निर्द्वन्द्व' और 'निर्योगक्षेम' - शब्द ऊपर आये हैं। यहाँ ऐसी शंका हो सकती है, कि वैदिक कर्मकांडके इन काम्य कर्मोंको छोड़ देनेसे योग-क्षेम ( निर्वाह ) कैसे होगा ( गीतार. पृ. २९२-३९१ )। किंतु इसका उत्तर यहाँ नहीं दिया है, यह विषय आगे फिर नवें अध्यायमें आया है; वहाँ कहा है, कि इस योग-क्षेमको भगवान् करते हैं; और इन्हीं दो स्थानोंपर, गीतामें 'योगक्षेम' शब्द आया है ( गीता ९. २२ और उसपर हमारी टिप्पणी देखो )। नित्य-सत्त्वस्थ पदकाही अर्थ त्रिगुणातीत होता है। क्योंकि आगे कहा है, कि सत्त्वगुणके नित्य उत्कर्षसेही फिर त्रिगुणातीत अवस्था प्राप्त होती है, और वही सच्ची सिद्धावस्था है ( गीता १४. १४, २०; गीतार. पृ. १६६-१६७ तात्पर्य यह है, कि मीमांसकोंके योगक्षेमकारक त्रिगुणात्मक काम्य कर्म छोड़कर एवं सुख-दुःखके द्वंद्वोंसे निपटकर ब्रह्मनिष्ठ अथवा आत्मनिष्ठ होनेके

दूसरा अध्याय ६३९ यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके । तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ ४६ ॥ । विषयमें यहां उपदेश किया गया है। किंतु इस बातपर फिरभी ध्यान देना । चाहिये, कि आत्मनिष्ठ होनेका अर्थ सब कर्मोंको स्वरूपतः एकदम छोड़ देना । नहीं है। ऊपरके श्लोकमें वैदिक काम्य कर्मोंकी जो निंदा की गई है, या जो । न्यूनता दिखलाई गई है, वह कर्मोंकी नहीं; बल्कि उन कर्मोंके विषयमें जो । काम्य-बुद्धि होती है, उसकी है। यदि यह काम्य-बुद्धि मनमें न हो, तो फिर । यज्ञयाग किसीभी प्रकारसे मोक्षके लिये प्रतिबंधक नहीं होते (गीतार. पृ. २९५- । २९७) । आगे अठारहवें अध्यायके आरंभमें भगवानने अपना यह निश्चित । और उत्तम मत बतलाया है, कि मीमांसकोंके इन्हीं यज्ञयाग आदि कर्मोंको । फलाशा और संग छोड़कर चित्तकी शुद्धि और लोकसंग्रहके लिये अवश्य करना । चाहिये (गीता १८. ६) ) । गीताकी इन दो स्थानोंकी बातोंको एकत्र करनेसे । यह प्रकट हो जाता है, कि इस अध्यायके श्लोकमें मीमांसकोंके कर्मकांडकी जो । न्यूनता दिखलाई गई है, वह उसकी काम्य-बुद्धिको उद्देश्य करके है, केवल । क्रियाके लिये नहीं है। इसी अभिप्रायको मनमें लाकर भागवतमेंभी कहा है :- वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसंगोऽर्पितमीश्वरे । नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्था फलश्रुतिः ॥ । वेदोक्त कर्मोंकी वेदमें जो फलश्रुति कही गयी है, वह रोचनार्थ है अर्थात् । इसीलिये है, कि कर्ताको ये कर्म अच्छे लगें । अतएव इन कर्मोंको उस फल-प्राप्तिके । लिये न करें, किंतु निःसंग-बुद्धिसे अर्थात् फलकी आशा छोड़कर ईश्वरार्पण-बुद्धिसे । करें; जो पुरुष ऐसा करता है, उसे नैष्कर्म्यसे प्राप्त होनेवाली सिद्धि मिलती । है” (भाग. ११. ३. ४६) । सारांश, यद्यपि, वेदोंमें कहा है, कि अमुक अमुक । कारणोंके निमित्त यज्ञ करें, तथापि उसमें न भूलकर केवल इसीलिये यज्ञ करें । कि वे यष्टव्य हैं। अर्थात् यज्ञ करना हमारा कर्तव्य है; काम्य-बुद्धिको तो छोड़ । दें, पर यज्ञको न छोड़ें (गीता १५. ११) ; और उसी प्रकार अन्यान्य कर्मभी । किया करें - यह गीताके उपदेशका सार है; और यही अर्थ अगले श्लोकमें । व्यक्त किया गया है । ] (४६) चारों ओर पानीकी बाढ आ जाने पर कुएँका जितना अर्थ या प्रयोजन रह जाता है (अर्थात् कुछभी काम नहीं रहता), उतनाही प्रयोजन ज्ञान-प्राप्त ब्राह्मणको सब (कर्मकांडात्मक) वेदका रहता है (अर्थात् सिर्फ काम्य-कर्मरूपी वैदिक कर्मकांडकी उसे कुछ आवश्यकता नहीं रहती। । [इस श्लोकके फलितार्थके संबंधमें मतभेद नहीं है। पर टीकाकारोंने

६४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उसके शब्दोंकी नाहक खींचातानी की है। 'सर्वतः सम्प्लुतोदके' यह सप्तम्यन्त सामासिक पद है। परंतु इसे निरी सप्तमी या उदपानका विशेषणभी न समझ कर 'सति सप्तमी' मान लेनेसे, "सर्वतः सम्प्लुतोदके सति उदपाने यावानर्थः (न स्वल्पमपि प्रयोजनं विद्यते) तावान् विजानतः ब्राह्मणस्य सर्वेषु वेदेषुः अर्थः" इस प्रकार किसीभी बाहरके पदको अध्याहृत मानना नहीं पड़ता, सरल अन्वय लग जाता है, और उसका यह सरल अर्थभी हो जाता है, कि "चारों ओर पानीही पानी होनेपर (पीनेके लिये कहींभी बिना प्रयत्नके यथेष्ट पानी मिलने लगनेपर) जिस प्रकार कुएँको कोईभी नहीं पूछता, उसी प्रकार ज्ञान- प्राप्त पुरुषको यज्ञ-याग आदि केवल वैदिक कर्मका कुछभी उपयोग नहीं रहता।" क्योंकि, वैदिक कर्म केवल स्वर्ग-प्राप्तिके लियेही नहीं, बल्कि अंतमें मोक्षसाधक ज्ञान-प्राप्तिके लिये करना होता है; और इस पुरुषको तो ज्ञान-प्राप्ति पहलेही हो जाती है. इस कारण उसे वैदिक कर्म करके कोई नई वस्तु पानेके लिये शेष रह नहीं जाती। इसी हेतुसे, आगे तीसरे अध्यायमें (गीता ३. १७) कहा है, कि "जो ज्ञानी हो गया, उसे इस जगत्‌मे कर्तव्य शेष नहीं रहता।" बड़े भारी तालाब या नदी पर अनायासही, जितना चाहिये उतना, निर्मल पानी पीनेकी सुविधा होनेपर कुएँकी ओर कौन झाँकेगा? ऐसे समय कोईभी कुएँकी अपेक्षा नहीं रखता। सनत्सुजातीयके अंतिम अध्यायमें (मभा. उद्योग. ४५. २६) यही श्लोक कुछ थोड़े-से शब्दोंके हेरफेरसे आया है। माधवाचार्यने इस श्लोककी टीकामें वैसाही अर्थ किया है, जैसा कि हमने ऊपर किया है; एवं शुकानुप्रश्नमें ज्ञान और कर्मके तारतम्यका विवेचन करते समय साफ़ कह दिया है- "न ते (ज्ञानिनः) कर्म प्रशमन्ति कूपं नद्यां पिबन्निव" - नदीपर जिसे पानी मिलता है, वह जिस प्रकार कुएँकी परवाह नहीं करता उसी प्रकार 'ते' अर्थात् ज्ञानी पुरुष कर्मकी कुछ परवाह नहीं करते (मभा. शां. २४०. १०)। ऐसेही पांडव- गीताके सतहवे श्लोकमें कुएँका दृष्टान्त यों दिया है- जो वासुदेवको छोड़कर दूसरे देवताकी उपासना करता है, वह- "तृषितो जाह्नवीतीरे कूपं वाञ्छति दुर्मतिः" - भागीरथी तटपर पीनेके लिये पानी मिलने परभी, कुएँ की इच्छा करनेवाले प्यासे पुरुषके समान मूर्ख है। यह दृष्टान्त केवल वैदिक ग्रंथोमेंही नहीं है, प्रत्युत पालिके बौद्ध ग्रंथोंमेंभी उसके प्रयोग है। यह सिद्धान्त बौद्ध धर्मकोभी मान्य है, कि जिस पुरुषने अपनी तृष्णा समूल नष्ट कर डाली हो उसे आगे और कुछ प्राप्त करनेके लिये नहीं रह जाता; और इस सिद्धान्तको बतलाते हुए उदान नामक पाली ग्रंथके (७. ९) इस श्लोकमें यह दृष्टान्त दिया है- "कि कयिरा उदपानेन आपा चे सव्वदा सियुम" - सर्वदा पानी मिलने योग्य हो जानेमे कुएँको लेकर क्या करना है? आजकल बड़े-बड़े शहरोंमें यह देखाभी जाता है, कि घरमें नल हो जानेसे फिर कोई कुएँकी परवाह नही करता। इससे और विशेष कर

दूसरा अध्याय ६४१ § § कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥ | शुकानुप्रश्नके विवेचनसे गीताके दृष्टान्तका स्वारस्य ज्ञात हो जायगा; और | यह दीख पड़ेगा, कि हमने इस श्लोकका ऊपर जो अर्थ किया है, वही सरल और | ठीक है। परंतु, चाहे इस कारणसे हो, कि ऐसे अर्थसे वेदोंमें कुछ गौणता आ जाती | है; अथवा इस सांप्रदायिक सिद्धान्तकी ओर दृष्टि देनेसे हो, कि ज्ञानमेंही समस्त | कर्मोंका समावेश रहनेके कारण ज्ञानीको कर्म करनेकी ज़रूरत नहीं। गीताके | टीकाकार इस श्लोकके पदोंका अन्वय कुछ निराले ढंगसे लगाते हैं। वे इस | श्लोकके पहले चरणमें 'तावान्' और दूसरे चरणमें 'यावान्' पदोंको अध्याहृत | मानकर ऐसा अर्थ लगाते हैं - "उदपाने यावानर्थः तावानेव सर्वतः सम्प्लुतोदके | यथा सम्पद्यते तथा यावान् सर्वेषु वेदेषु अर्थः तावान् विजानतः ब्राह्मणस्य | सम्पद्यते" - अर्थात् स्नान-पान आदि कर्मोंके लिये कुएँका जितना उपयोग | होता है, उतनाही बड़े तालाबकाभी (सर्वतः सम्प्लुतोदके) हो सकता है; | उसी प्रकार वेदोंका जितनाभी उपयोग है, उतना सब, ज्ञानी पुरुषको | ज्ञानसे हो सकता है। परंतु इस अन्वयमें पहली श्लोकपंक्तिमें 'तावान्' और | दूसरी पंक्तिमें 'यावान्' इन दो पदोंके अध्याहार कर लेनेकी आवश्यकता पड़नेके | कारण, हमने इस अन्वय और अर्थको स्वीकृत नहीं किया। हमारा अन्वय | और अर्थ किसीभी पदके, अध्याहार किये बिनाही लग जाता है; और पूर्वके | श्लोकसे सिद्ध होता है, कि उसमें प्रतिपादित वेदोंके कोरे अर्थात् ज्ञानव्यतिरिक्त | कर्मकांडका गौणत्वही इस स्थलपर विवक्षित है। अब ज्ञानी पुरुषको यज्ञयाग | आदि कर्मोंकी कोई आवश्यकता न रह जानेसे, कुछ लोग जो यह अनुमान किया | करते हैं, कि इन कर्मोंको ज्ञानी पुरुष न करे, बिलकुल छोड़ दे - यह बात गीताको | संमत नहीं है। क्योंकि, यद्यपि इन कर्मोंका फल ज्ञानी पुरुषको अभीष्ट नहीं | होता, तथापि फलके लिये न सही; तोभी यज्ञयाग आदि कर्मोंको, अपना शास्त्र- | विहित कर्तव्य समझकर, वह कभी छोड़ नहीं सकता - अठारहवें अध्यायमें | भगवान्ने अपना निश्चित मत स्पष्ट कह दिया है, कि फलाशा न रहे, तोभी | अन्यान्य निष्काम कर्मोंके समान यज्ञयाग आदि कर्मभी ज्ञानी पुरुषको निःसंग- | बुद्धिसे करनेही चाहिये (पिछले श्लोकपर और गीता ३. १९ पर हमारी जो | टिप्पणी है, उसे देखो)। यही निष्कामविषयक अर्थ अब अगले श्लोकमें व्यक्त | कर दिखलाते हैं - ] (४७) कर्म करने मात्रका तेरा अधिकार है; फल (मिलना या न मिलना) कभीभी तेरे अधिकार अर्थात् ताबेमें नहीं; (इसलिये मेरे कर्मका) गी. र. ४१

६४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय । सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ ४८ ॥ अमुक फल मिले, यह ( लालची ) हेतु ( मनमें ) रखकर काम करनेवाला न हो; और कर्म न करनेकाभी तू आग्रह न कर । । [ इस श्लोकके चारों चरण परस्पर एक दूसरेके अर्थके पूरक हैं। इस । कारण अतिव्याप्ति न होकर कर्मयोगका सारा रहस्य थोड़ेमें उत्तम रीतिसे । बतला दिया गया है । और तो क्या, यह कहनेमेंभी कोई हानि नहीं, कि ये चारों । चरण कर्मयोगकी चतुःसूत्रीही हैं। यह पहले कह दिया है, कि "कर्म करने मात्रका । तेरा अधिकार है।" परन्तु इसपर यह शंका होती है, कि, कर्मका फल तो कर्मसेही । संयुक्त होनेके कारण " जिसका पेड़, उसीका फल" इस न्यायसे जो कर्म करनेका । अधिकारी है, वही फलकाभी अधिकारी होगा। अतएव इस शंकाको दूर करनेके । निमित्त दूसरे चरणमें स्पष्ट कह दिया है, कि " फलमें तेरा अधिकार नहीं है।" । फिर इससे निष्पन्न होनेवाला तीसरा यह सिद्धान्त बतलाया है, कि " मनमें । फलाशा रखकर कर्म करनेवाला मत हो।" ('कर्मफलहेतुः' = कर्मफले हेतुर्यस्य । स कर्मफलहेतुः, ऐसा बहुव्रीहि समास होता है; ), परंतु कर्म और उसका फल । दोनों संलग्न होते हैं, इस कारण यदि कोई ऐसा सिद्धान्त प्रतिपादन करने लगे, । कि फलाशाके साथ साथ फलकोभी छोड़ही देना चाहिये, तो उसेभी सच न । माननेके लिये अंतमें स्पष्ट उपदेश किया है, कि " फलाशाको तो छोड़ दे, पर । इसके साथही कर्म न करनेका अर्थात् कर्म छोड़नेका आग्रह न कर।" सारांश, । "कर्म कर" कहनेसे यह अर्थ तो नहीं होता कि "फलकी आशाको रख" और । "फलकी आशाको छोड़" कहनेसे यह अर्थ नहीं हो जाता कि "कर्मोंको छोड़ । दे" अतएव इस श्लोकका यह अर्थ है, कि फलाशा छोड़कर कर्त्तव्य-कर्म अवश्य । करना चाहिये; किंतु न तो कर्मकी आसक्तिमें फँसें और न कर्मही छोड़ें - । "त्यागो न युक्त इह कर्मसु नापि रागः" (योग. ५. ५. ५४) । और यह । दिखलाकर कि फल मिलनेकी बात अपने वशमें नहीं है; किंतु उसके लिये और । अनेक बातोंकी अनुकूलता आवश्यक है; अठारहवें अध्यायमें फिर यही अर्थ । औरभी दृढ़ किया गया है (गीता १८. १४-१६; गीतारहस्य प्र. ५, पृ. ११५; । प्र. १२)। अब कर्मयोगका यह स्पष्ट लक्षण बतलाते हैं, कि इसेही योग अथवा । कर्मयोग कहते हैं-] ( ४८ ) हे धनंजय ! आसक्ति छोड़कर, और कर्मकी सिद्धि हो या असिद्धि, दोनोंको समानही मानकर, 'योगस्थ' हो करके कर्म कर; ( कर्मके सिद्ध होने या निष्फल होनेमें रहनेवाली) समताकी (मनो-)वृत्तिकोही (कर्म-)योग कहते हैं।

दूसरा अध्याय ६४३ दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय । बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ ४९ ॥ बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥ ५० ॥ (४९) क्योकि हे धनजय ! बुद्धिके (साम्य-) योगकी अपेक्षा (बाह्य) कर्म बहुतही कनिष्ठ है। अतएव इस साम्य-बुद्धिकी शरणमें जा। फलहेतुक अर्थात् फलपर दृष्टि रखकर काम करनेवाले लोग कृपण अर्थात् दीन या निचले दर्जेके हैं। (५०) जो (साम्य-) बुद्धिसे युक्त हो जाय, वह इस लोकमें पाप और पुण्य, दोनोंसे अलिप्त रहता है, अतएव योगका आश्रय कर । (पाप-पुण्यसे बचकर) कर्म करनेकी चतुराईकोही (कुशलता या युक्ति) कर्मयोग कहते हैं। [इन श्लोकोंमें कर्मयोगका जो लक्षण बतलाया ह, वह महत्त्वका है; इस संबंधमें गीतारहस्यके तीसरे प्रकरणमें (पृ. ५६-६४) जो विवेचन किया गया है, उसे देखो। पर उसमेंभी कर्मयोगका जो तत्त्व- "कर्मकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है"-४९ वें श्लोकमें बतलाया है, वह अत्यंत महत्त्वका है। 'बुद्धि' शब्दके पीछे 'व्यवसायात्मिका' विशेषण नहीं है, इसलिये इस श्लोकमें उसका अर्थ 'वासना' या 'समझ' होना चाहिये। कुछ लोग बुद्धिका अर्थ 'ज्ञान' करके इस श्लोकका ऐसा अर्थ करना चाहते हैं, कि ज्ञानीकी अपेक्षा कर्म हलके दर्जेका है; परंतु यह अर्थ ठीक नहीं है। क्योकि, पीछे ४८ वें श्लोकमें समत्वका लक्षण बतलाया है, और ४९ वें तथा अगले श्लोकमेंभी वही वर्णित है, इस कारण यहाँ बुद्धिका अर्थ समत्व-बुद्धिही करना चाहिये। किसीभी कर्मकी भलाई-बुराई कर्मपर अवलंबित नहीं होती; कर्म एकही क्यों न हो, पर करनेवालेकी भली वा बुरी बुद्धिके अनुसार वह शुभ अथवा अशुभ हुआ करता है; अतः कर्मकी अपेक्षा बुद्धिही श्रेष्ठ है; इत्यादि नीतिके तत्त्वोंका विचार गीतारहस्यके चौथे, बारहवें और पंद्रहवें प्रकरणमें (पृ. ८८, ३८३-३८४; ४७७-४८०) किया गया है; इस कारण यहाँ और अधिक चर्चा नहीं करते। ४१ वे श्लोकमें बतलायाही है, कि वासनात्मक बुद्धिको सम और शुद्ध रखनेके लिये कार्य-अकार्यका निर्णय करनेवाली व्यवसायात्मका बुद्धि पहले स्थिर हो जानी चाहिये। इसलिये 'साम्य- बुद्धि' - इस शब्दसेही स्थिर व्यवसायात्मका बुद्धि, और शुद्ध वासना (वासनात्मक बुद्धि) इन दोनोंकाभी बोध हो जाता है। यह साम्य-बुद्धिही, शुद्ध आचरण अथवा कर्मयोगकी जड़ है, इसलिये ३९ वें श्लोकमें भगवानने पहले जो यह कहा है, कि कर्म करनेकीभी कर्मकी बाधा न लगनेवाली युक्ति अथवा योग तुझे बतलाता हूँ; उसीके अनुसार इस श्लोकमें कहा है, कि "कर्म करते समय बुद्धिको

६४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥ ५१ ॥ यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥ ५२ ॥ श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला । समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥ ५३ ॥ | स्थिर, पवित्र, सम और शुद्ध रखनाही " वह 'युक्ति' या 'कौशल्य' है, और | इसीको 'योग' कहते हैं - इस प्रकार योग शब्दकी दो वार व्याख्या की गई है । | ५० वें श्लोकके “योगः कर्मसु कौशलम् ” इस पदका इस प्रकार सरल अर्थ | लगनेपरभी, कुछ लोगोंने ऐसी खीचातानीसे अर्थ लगानेका प्रयत्न किया है, | कि “ कर्मसु योगः कौशलम् ” – कर्ममें जो योग है, उसको कौशल कहते हैं। पर | 'कौशल' शब्दकी व्याख्या करनेका यहाँ कोई प्रयोजन नही है, 'योग' शब्दका | लक्षण बतलानाही अभीष्ट है, इसलिये यह अर्थ सच्चा नहीं माना जा सकता । | इसके अतिरिक्त जब कि “कर्मसु कौशलम्” ऐसा सरल अन्वय लग सकता है, | तब 'कर्मसुयोगः' ऐसा औंधासीधा अन्वय करनाभी ठीक नहीं है । अब बतलाते | हैं, कि इस प्रकार साम्य-बुद्धिसे समस्त कर्म करते रहनेसे व्यवहारका लोप नहीं | होता और पूर्ण सिद्धि अथवा मोक्ष प्राप्त हुए बिना नहीं रहता – ] (५१) (समत्व-) बुद्धिसे युक्त (जो) ज्ञानी पुरुष कर्मफलका त्याग करते हैं, (वे) जन्मके बंधसे मुक्त होकर (परमेश्वरके) दुःखरहित पदको जा पहुँचते हैं। (५२) जब तेरी बुद्धि मोहके गंदले आवरणसे पार हो जायगी, तब उन बातोंसे तू विरक्त हो जायगा, जो सुनी हैं और सुननेकी हैं। | [अर्थात् तुझे अधिक कुछ सुननेकी इच्छा न होगी । क्योंकि इन बातोंके | सुननेसे मिलनेवाला फल तुझे पहलेही प्राप्त हो चुका होगा । 'निर्वेद' शब्दका | उपयोग प्रायः संसारी प्रपंचसे उकताहट या वैराग्यके लिये किया जाता है। इस | श्लोकमें उसका सामान्य अर्थ 'ऊब जाना' या 'चाह न रहना' ही है । अगले | श्लोकसे दीख पड़ेगा, कि यह उकताहट, विशेष करके पीछे बतलाये हुए, त्रैगुण्य- | विषयक श्रौत-कर्मोंके संबंधमें है।] (५३) (नाना प्रकारके) वेदवाक्योंसे घबड़ाई हुई तेरी बुद्धि जब समाधिवृत्तिमें स्थिर और निश्चल होगी, तब (यह साम्य-बुद्धिरूप) योग तुझे प्राप्त होगा । [सारांश, द्वितीय अध्यायके ४४ वें श्लोकके कथनानुसार, लोग जो वेद- | वाक्यकी फलश्रुतिमें भूले हुए हैं, और जो लोग किसी विशेष फलकी प्राप्तिके

दूसरा अध्याय ६४५ अर्जुन उवाच। § § स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥ ५४ ॥ श्रीभगवानुवाच । प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ ५५ ॥ दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥ ५६ ॥ यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् । नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५७ ॥ | लिये कुछ-न-कुछ कर्म करनेकी धुनमें लगे रहते हैं, उनकी बुद्धि स्थिर नहीं | होती - औरभी अधिक गड़बड़ा जाती है । इसलिये अनेक उपदेशोंका सुनना | छोड़ कर चित्तको निश्चल समाधि-अवस्थामें रख; ऐसा करनेसे साम्य-बुद्धिरूप | कर्मयोग तुझे प्राप्त होगा और अधिक उपदेशकी जरूरत न रहेगी, एवं कर्म | करनेपरभी तुझे उनका पाप न लगेगा। इस रीतिसे जिस कर्मयोगीकी बुद्धि या | प्रज्ञा स्थिर हो जाय, उसे स्थितप्रज्ञ कहते हैं। अब अर्जुनका प्रश्न है, कि उसका | व्यवहार कैसा होता है । ] अर्जुनने कहा - (५४) हे केशव ! (मुझे बतलाओ कि) समाधिस्थ स्थितप्रज्ञ किसे कहें ? उस स्थितप्रज्ञका बोलना, बैठना, और चलना कैसा रहता है ? | [ इस श्लोकमें 'भाषा' शब्द 'लक्षण'के अर्थमें प्रयुक्त है और हमने उसका | भाषांतर, उसकी भाषा धातुके अनुसार 'किसे कहें' किया है। गीतारहस्यके | बारहवें प्रकरणमें (पृ. ३६८-३६९) स्पष्ट कर दिया है, कि स्थितप्रज्ञका | बर्ताव कर्मयोगशास्त्रका आधार है; और उससे अगले वर्णनका महत्त्व ज्ञात हो | जायगा । ] श्रीभगवानने कहा :- (५५) हे पार्थ ! (जब कोई मनुष्य अपने) मनके समस्त काम अर्थात् वासनाओंको छोड़ता है; और अपने आपमेंही संतुष्ट होकर रहता है, तब उसको स्थितप्रज्ञ कहते हैं। (५६) दुःखमें जिसके मनको खेद नहीं होता, सुखमें जिसकी आसक्ति नहीं; और प्रीति, भय एवं क्रोध जिसके छूट गये हैं, उसको स्थितप्रज्ञ मुनि कहते हैं। (५७) सब बातोंमें जिसका मन निःसंग हो गया; और यथाप्राप्त शुभ-अशुभका जिसे आनंद या विषादभी नहीं; (कहना चाहिये

६४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५८ ॥ विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥ ५९ ॥ कि) उसकी बुद्धि स्थिर हुई । (५८) जिस प्रकार कछुवा अपने (हाथ-पैर आदि) अवयव सब ओरसे सिकोड़ लेता है, उसी प्रकार जब कोई पुरुष इंद्रियोंके (शब्द, स्पर्श आदि) विषयोंसे (अपनी) इंद्रियोंको खींच लेता है, तब (कहना चाहिये कि) उसकी बुद्धि स्थिर हुई । (५९) निराहारी पुरुषके विषय छूट जावें, तोभी (उनका) रस अर्थात् चाह नहीं छूटती । परंतु परब्रह्मका अनुभव होनेपर (सब विषय और उनकी) चाहभी छूट जाती है-अर्थात् विषय और उनकी चाह, दोनों छूट जाते हैं । [ अन्नसे इंद्रियोंका पोषण होता है । अतएव निराहार या उपवास करनेसे इंद्रियाँ अशक्त होकर अपने विषयोंका सेवन करनेमें असमर्थ हो जाती हैं । पर इस रीतिसे विषयोपभोगका छूटना केवल जबर्दस्तीकी, अशक्तताकी बाह्य क्रिया हुई । उससे मनकी विषयवासना (रस) कुछ कम नहीं होता, इसलिये वह वासना जिससे नष्ट हो, उस ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति करनी चाहिये । इस प्रकार ब्रह्मका अनुभव हो जानेपर मन एवं उसके साथही साथ इंद्रियाँभी आप-ही-आप तावेमें रहती है; इंद्रियोंको तावेमें रखनेके लिये निराहार आदि उपाय आवश्यक नहीं हैं; यही इस श्लोकका भावार्थ है । और यही अर्थ आगे छठे अध्यायके इस श्लोकमें स्पष्टतासे वर्णित है (गीता ६. १६, १७; ३. ६, ७), कि योगीका आहार नियमित रहे, आहार-विहार आदिको वह बिलकुलही न छोड़ दे । सारांश, गीताका यह सिद्धान्त ध्यानमें रखना चाहिये, कि शरीरको कृश करनेवाले निराहार आदि साधन एकांगी हैं, अतएव वे त्याज्य हैं, नियमित आहारविहार और ब्रह्म- ज्ञानही इंद्रियनिग्रहका उत्तम साधन है । इस श्लोकमें रस शब्दका "जिह्वासे अनुभव किया जानेवाला मीठा, कडुवा इत्यादि रस" ऐसा अर्थ करके, कुछ लोग यह अर्थ करते हैं, कि उपवासोंसे शेष इंद्रियोंके विषय यदि छूटभी जायँ, तोभी जिह्वाका रस अर्थात् खाने-पीने-की इच्छा कम न होकर बहुत दिनोंके निरा- हारसे वह औरभी अधिक तीव्र हो जाती है; और, भागवतमें ऐसे अर्थका एक श्लोकभी है (भाग. ११. ८. २०) । पर हमारी रायमें गीताके इस श्लोकका ऐसा अर्थ करना ठीक नहीं । क्योंकि दूसरे चरणसे वह मेल नहीं रखता । इसके अतिरिक्त भागवतमें 'रस' शब्द नहीं, 'रसन' है; और गीताके श्लोकका दूसरा चरणभी वहाँ नहीं है । अतएव भागवत और गीताके श्लोकको एकार्थक

दूसरा अध्याय ६४७ यततो ह्यापि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ ६० ॥ तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः । वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६१ ॥ । मान लेना उचित नहीं है। अब आगेके दो श्लोकोंमें यही अर्थ अधिक स्पष्टकर । बतलाते हैं, कि बिना ब्रह्मसाक्षात्कारके पूरा इंद्रियनिग्रह होही नहीं सकता है - ] ( ६० ) कारण यह है, कि केवल ( इंद्रियोंके दमन करनेके लिये ) प्रयत्न करनेवाले विद्वानकेभी मनको, हे कुंतीपुत्र ! ये प्रबल इंद्रियाँ बलात्कारसे मनमानी ओर खींच लेती हैं। ( ६१ ) ( अतएव ) इन सब इंद्रियोंका संयमनकर युक्त अर्थात् योगयुक्त और मत्परायण होकर रहना चाहिये । इस प्रकार जिसकी इंद्रियाँ अपने आधीन हो जायें, ( कहना चाहिये कि ) उसकी बुद्धि स्थिर हो गई । । [ इस श्लोकमें कहा है, कि नियमित आहारसे इंद्रियनिग्रह करके, साथही । साथ ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये मत्परायण होना चाहिये । अर्थात् ईश्वरमें चित्त । लगाना चाहिये; और ५९ वें श्लोकका हमने जो अर्थ किया है, उससे प्रकट । होगा, कि उसका हेतु क्या है ? मनुनेभी निरे इंद्रियनिग्रह करनेवाले पुरुषको । यह इशारा किया है, कि “ बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति' ( मनु. । २. २१५ ); और उसीका अनुवाद ऊपरके ६० वें श्लोकमें किया है। सारांश, । इन तीन श्लोकोंका भावार्थ यह है, कि जिसे स्थितप्रज्ञ होना हो, उसे अपना । आहार-विहार नियमित रखकर ब्रह्मज्ञानही प्राप्त करना चाहिये; और यह । ब्रह्मज्ञान होनेपरही मन निर्विषय होता है, शरीरक्लेशके उपाय तो ऊपरी । हैं - सच्चे नहीं । 'मत्परायण' पदसे यहाँ भक्ति-मार्गकाभी आरंभ हो गया । है (गीता ९. १३४) । ऊपरके श्लोकमें जो 'युक्त' शब्दका अर्थ योगसे तैयार । या बना हुआ है। गीता. ६. १७ के 'युक्त' शब्द है, उसका अर्थ 'नियमित' है । । पर गीताके इस शब्दका सदैवका अर्थ है - " साम्य-बुद्धिका जो योग गीतामें । बतलाया गया है, उसका उपयोग करके तदनुसार समस्त सुखदुःखोको शांति- । पूर्वक सहन कर, व्यवहार करनेमें चतुर पुरुष " ( गीता ५. २३ ) । इस । रीतिसे निष्णात हुए पुरुषकोही 'स्थितप्रज्ञ' यह कहते हैं, उसकी यह अवस्थाही । सिद्धावस्था कहलाती है; और इस अध्यायके तथा पाँचवे एवं बारहवें अध्यायके । अंतमें इसीका वर्णन है। यह बतला दिया, कि विषयोंकी चाह छोड़कर स्थित- । प्रज्ञ होनेके लिये क्या आवश्यक है ? अब अगले श्लोकोंमें यह वर्णन करते हैं कि, । विषयोंमें चाह कैसे उत्पन्न होती है ? इस चाहसे आगे चलकर कामक्रोध आदि

६४८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते । संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ॥ क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ ६३ ॥ रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् । आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ ६४ ॥ प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते । प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥ ६५ ॥ | विकार कैसे उत्पन्न होते हैं ? और अंतमें उससे मनुष्यका नाश कैसे हो जाता | है । एवं इनसे छुटकारा किस प्रकार मिल सकता है ? ] ( ६२ ) विषयोंका चिंतन करनेवाले पुरुषका इन विषयोंमें संग बढ़ता जाता है । फिर इस संगसे यह वासना उत्पन्न होती है, कि हमको काम ( अर्थात् वह विषय ) चाहिये; और ( इस कामकी तृप्ति होनेमें विघ्न आनेसे ) उस कामसेही क्रोधकी उत्पत्ति होती है; ( ६३ ) क्रोधसे संमोह अर्थात् अविवेक होता है, संमोहसे स्मृति-भ्रंश, स्मृति-भ्रंशसे बुद्धि-नाश और बुद्धि-नाशसे ( पुरुषका ) सर्वस्व नाश हो जाता है । ( ६४ ) परंतु अपना आत्मा अर्थात् अंतःकरण जिसके काबूमें है, वह (पुरुष) प्रीति और द्वेषसे छूटी हुई, अपने आधीन इंद्रियोंसे विषयोंमें बर्ताव करकेभी ( चित्तसे ) प्रसन्न रहता है । ( ६५ ) चित्त प्रसन्न रहनेसे उसके सब दुःखोंका नाश होता है । क्योंकि जिसका चित्त प्रसन्न है, उसकी बुद्धिभी तत्काल स्थिर होती है । | [ स्मरण रहे, कि इन दो श्लोकोंमें स्पष्ट वर्णन है, कि विषय या कर्मोंको | न छोड़, स्थितप्रज्ञ केवल उनका संग छोड़कर विषयोंमेंही निःसंग-बुद्धिसे वर्तता | रहता है और उसे जो शांति मिलती है, वह कर्मत्यागसे नहीं; किंतु फलाशाके | त्यागसे प्राप्त होती है । क्योंकि, इसके सिवा अन्य बातोंमें इस स्थितप्रज्ञमें और | संन्यास-मार्गवाले स्थितप्रज्ञमें कोई भेद नहीं है । इंद्रिय-संयमन, निरिच्छा और | शांति ये गुण दोनोंकोभी चाहिये; परंतु इन दोनोंमें महत्त्वका भेद यह है, कि | गीताका स्थितप्रज्ञ कर्मोंका संन्यास नहीं करता, किंतु लोकसंग्रहके निमित्त | समस्त कर्म निष्काम बुद्धिसे किया करता है; और संन्यास-मार्गवाला स्थित- | प्रज्ञ करताही नहीं है ( गीता ३. २५ ) । किंतु गीताके संन्यास-मार्गीय टीका- | कार इस भेदको गौण समझकर, सांप्रदायिक आग्रहसे प्रतिपादन किया करते | हैं, कि स्थितप्रज्ञका उक्त वर्णन संन्यास-मार्गकाही है । इस प्रकार जिसका

दूसरा अध्याय ६४९ नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना । न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥ ६६ ॥ इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥ ६७ ॥ तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६८ ॥ या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ ६९ ॥ | चित्त प्रसन्न नहीं, उसका वर्णनकर स्थितप्रज्ञके स्वरूपका अब औरभी अधिक | व्यक्त करते हैं - ] ( ६६ ) जो पुरुष उक्त रीतिसे युक्त अर्थात् योगयुक्त नहीं हुआ है उसमें ( स्थिर ) बुद्धि और भावना अर्थात् दृढ़-बुद्धिरूप निष्ठाभी नहीं रहती । जिसे भावना नहीं, उसे शांति नही; और जिसे शांति नहीं, उसे सुख मिलेगा कहाँसे ? ( ६७ ) ( विषयोंमें ) संचार अर्थात् व्यवहार करनेवाली इंद्रियोंके पीछे पीछे मन जो जाने लगता है, वही पुरुषकी बुद्धिको ऐसे हरण किया करता है, जैसे कि पानीमें नौकाको वायु खींचती है। ( ६८ ) अतएव हे महाबाहु अर्जुन ! इंद्रियोंके विषयोंसे जिसकी इंद्रियां चहूँ ओरसे हटी हुई हों, ( कहना चाहिये कि ) उसीकी बुद्धि स्थिर हुई । | [ सारांश, मनके निग्रहके द्वारा इंद्रियोंका निग्रह करना सब साधनोंका | मूल है । विषयोंमें व्यग्र होकर इंद्रियाँ इधर-उधर दौड़ती रहें, तो आत्मज्ञान | प्राप्तकर लेनेकी ( वासनात्मक ) बुद्धिही नहीं हो सकती । अर्थ यह है, कि बुद्धि | न हो, तो उसके विषयमें दृढ़ उद्योगभी नही होता; और फिर शांति एवं | सुखभी नहीं मिलता । गीतारहस्यके चौथे प्रकरणमें दिखलाया है, कि इंद्रिय- | निग्रहका यह अर्थ नहीं है, कि इंद्रियोंको सर्वथा दबाकर सब कर्मोंको बिलकुल | छोड़ दे; किंतु गीताका अभिप्राय यह है, कि ६४ वें श्लोकमें जो वर्णन है, उसके | अनुसार निष्काम बुद्धिमे कर्म करते रहना चाहिये । ] ( ६९ ) सब लोगोंकी जो रात है, उसमें स्थितप्रज्ञ जागता है; और जब समस्त प्राणीमात्र जागते रहते हैं, तब इस ज्ञानवान् पुरुषको रात मालूम होती है । | [ यह विरोधाभासात्मक वर्णन अलंकारिक है । अज्ञान अंधकारको | और ज्ञान प्रकाशको कहते हैं ( गीता १४. ११ ) । अर्थ यह है, कि अज्ञानी

६५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥७०॥ § § विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः । निर्ममो निरहंकारः स शान्ति मधिगच्छति ॥ ७१ ॥ लोगोंको जो वस्तु अनावश्यक प्रतीत होती है, (अर्थात् उन्हें जो अंधकार है वही ज्ञानियोंको आवश्यक होती है; और जिसमें अज्ञानी लोग उलझे रहते हैं, उन्हें जहाँ उजेला मालूम होता है - वहीं ज्ञानीको अँधेरा दीख पड़ता है - अर्थात् ज्ञानीको वह अभीष्ट नहीं रहता । उदाहरणार्थ, ज्ञानी पुरुष काम्य-कर्मोंको तुच्छ मानता है, तो सामान्य लोग उन्हींसे लिपटे रहते हैं; और ज्ञानी पुरुषको जो निष्काम कर्म चाहिये, उसकी औरोंको चाह नहीं होती ।] ( ७० ) चारों ओरसे (पानी) भरते जानेपरभी जिसकी मर्यादा नहीं डिगती, ऐसे समुद्रमें जिस प्रकार सब पानी चला जाता है, उसी प्रकार जिस पुरुषमें समस्त विषय (उसकी शांति भंग किये बिनाही) प्रवेश करते हैं, उसेही (सच्ची) शांति मिलती है । विषयोंकी इच्छा करनेवालेको (यह शांति मिलना संभव नहीं है) । [ इस श्लोकका अर्थ यह नहीं है, कि शांति प्राप्त करनेके लिये कर्म न करना चाहिये; प्रत्युत भावार्थ यह है, कि साधारण लोगोंका मन फलाशासे या काम्य-वासनासे घबड़ा जाता है; और उनके कर्मोंसे उनसे मनकी शांति बिगड़ जाती है; परंतु जो सिद्धावस्थामें पहुँच गया है, उसका मन फलाशासे क्षुब्ध नहीं होता, कितनेही कर्म करनेको क्यों न हों, पर उसके मनकी शांति नहीं डिगती । वह समुद्रसरीखा शांत बना रहता है, और सब काम किया करता है, अतएव उसे सुख-दुःखकी व्यथा नहीं होती । (उक्त ६४ वाँ श्लोक और गीता ४. १९) । अब इस विषयका उपसंहार करके बतलाते हैं, कि स्थितप्रज्ञकी इस स्थितिका नाम क्या है ? ] ( ७१ ) जो पुरुष समस्त काम अर्थात् आसक्ति छोड़कर और निःस्पृह हो करके ( व्यवहारमें ) बर्तता है, एवं जिसे ममत्व और अहंकार नहीं होता, उसेही शांति मिलती है ! [ संन्यास-मार्गके टीकाकार इस 'चरति' ( बर्तता है ) पदका "भीख मांगता फिरता है" ऐसा अर्थ करते हैं; परंतु यह अर्थ ठीक नहीं है । पिछले ६४ वें और ६७ वें श्लोकोंमें 'चरन्' एवं 'चरतां'का जो अर्थ है, वही अर्थ यहाँभी करना चाहिये । गीतामें ऐसा उपदेश कहींभी नहीं है, कि स्थितप्रज्ञ भिक्षा माँगा करे । हाँ; इसके विरुद्ध ६४ वें श्लोकमें यह स्पष्ट कह दिया है, कि स्थित- प्रज्ञ पुरुष इंद्रियोंको अपने अधीन रखकर 'विषयोंमें बर्ते ।' अतएव 'चरति'का

दूसरा अध्याय ६५१ एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ । ऐसाही अर्थ करना चाहिये, कि “ बर्तता है ” अर्थात् “ जगतके व्यवहार करता । है ”। श्रीसमर्थ रामदासस्वामीने दासबोधके उत्तरार्धमें इस बातका उत्तम । वर्णन किया है, कि 'निःस्पृह' चतुर पुरुष ( स्थितप्रज्ञ ) व्यवहारमें कैसे बर्तता । है, और गीतारहस्यके चौदहवें प्रकरणका विषयभी वही है । ] ( ७२ ) हे पार्थ ! ब्राह्मी स्थिति यही है । इसे पा जानेपर कोईभी मोहमें नहीं फँसता; और अंतकालमें अर्थात् मरनेके समयमेंभी इस स्थितिमें रहकर वह ब्रह्म- निर्वाण अर्थात् ब्रह्ममें मिल जानेके स्वरूपका मोक्ष पाता है । । [ यह ब्राह्मी स्थिति कर्मयोगकी अंतिम और अत्युत्तम स्थिति है ( गीतार. । प्र. ९, पृ. २३१; २५१ ); और इसमें विशेषता यह है; कि इसके प्राप्त । हो जानेसे फिर मोह नहीं होता । यहाँपर इस विशेषत्वके बतलानेका कारण । यह कि, यदि किसीको किसी दिन दैवयोगसे घड़ी-दो घड़ीके लिये इस ब्राह्मी । स्थितिका अनुभव हो सके, तो उससे चिरकालिक लाभ नहीं होता । क्योंकि । किसीभी मनुष्यकी यदि मरते समय यह स्थिति न रहेगी, तो मरणकालमें । जैसी वासना मनमें रहेगी, उसीके अनुसार आगे पुनर्जन्म होगा ( गीतारहस्य । पृ. २९१ ) । यही कारण है, जो ब्राह्मी स्थितिका वर्णन करते हुए इस श्लोकमें । स्पष्टतया कह दिया है, कि 'अंतकालेऽपि' = अंतकालमेंभी, स्थितप्रज्ञकी यह । अवस्था स्थिर बनी रहती है । अंतकालमें मनके शुद्ध रहनेकी विशेष आवश्य- । कताका वर्णन उपनिषदोंमें ( छां. ३. १४. १; प्र. ३. १० ) और गीतामेंभी । ( गीता ८. ५-१० ) है । यह वासनात्मक कर्म अगले अनेक जन्मोंके मिलनेका । कारण है, इसलिये प्रकटही है, कि कम-से-कम मरनेके समय तो वासना शून्य । हो जानी चाहिये । और फिर यहभी कहना पड़ता है, कि मरण समयमें । वासना शून्य होनेके लिये पहलेही वैसा अभ्यास हो जाना चाहिये । क्योंकि, । वासनाको शून्य करनेका कर्म अत्यंत कठिन है, और विना ईश्वरकी विशेष । कृपाके उसका सहसा किसीकोभी प्राप्त हो जाना न केवल कठिन है, वरन् । असंभवभी है, यह तत्त्व केवल वैदिक धर्ममेंही नहीं है, कि मरण-समयमें वासना । शुद्ध होनी चाहिये; किंतु अन्यान्य धर्मोंमेंभी यह तत्त्व अंगीकृत हुआ है । । ( गीतारहस्य प्र. १३, पृ. ४४१ ) ]