श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ६४५ अर्जुन उवाच। § § स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥ ५४ ॥ श्रीभगवानुवाच । प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ ५५ ॥ दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥ ५६ ॥ यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् । नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५७ ॥ | लिये कुछ-न-कुछ कर्म करनेकी धुनमें लगे रहते हैं, उनकी बुद्धि स्थिर नहीं | होती - औरभी अधिक गड़बड़ा जाती है । इसलिये अनेक उपदेशोंका सुनना | छोड़ कर चित्तको निश्चल समाधि-अवस्थामें रख; ऐसा करनेसे साम्य-बुद्धिरूप | कर्मयोग तुझे प्राप्त होगा और अधिक उपदेशकी जरूरत न रहेगी, एवं कर्म | करनेपरभी तुझे उनका पाप न लगेगा। इस रीतिसे जिस कर्मयोगीकी बुद्धि या | प्रज्ञा स्थिर हो जाय, उसे स्थितप्रज्ञ कहते हैं। अब अर्जुनका प्रश्न है, कि उसका | व्यवहार कैसा होता है । ] अर्जुनने कहा - (५४) हे केशव ! (मुझे बतलाओ कि) समाधिस्थ स्थितप्रज्ञ किसे कहें ? उस स्थितप्रज्ञका बोलना, बैठना, और चलना कैसा रहता है ? | [ इस श्लोकमें 'भाषा' शब्द 'लक्षण'के अर्थमें प्रयुक्त है और हमने उसका | भाषांतर, उसकी भाषा धातुके अनुसार 'किसे कहें' किया है। गीतारहस्यके | बारहवें प्रकरणमें (पृ. ३६८-३६९) स्पष्ट कर दिया है, कि स्थितप्रज्ञका | बर्ताव कर्मयोगशास्त्रका आधार है; और उससे अगले वर्णनका महत्त्व ज्ञात हो | जायगा । ] श्रीभगवानने कहा :- (५५) हे पार्थ ! (जब कोई मनुष्य अपने) मनके समस्त काम अर्थात् वासनाओंको छोड़ता है; और अपने आपमेंही संतुष्ट होकर रहता है, तब उसको स्थितप्रज्ञ कहते हैं। (५६) दुःखमें जिसके मनको खेद नहीं होता, सुखमें जिसकी आसक्ति नहीं; और प्रीति, भय एवं क्रोध जिसके छूट गये हैं, उसको स्थितप्रज्ञ मुनि कहते हैं। (५७) सब बातोंमें जिसका मन निःसंग हो गया; और यथाप्राप्त शुभ-अशुभका जिसे आनंद या विषादभी नहीं; (कहना चाहिये